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जजों के नाम पर घूस: सुुुुप्रीम कोर्ट ने खारिज की SIT जांंच की मांग, याचिकाकर्ता पर 25 लाख का जुर्माना

जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एएम खानिवलकर की पीठ ने याचिका दायर करने वाली संस्था कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

Author नई दिल्ली | December 1, 2017 7:17 PM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

जजों के नाम पर घूस लेने से जुड़े मामले की विशेष जांच दल (एसआइटी) से छानबीन नहीं कराई जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने एसआइटी जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एएम खानिवलकर की पीठ ने याचिका दायर करने वाली संस्था कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

शीर्ष अदालत इसी मामले पर वकील कामिनी जायसवाल की अर्जी पहले ही खारिज कर चुकी है। उन्होंने भी जजों के नाम पर घूस मांगने के मामले की एसआइटी से जांच कराने की मांग की थी। दरअसल, लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज का मामला निपटवाने के लिए घूस मांगने की बात सामने आई थी। इस मामले में उड़ीसा हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश इशरत मसरूर कुद्दुशी भी आरोपी हैं। सीबीआइ ने इस हाईप्रोफाइल मामले में 19 सितंबर को एफआइआर दर्ज की थी, जिसमें कुद्दुशी का नाम भी था। जांच एजेंसी ने पूर्व जज के अलावा प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के अध्यक्ष बीपी यादव, उनके बेटे पलाश यादव और तीन अन्य को गिरफ्तार किया था।

इस मामले पर विवाद गहराने के बाद मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए नई पीठ बनाने की व्यवस्था दी थी। इस पीठ ने 10 नवंबर को स्पष्ट कर दिया था कि कोई भी जज अपने मन से मामले की सुनवाई नहीं कर सकते हैं, क्योंकि चीफ जस्टिस ही सुप्रीम कोर्ट के मास्टर ऑफ रोस्टर होने के नाते पीठ का गठन सकते हैं। बता दें कि संविधान पीठ ने न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर के पीठ के नवंबर में दिए एक  आदेश को निरस्त कर दिया था। इसमें  दो सदस्यीय पीठ ने मामले पर सुनवाई के लिए शीर्ष अदालत के पांच सर्वाधिक वरिष्ठ जजों का संविधान पीठ गठित करने का निर्देश दिया था। बड़ी पीठ ने दो जजों के पीठ के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि कोई भी पीठ तब तक किसी मामले पर सुनवाई नहीं कर सकता जब तक कि प्रधान न्यायाधीश जो अदालत के मुखिया हैं, उन्होंने उसे मामला आवंटित नहीं किया हो।

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