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सुप्रीम कोर्ट ने कहा-तीन तलाक नाकुबूल, सरकार को छह महीने के भीतर कानून लाने की हिदायत दी

अदालत ने कहा कि केंद्र जो कानून बनाए उसमें मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून संबंधी चिंताओं का खयाल रखा जाए।

Author नई दिल्ली | August 23, 2017 12:51 AM
बीते 22 अगस्त को देश की शीर्ष अदालत ने एक बार में तीन तलाक :तलाक-ए-बिद्दत’ को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने एक ऐतिहासिक फैसले से सैकड़ों वर्षों से चली आ रही तलाके-बिद्दत (लगातार तीन बार तलाक कहने की प्रथा) को असंवैधानिक करार दिया। शीर्ष अदालत ने अपनेफैसले में मुसलिमों में तीन तलाक के जरिए दिए जाने वाले तलाक की प्रथा को अमान्य, अवैध व असंवैधानिक ठहराया है। अदालत ने तीन तलाक को कुरान के मूल सिद्धांतों का हिस्सा नहीं बताते हुए सरकार से इस पर छह माह में कानून बनाने को कहा है। इस अवधि में अगर सरकार कानून नहीं बनाती है तो शीर्ष अदालत द्वारा तीन तलाक पर लगाई गई रोक जारी रहेगी। अदालत ने राजनीतिक दलों से अपने मतभेदों को दरकिनार रखने और तीन तलाक के संबंध में कानून बनाने में केंद्र की मदद करने को भी कहा। अदालत ने कहा कि केंद्र जो कानून बनाए उसमें मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून संबंधी चिंताओं का खयाल रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामिक देशों में तीन तलाक खत्म किए जाने का हवाला दिया और पूछा कि स्वतंत्र भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता।

पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तीन तलाक पर अपना फैसला 18 महीने बाद सुनाया। पीठ के तीन सदस्यों (न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ) ने तलाके-बिद्दत को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि यह प्रथा गैर-इस्लामिक है। तीनों जजों ने यह भी कहा कि तीन तलाक के माध्यम से विवाह विच्छेद करने की प्रथा मनमानी है और इससे संविधान का उल्लंघन होता हैं। इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए। पीठ में शामिल दो जजों ने तीन तलाक पर 6 महीने की रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं? यह कानूनी रूप से जायज है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? मई में इस मामले में छह दिन सुनवाई हुई थी। इसके बाद मंगलवार को फैसला आया। अब सरकार को आम राय कायम कर तीन तलाक पर कानून बनाना होगा।

प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर जहां तीन तलाक की प्रथा पर छह माह के लिए रोक लगाकर सरकार को इस संबंध में नया कानून लेकर आने के लिए कहने के पक्ष में थे, वहीं जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने इस प्रथा को संविधान का उल्लंघन करार दिया। बहुमत वाले इस फैसले में कहा गया कि तीन तलाक समेत हर वह प्रथा अस्वीकार्य है, जो कुरान के मूल तत्व के खिलाफ है। तीन न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि तीन तलाक के जरिए तलाक देने की प्रथा स्पष्ट तौर पर स्वेच्छाचारी है। यह संविधान का उल्लंघन है और इसे हटाया जाना चाहिए। जबकि प्रधान न्यायाधीश खेहर और जस्टिस नजीर के अल्पमत वाले फैसले में तीन तलाक की प्रथा पर छह माह की रोक की बात की गई। इसके साथ ही राजनीतिक दलों से कहा गया कि वे अपने मतभेदों को दरकिनार करके एक कानून लाने में केंद्र की मदद करें। अल्पमत के फैसले के न्यायाधीशों ने कहा कि अगर केंद्र छह माह के भीतर कानून लेकर नहीं आता तो तीन तलाक पर उसका आदेश जारी रहेगा। दोनों जजों ने अपने अल्पमत वाले फैसले में यह उम्मीद जताई कि केंद्र का कानून मुसलिम संगठनों और शरिया कानून से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखेगा।

पांच जजों के संवैधानिक पीठ ने अपने 395 पन्नों के आदेश में कहा, 3:2 के बहुमत के जरिए दर्ज किए गए विभिन्न मतों को देखते हुए ‘तलाके- बिद्दत’ तीन तलाक को दरकिनार किया जाता है। पीठ में मौजूद जज अलग-अलग धर्मों के थे। इनमें सिख, ईसाई, पारसी, हिंदू और मुसलिम धर्म के जज थे। पीठ ने कुल सात याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें मुसलिम महिलाओं द्वारा समुदाय में व्याप्त तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देने वाली पांच अलग याचिकाएं भी शामिल थीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि ‘तीन तलाक’ की प्रथा असंवैधानिक है। याचिकाएं दायर करने वाली मुसलिम महिलाओं ने तीन तलाक की उस प्रथा को चुनौती दी थी, जिसके तहत पति तलाक देने के लिए एक बार में तीन बार तलाक बोल देता है। कई बार वह फोन पर या मोबाइल संदेश में ही तलाक बोल देता है।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा – मुसलिमों में शादी को तोड़ने के लिए तीन तलाक की प्रथा सबसे बुरी है और यह वांछित तरीका नहीं है। हालांकि कुछ ऐसे पक्ष भी हैं, जो इसे वैध बताते हैं। इससे पहले केंद्र ने पीठ को बताया था कि अगर तीन तलाक को शीर्ष अदालत द्वारा अमान्य और असंवैधानिक ठहराया जाता है तो वह मुसलिमों में शादी और तलाक का नियमन करने के लिए एक कानून लेकर आएगा। सरकार ने मुसलिम समुदाय में तलाक की तीनों किस्मों तलाके-बिद्दत, तलाक हसन और तलाक अहसन को ‘एकपक्षीय’ और ‘न्यायेतर’ बताया था। सरकार ने कहा था कि हर पर्सनल लॉ को संविधान के अनुरूप होना चाहिए और विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों को एक ही श्रेणी में रखना चाहिए और यह संविधान के अनुरूप होने चाहिए।

