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सुप्रीम कोर्ट बोला- जाति जन्म से तय होती है, शादी से बदल नहीं जाती

महिला ने साल 1991 में बुलंदशहर के जिला मजिस्ट्रेट से एससी जाति का सर्टिफिकेट जारी करवाया था। इस सर्टिफिकेट और अकेडमिक क्वालिफिकेशन के आधार पर महिला को 1993 में केंद्रीय विद्यालय में पीजी टीचर के तौर पर नियुक्त किया गया था।

Author नई दिल्ली | January 20, 2018 13:09 pm
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स इंडियन एक्सप्रेस के लिए ताशी)

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक सुनवाई के दौरान कहा कि किसी व्यक्ति की जाति अपरिवर्तनीय है और शादी के बाद भी इसे बदला नहीं जा सकता। यह बात कोर्ट ने एक महिला की नियुक्ति को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान कही, जिसने एससी जाति के व्यक्ति से शादी कर 21 साल पहले केंद्रीय विद्यालय में आरक्षण का लाभ उठाकर शिक्षिका की नौकरी प्राप्त की थी। जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमएम शांतनागौदार की बेंच ने कहा कि दो दशक स्कूल में काम करने के बाद महिला अब वाइस-प्रिंसिपल के तौर पर काम कर रही है।

बेंच ने कहा कि महिला आरक्षण का फायदा नहीं उठा सकती है, भले ही उसने एक एससी व्यक्ति से शादी क्यों न की हो क्योंकि महिला का जन्म एक उच्च जाति में हुआ है। शादी के बाद उसकी जाति में परिवर्तन नहीं आ सकता और उसकी जाति वही रहेगी जो उसके जन्म पर थी। बेंच ने कहा “इसमें कोई भी संदेह की बात नहीं है कि जाति का निर्धारण जन्म से किया जाता है।महिला का जन्म अग्रवाल परिवार में हुआ है, जो कि सामान्य वर्ग में आता है न कि एससी वर्ग में। महिला ने भले ही एससी व्यक्ति से शादी की है, लेकिन उसे एससी जाति का सर्टिफिकेट नहीं मिल सकता।”

आपको बता दें कि महिला ने साल 1991 में बुलंदशहर के जिला मजिस्ट्रेट से एससी जाति का सर्टिफिकेट जारी करवाया था। इस सर्टिफिकेट और अकेडमिक क्वालिफिकेशन के आधार पर महिला को 1993 में केंद्रीय विद्यालय में पीजी टीचर के तौर पर नियुक्त किया गया था। महिला की नियुक्ति पंजाब के पठानकोट में हुई थी। नौकरी करने के दौरान महिला ने अपनी एम.ऐड पूरी की। नियुक्ति के दो दशक बीत जाने के बाद महिला के खिलाफ शिकायत कर उसकी नियुक्ति को रद्द करने की मांग की गई।

इस मामले पर केंद्रीय विद्यालय ने एक जांच टीम गठित की थी, जिसके बाद महिला का साल 2015 में एससी सर्टिफिकेट रद्द कर दिया गया और उसे नौकरी से टर्मिनेट किया गया। केंद्रीय विद्यालय के फैसले के खिलाफ महिला ने इलाहबाद हाई कोर्ट से गुहार लगाई, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए लेकिन उसे यहां से भी रियायत नहीं मिली और कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में थोड़ा सा बदलाव करते हुए महिला के टर्मिनेशन को अनिवार्य सेवानिवृत्ति करने का आदेश दे दिया है।

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