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भाजपा नेता की अर्जी पर बोला सुप्रीम कोर्ट- जन गण मन नहीं है वंदे मातरम, दोनों को बराबर सम्मान नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 फरवरी) को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को बराबर आदर देने से इंकार कर दिया।

मुंबई के एक स्कूल में राष्ट्रगान के दौरान झंडा फहराती स्टूडेंट (Express photo by Amit Chakravarty)

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 फरवरी) को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को बराबर आदर देने से इंकार कर दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील अश्वनी उपाध्याय ने यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट में डाली थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस अर्जी को रिजेक्ट कर दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक और अर्जी को ठुकराया गया। उसमें उपाध्याय ने मांग की थी कि सभी स्कूलों में राष्ट्रगान बजाया जाना चाहिए। उपाध्याय ने इससे पहले राष्ट्रगान, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गीत को प्रमोट और प्रोमेगेट करने की भी मांग की थी। इसमें तीनों को प्रमोट करने के लिए नेशनल पॉलिसी बनाने की मांग की गई थी। दस फरवरी को इसकी तुरंत सुनवाई की मांग की गई थी जिसे रिजेक्ट कर दिया गया था।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए साफ किया था कि राष्ट्रगान को लेकर उसकी तरफ से फिलहाल कोई सख्त ऑर्डर जारी नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसकी अगुवाई जस्टिस दीपक मिश्रा कर रहे थे उन्होंने कहा कि कोर्ट के ऑर्डर को लागू करने के लिए आम लोग किसी तरह की मोरल पुलिसिंग नहीं कर सकते। यह भी साफ किया गया कि फिल्म या फिर डॉक्यूमेंट्री के दौरान अगर राष्ट्रगान बजता है तो उसपर खड़े होने की जरूरत नहीं है। यानी फिल्म की शुरुआत में तो खड़ा होना होगा लेकिन अगर राष्ट्रगान किसी फिल्म का हिस्सा है तो उसपर खड़ा होने अपने विवेक पर है। हाल में आई दंगल फिल्म में राष्ट्रगान था। ऐसे में लोग सोच में पड़ गए थे कि क्या उन्हें दो बार खड़ा होना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवंबर को आदेश दिया था कि सभी सिनेमा घरों में फिल्म के शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलवाना होगा। इसके अलावा राष्ट्रगान के वक्त स्क्रीन पर तिरंगा भी दिखाना की जरूरी किया गया था। राष्ट्रगान के सम्मान में सभी दर्शकों को खड़ा होना होगा यह भी कहा गया था।

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