24 अगस्त 2017 भारतीय संवैधानिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में से एक है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘राइट टू प्राइवेसी’ (Right to Privacy) यानी निजता का अधिकार भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। इस फैसले ने ना केवल आधार (Aadhaar) विवाद की दिशा बदल दी बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि नागरिक की गरिमा (Dignity), व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) और निजी जीवन (Privacy) संविधान द्वारा संरक्षित हैं।

जनसत्ता की ‘कोर्टरूम फाइल्स’ सीरीज में आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह मामला क्या था, अदालत में क्या बहस हुई और इस फैसले ने हर भारतीय के अधिकारों को कैसे नई संवैधानिक मजबूती दी।

फैसले का नाम और बुनियादी जानकारी

मामले का नाम: Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) vs Union of India (2017) 10 SCC 1
फैसले की तारीख: 24 अगस्त 2017

पीठ: 9 जजों की संविधान पीठ (9-0 का सर्वसम्मत फैसला)

मुख्य न्यायाधीश: जस्टिस जे.एस. खेहर (तत्कालीन CJI)

अन्य न्यायाधीश: जस्टिस जे. चेलामेश्वर, एस.ए. बोबडे, आर.एफ. नरीमन, ए.एम. सप्रे, डी.वाई. चंद्रचूड़, एस.के. कौल, एन.वी. रमना और एस. अब्दुल नज़ीर।

इस मामले में सभी नौ न्यायाधीशों ने अलग-अलग लेकिन एकमत राय लिखी। इनमें जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ का फैसला सबसे विस्तृत था। बाद के कई संवैधानिक मामलों में व्यापक रूप से इस फैसले का रेफरेंस दिया गया। इसी फैसले में उन्होंने 1976 के ADM जबलपुर (Habeas Corpus) मामले में दिए गए बहुमत के फैसले को गलत ठहराते हुए स्पष्ट किया कि आपातकाल के दौरान भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।

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क्या था पूरा मामला?

इस मुकदमे की शुरुआत कर्नाटक हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी की याचिका से हुई थी। उस समय केंद्र सरकार आधार योजना का दायरा बढ़ा रही थी। बैंक खाते, मोबाइल नंबर और कई सरकारी योजनाओं को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया चल रही थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नागरिकों के फिंगरप्रिंट, आईरिस स्कैन और अन्य व्यक्तिगत जानकारी को बड़े पैमाने पर एकत्र करना उनकी निजता का उल्लंघन है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि संविधान में निजता को अलग से मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है और सुप्रीम कोर्ट के एम.पी. शर्मा (1954) तथा खड़क सिंह (1962) मामलों में भी इसे मौलिक अधिकार नहीं माना गया था।

यही संवैधानिक प्रश्न इतना महत्वपूर्ण था कि इसे 9 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

24 अगस्त 2017 को संविधान पीठ ने कहा, ”निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है। यह संविधान के भाग-III में दिए गए मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि निजता कोई सरकारी रियायत नहीं बल्कि हर व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता का स्वाभाविक अधिकार है। इसके साथ ही कोर्ट ने एम.पी. शर्मा (1954) और खड़क सिंह (1962) के उन हिस्सों को खारिज कर दिया जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था।

अदालत के अनुसार ‘निजता’ का अर्थ क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। इसके कई आयाम हैं-

  1. -शारीरिक निजता (Bodily Privacy)
    -हर व्यक्ति को अपने शरीर पर निर्णय लेने का अधिकार है।
  2. -व्यक्तिगत निर्णय की स्वतंत्रता (Decisional Privacy)
    -व्यक्ति क्या खाएगा, क्या पहनेगा, किससे विवाह करेगा, किस धर्म का पालन करेगा या अपना जीवन कैसे जीएगा- ये सभी व्यक्तिगत निर्णय हैं और संविधान इनकी रक्षा करता है।
  3. -सूचना संबंधी निजता (Informational Privacy)
    -डिजिटल डेटा, मेडिकल रिकॉर्ड, बैंकिंग जानकारी और अन्य व्यक्तिगत सूचनाओं की सुरक्षा भी निजता का हिस्सा है।

क्या निजता का अधिकार पूर्ण (Absolute) है?

नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी मौलिक अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं होता। अगर सरकार किसी व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप करना चाहती है तो उसे तीन संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होंगी।

इस फैसले का भारत पर क्या असर पड़ा?

इस फैसले का प्रभाव कई बड़े संवैधानिक मामलों पर पड़ा।

धारा 377 (Navtej Singh Johar, 2018)
सुप्रीम कोर्ट ने निजता, गरिमा और समानता के सिद्धांतों के आधार पर सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।

व्यभिचार कानून (Joseph Shine, 2018)
आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुए अदालत ने व्यक्तिगत स्वायत्तता (Autonomy), गरिमा और निजता पर जोर दिया।

डेटा संरक्षण कानून

पुट्टस्वामी फैसले ने भारत में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया। इसके बाद डेटा संरक्षण कानून बनाने की प्रक्रिया तेज हुई और 2023 में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) लागू किया गया।

पुट्टस्वामी फैसला भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसलों में गिना जाता है। इसने यह स्थापित किया कि सरकार नागरिकों की निजता में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अगर ऐसा करना हो तो उसे कानून, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता की संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना होगा।

डिजिटल युग में जब हमारी पहचान, बैंकिंग, स्वास्थ्य और निजी जानकारी तेजी से ऑनलाइन हो रही है, यह फैसला पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। यह निर्णय याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं बल्कि गरिमा, स्वतंत्रता और निजता के साथ जीने का भी अधिकार है।

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