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याकूब मेनन की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कायम रखी फांसी की सजा

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई बम विस्फोट कांड में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन की पुनर्विचार याचिका गुरुवार को खारिज करते हुए उसे फांसी देने का रास्ता प्रशस्त कर दिया। न्यायमूर्ति एआर दवे की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि हमने उस फैसले का अवलोकन किया […]

शीर्ष अदालत ने 2 जून 2014 को मेमन की मौत की सजा के अनुपालन पर रोक लगा दी थी। (एक्सप्रेस आर्काइव)

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई बम विस्फोट कांड में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन की पुनर्विचार याचिका गुरुवार को खारिज करते हुए उसे फांसी देने का रास्ता प्रशस्त कर दिया।

न्यायमूर्ति एआर दवे की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि हमने उस फैसले का अवलोकन किया है जिस पर पुनर्विचार का अनुरोध किया गया है। हमने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया है। हमने दोषसिद्धि और सजा के बारे में दी गई दलीलों को समझने की प्रक्रिया में निचली अदालत के फैसले पर भी गौर किया है।

जजों ने कहा कि हमने पाया कि पुनर्विचार याचिका में पेश सभी दलीलों पर उस फैसले में विस्तार से विचार किया गया है। इसलिए हमें इस फैसले में हस्तक्षेप के लिए अपने पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने का कोई आधार नजर नहीं आता। इसलिए पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है।

फांसी के फंदे से बचने के लिए मेमन के पास अब बहुत सीमित विकल्प बचे हैं। कानूनी प्रक्रिया के तहत अब उसके पास पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ सुधारात्मक याचिका दायर करने का अंतिम रास्ता बचा है। वह इसके अलावा राष्ट्रपति से भी क्षमा याचना कर सकता है।

इस खंडपीठ ने संविधान पीठ की व्यवस्था के अनुरूप अपने चैंबर की बजाए खुली अदालत में मेमन की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की। संविधान पीठ ने कहा था कि मौत की सजा से संबंधित मामलों में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई खुले अदालत में की जानी चाहिए।

इससे पहले शीर्ष अदालत ने पिछले साल दो जून को मेमन की मौत की सजा के अमल पर रोक लगाते हुए उसकी याचिका संविधान पीठ के पास विचार करने के लिए भेज दी थी कि क्या मौत की सजा के मामलों में पुनर्विचार याचिका पर खुले अदालत में विचार होना चाहिए या फिर चैंबर में।

मेमन ने अपनी याचिका में दावा किया था कि वह 1996 से ही सीजोफ्रेनिया की बीमारी से ग्रस्त है और करीब 20 साल से जेल की सलाखों के पीछे है। उसने मौत की सजा बदलने का अनुरोध करते हुए कहा था कि किसी दोषी को एक ही अपराध के लिए उम्रकैद और मौत की सजा साथ-साथ नहीं दी जा सकती है।

मेमन ने मुंबई में 12 मार्च 1993 को हुई 13 बम विस्फोटों की घटनाओं के मामले में मौत की सजा बरकरार रखने के शीर्ष अदालत के 21 मार्च 2013 के फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया था। इन विस्फोटों में 350 व्यक्ति मारे गए थे और 1200 अन्य जख्मी हुए थे।

मेमन ने पुनर्विचार याचिका में कहा था कि वह पांच अगस्त 1994 से ही हिरासत में है और उसे कभी भी जमानत पर रिहा नहीं किया गया। याचिका में यह भी कहा गया था कि वह लगभग 20 साल जेल में बिता चुका है और ऐसी स्थिति में इतने विलंब से उसकी मौत की सजा पर अमल का मतलब उसे उम्रकैद के साथ ही मौत की सजा देना भी होगा।

शीर्ष अदालत ने 21 मार्च 2013 को मेमन की मौत की सजा बरकरार रखते हुए दस अन्य दोषियों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था जिन्हें मुंबई में विभिन्न स्थानों पर आरडीएक्स से भरे वाहनों को जगह जगह पहुंचाने के जुर्म में विशेष टाडा अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी।

टाडा अदालत ने नवंबर, 2006 में अपने फैसले में 123 आरोपियों में से एक सौ को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इनमें से 12 दोषियों को मौत की सजा और 20 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी जबकि विशेष अदालत ने शेष 68 को आतंकवाद निरोधक कानून, भारतीय दंड संहिता और दूसरे कानूनों के तहत अलग-अलग अवधि की सजाएं दी थीं।

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