केंद्र ने कहा था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का मौलिक हिस्सा है और न ही यह बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का मुद्दा है। यह मुसलिम पुरुषों और वंचित महिलाओं के बीच अंतर सामुदायिक संघर्ष है। याचिकाओं में निकाह हलाला और मुसलिमों में बहुविवाह को भी चुनौती दी गई। पीठ ने खुद मुख्य मुद्दा उठाया। उस याचिका पर लिखा था – मुसलिम महिलाओं की समानता की तलाश। शीर्ष अदालत ने इस सवाल का स्वत: संज्ञान लिया कि क्या तलाक की स्थिति में या अपने पतियों की अन्य शादियों के चलते मुसलिम महिलाओं को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है?

इनकी लड़ाई से सबका भला

सायरा बानो

उत्तराखंड के काशीपुर की सायरा बानो ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक और निकाह हलाला के चलन की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। साथ ही, याचिका में मुसलिमों में प्रचलित बहुविवाह प्रथा को भी गलत बताते हुए उसे खत्म करनी की मांग थी।

आफरीन रहमान
जयपुर की आफरीन रहमान (25) ने भी तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने बताया था कि इंदौर में रहने वाले उनके पति ने स्पीड पोस्ट के जरिए तलाक दिया है, जो सही नहीं है। उनका आरोप था कि पति समेत ससुराल पक्ष के दूसरे लोगों ने मिलकर दहेज की मांग को लेकर उनके साथ काफी मारपीट की और फिर उन्हें घर से निकाल दिया।

अतिया साबरी
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की आतिया साबरी के पति ने कागज पर तीन तलाक लिखकर आतिया से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। उनकी शादी 2012 में हुई थी। उनकी दो बेटियां भी हैं। अतिया ने आरोप लगाया था कि लगातार दो बेटियां होने से नाराज उनके शौहर और ससुर उन्हें घर से निकालना चाहते थे।

गुलशन परवीन
उत्तर प्रदेश के ही रामपुर में रहने वाली गुलशन परवीन को उनके पति ने 10 रुपये के स्टांप पेपर पर तलाकनामा भेज दिया था। गुलशन की 2013 में शादी हुई थी और उनका दो साल का बेटा भी है।

इशरत जहां
तीन तलाक की संवैधानिकता को चुनौती देने वालों में पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां भी शामिल थीं। इशरत ने याचिका में कहा था कि उसके पति ने दुबई से उन्हें फोन पर तलाक दे दिया। इशरत ने कोर्ट को बताया था कि उसका निकाह 2001 में हुआ था और उसके बच्चे भी हैं जिन्हें पति ने जबरन अपने पास रख लिया है। याचिका में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की गई थी।
तलाके-बिद्दत पर तीन-दो का फैसला

’मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने अपने फैसले में सरकार को तीन तलाक के मामले में कानून बनाने की सलाह दी और छह माह तक तलाके-बिद्दत पर रोक लगाने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति खेहर ने कहा कि अगर सरकार छह महीने में कानून नहीं बना पाती है तो उसकी यह रोक जारी रहेगी।  ’न्यायमूर्ति नजीर ने अल्पमत के निर्णय में तीन तलाक की प्रथा को छह महीने स्थगित रखने की हिमायत करते हुए राजनीतिक दलों से कहा कि वे अपने मतभेद परे रखते हुए केंद्र को इस संबंध में कानून बनाने में सहयोग करें। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र छह महीने के भीतर कानून नहीं बनाता तो तीन तलाक पर यह अंतरिम रोक जारी रहेगी।

’जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा – तीन तलाक इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और इस प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 25 (मौलिक अधिकारों से संबंधित) का संरक्षण हासिल नहीं है। इसलिए इसे निरस्त किया जाए। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश की इस बात से सहमत होना बिल्कुल कठिन है कि तीन तलाक इस्लाम धर्म का अंदरूनी मामला है।’जस्टिस आरएफ नरीमन ने कहा- तीन तलाक को संवैधानिकता की कसौटी पर कसा जाना जरूरी है। इसे निरस्त करने के पक्षधर तीनों जजों ने विभिन्न मुसलिम देशों में तीन तलाक की प्रथा समाप्त किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि जब मुसलिम देशों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया है तो आजाद भारत को इससे मुक्ति क्यों नहीं लेनी चाहिए। पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई मुसलिम देशों ने इस प्रथा को प्रतिबंधित कर रखा है।

’जस्टिस यूयू ललित ने कहा- तीन तलाक समेत हर वह प्रथा अस्वीकार्य है, जो कुरान के मूल तत्व के खिलाफ है।

’तीन तलाक को कुरान के मूल सिद्धांतों का हिस्सा नहीं बताते हुए सरकार से इस पर छह माह में कानून बनाने को कहा है।
’छह माह में अगर सरकार कानून नहीं बनाती है तो तीन तलाक पर लगाई गई रोक जारी रहेगी।
’अदालत ने राजनीतिक दलों से अपने मतभेदों को दरकिनार रखने और तीन तलाक के संबंध में कानून बनाने में केंद्र की मदद करने को भी कहा।
’सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामिक देशों में तीन तलाक खत्म किए जाने का हवाला दिया और पूछा कि स्वतंत्र भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता।

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