मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून को चुनौती देने के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ कैबिनेट मंत्री को पैनल का हिस्सा बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि यह बहुमत की तानाशाही है। पीठ ने पूछा कि चयन समिति में निष्पक्ष व्यक्ति क्यों नहीं है? पीठ ने कहा कि यह कैसे संभव है कि एक कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ चला जाए। ऐसे में नियुक्ति की यह प्रक्रिया हमेशा दो एक के बहुमत से ही पारित होगी।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने अटार्नी जनरल आर वेंकटरमणी से कहा, ‘सिर्फ स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि तीसरा सदस्य कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो निष्पक्ष हो। चयन उसे करना चाहिए। कैबिनेट का कोई मंत्री ही क्यों हो?’ वेंकटरमणी ने कहा कि स्वतंत्रता की धारणा महत्त्वपूर्ण है। यह चुनाव आयुक्तों द्वारा नियुक्ति के बाद किए गए कार्यों से साबित हो जाएगी? न्यायमूर्ति दत्ता ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग न केवल स्वतंत्र हो, बल्कि स्वतंत्र दिखे भी। इसके लिए जनता का उस पर विश्वास उस स्तर का होना चाहिए, ‘मानो चयन समिति में कोई तीसरा निष्पक्ष व्यक्ति मौजूद हो।’

एक स्वतंत्र प्रक्रिया क्यों नहीं हो सकती?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-सत्ता में आने के बाद हर राजनीतिक दल अपना रुख बदल लेता है। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। पीठ के कहने का मतलब यह था कि अगर विपक्ष के नेता इस मामले में अपनी असहमति व्यक्त करते हैं, तब भी नियुक्ति पर इसका कोई असर नहीं होगा। पीठ ने कहा-आखिर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में स्वतंत्रता का यह प्रदर्शन क्यों है? जब सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में प्रधान न्यायाधीश शामिल होते हैं तो फिर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए भी एक स्वतंत्र प्रक्रिया क्यों नहीं हो सकती? चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध लोकतंत्र और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों को बनाए रखने से है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्तों की योग्यता पर सवाल उठाए गए। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने दलीलों को सिरे से नकारते हुए कहा कि योग्यता के लिए इसकी जरूरत नहीं है। कानूनी बिंदुओं पर दलीलें पेश करें। पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल करने वाले कानून को चुनौती दी गई है।

पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश को रखा था, जिन्हें लाए गए कानून में हटा दिया गया। पीठ के समक्ष पूर्व आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने कहा कि विधानमंडल ने बिना सोचे-समझे संशोधन को मंजूरी दे दी। मंत्री की अध्यक्षता वाली खोज समिति एकतरफा है क्योंकि अन्य सदस्यों को भी मंत्री द्वारा ही मनोनीत किया जाता है। राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता किया गया है। चयन समिति भी एकतरफा है। विपक्ष के नेता को शामिल करना मात्र निरर्थक है क्योंकि उनकी राय को नजरअंदाज किया जा सकता है। यह केवल नाममात्र की समिति है।

उन्होंने दलील दी कि समिति का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना है जो सभी या अधिकांश राजनीतिक दलों को स्वीकार्य हों, न कि केवल सत्ताधारी दल को। यह अधिनियम मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग की नियुक्तियों में मौजूद गंभीर खामी को दूर नहीं करता है, जिसके कारण अनूप बरनवाल मामले में न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा था। लोक प्रहरी की तरफ से पूर्व आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने कहा कि धारा छह से आठ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के अलावा प्रतिवादियों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के रूप में नियुक्तियां विवादित अधिनियम के अनुसार भी मान्य नहीं हैं।

अदालत में मौजूद अटार्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने कहा कि उनकी पहली मांग कानून की वैधता के विरुद्ध है। यदि यह याचिका खारिज हो जाती है तो किसी अन्य याचिका पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है। इस पर शुक्ला ने कहा कि नहीं। मेरा निवेदन है कि अधिनियम के तहत भी मौजूदा नियुक्तियां अमान्य हैं। जवाब में एजी ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं बनाया गया है। यह एक बेतरतीब और सतही समीक्षा है। तब न्यायमूर्ति दत्ता ने एजी से पूछा कि यदि कानून वैध है तो इसका पालन क्यों नहीं किया जाना चाहिए? एजी ने कहा कि बशर्ते कि वे ठोस मामला साबित करें। यह एक मनमानी समीक्षा नहीं हो सकती जिससे अदालत का समय बर्बाद हो। न्यायमूर्ति दत्ता ने शुक्ला से पूछा कि आपको कैसे पता कि राष्ट्रपति को जानकारी नहीं दी गई थी? जवाब में शुक्ला ने कहा कि सिफारिश पत्र में इसका उल्लेख नहीं है।

इस दौरान न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यहां तक कि कॉलेजियम में भी हम विचार-विमर्श करते हैं और कार्यवाही का विवरण तैयार किया जाता है, लेकिन अंतिम नोट में पूरे विवरण के बजाय केवल नाम होते हैं। यह नोट में होना जरूरी नहीं है, लेकिन आपको कैसे पता कि कार्यवाही का विवरण राष्ट्रपति को नहीं भेजा गया था? न्यायमूर्ति दत्ता ने एजी से पूछा कि आपको इस बात पर ध्यान देना होगा कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा-स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव मूल संरचना का एक हिस्सा हैं। यह तब तक संभव नहीं है जब तक चुनाव आयोग स्वतंत्र न हो। इस पर एजी ने कहा कि यह गलत धारणा है कि इस कानून का एकमात्र परिणाम यह है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है। मान लीजिए कि संसद ने आज पहली बार यह कानून पारित किया है लेकिन अनूप बरनवाल मामले में इस तर्क पर संदेह जताता है।

उन्होंने कहा कि इसे यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब तक कानून के वास्तविक प्रयोग पर इसकी जांच नहीं हो जाती, यानी चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली में कमी साबित नहीं हो जाती, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखने वाले नए कानून का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि जब लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष में थे, तब उन्होंने भी नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण पर सवाल उठाए थे। प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह अपने फायदे के लिए कानून का इस्तेमाल करती है और स्वतंत्र चुनाव आयोग की मांग भूल जाती है। इस पर न्यायमूर्ति दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा-यह चुने हुए लोगों की तानाशाही जैसा है। जो भी सत्ता में आता है, वही काम करता है। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

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