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याकूब मेमन को फांसी का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई में 1993 में हुए बम विस्फोट की घटनाओं के मामले में मौत की सजा पाने वाले एक मात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन की सुधारात्मक याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। जिससे इस महीने के अंत में उसे फांसी देने का रास्ता साफ हो गया है। फांसी 30 जुलाई को देने की तारीख महाराष्ट्र सरकार ने पहले ही तय कर रखी है।

महाराष्ट्र सरकार ने तय कर रखी है 30 जुलाई की तारीख

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई में 1993 में हुए बम विस्फोट की घटनाओं के मामले में मौत की सजा पाने वाले एक मात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन की सुधारात्मक याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। जिससे इस महीने के अंत में उसे फांसी देने का रास्ता साफ हो गया है। फांसी 30 जुलाई को देने की तारीख महाराष्ट्र सरकार ने पहले ही तय कर रखी है।

प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मेमन की याचिका खारिज करते हुए कहा कि इसमें बताए गए आधार सुधारात्मक याचिका पर फैसले के लिए शीर्ष अदालत द्वारा 2002 में प्रतिपादित सिद्धांतों के दायरे में नहीं आते हैं। मेमन ने अपनी याचिका में कहा था कि वह 1996 से सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त है और करीब 20 साल से जेल की सलाखों के पीछे है। उसने मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का अनुरोध करते हुए कहा था कि एक दोषी को एक ही अपराध के लिए उम्र कैद के साथ ही मृत्यु दंड नहीं दिया जा सकता।

जजों ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सुधारात्मक याचिका में कुछ आधार बताए हैं। जो रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा एवं अन्य के मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों के दायरे में नहीं आते हैं। चूंकि सुधारात्मक याचिका में शामिल कोई भी आधार रूपा अशोक हुर्रा प्रकरण में निर्धारित पैमाने के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए सुधारात्मक याचिका खारिज की जाती है। शीर्ष अदालत ने इस साल नौ अप्रैल को मौत की सजा के फैसले पर पुनर्विचार के लिए मेमन की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने 21 मार्च 2013 को उसकी मौत की सजा बरकरार रखी थी।

संविधान पीठ की एक व्यवस्था के आलोक में शीर्ष अदालत के तीन जजों की पीठ ने मेमन की पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की थी। संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि पुनर्विचार याचिकाओं पर चैंबर में सुनवाई की परंपरा से हटकर मौत की सजा के मामलों में खुली अदालत में सुनवाई की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने दो जून 2014 को मेमन की मौत की सजा के अमल पर रोक लगाते हुए उसकी याचिका इस सवाल पर विचार के लिए संविधान पीठ को सौंप दी थी कि क्या मौत की सजा के मामले में पुनर्विचार याचिका पर खुले अदालत में या चैंबर में सुनवाई होनी चाहिए।

मेमन ने इस मामले में अपनी मौत की सजा बरकरार रखने के शीर्ष अदालत के 21 मार्च 2013 के फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया था। मुंबई में 12 मार्च 1993 को एक के बाद एक 13 बम विस्फोट हुए थे जिनमें 350 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी और 1200 लोग जख्मी हुए थे।

 

अब राज्यपाल को दी दया याचिका

सुप्रीम कोर्ट से उपचारात्मक याचिका खारिज होने के बाद याकूब मेमन ने 30 जुलाई को अपनी फांसी की सजा की तामील पर रोक लगवाने के आखिर प्रयास के तहत मंगलवार शाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका पेश की।

याकूब के वकील अनिल गेदाम ने यहां केंद्रीय जेल में मेमन से भेंट की जिसके बाद यह दया याचिका अधिकारियों को सौंपी गई। गेदाम सोमवार दोपहर भी अपने मुवक्किल से मिले थे।

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