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अयोध्या केस: सुप्रीम कोर्ट बोला- ‘राम के जन्म स्थान को खारिज करने वाली रिपोर्ट इतिहासकारों की राय, सबूत नहीं’

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगाई की अध्यक्षता वाली बेंच 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिए फैसले को खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

Author नई दिल्ली | September 18, 2019 7:52 AM
ramतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

1991 में आई चार इतिहासकारों की वो रिपोर्ट जिसमें बाबरी मस्जिद वाली जगह को राम जन्म भूमि बताने के दावे को खारिज किया गया था, पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने मंगलवार को कहा कि इतिहासकारों की यह रिपोर्ट एक बेहतर ‘राय’ तो हो सकती है लेकिन मामले पर फैसला देने के लिए इसे ‘सबूत’ के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह ज्यादा से ज्यादा एक ‘राय’ हो सकती है।

बता दें कि जस्टिस चंद्रचूड़ उस पांच सदस्यीय संविधान बेंच का हिस्सा हैं जो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मालिकाना हक विवाद की सुनवाई कर रहा है। जज ने यह टिप्पणी एडवोकेट राजीव धवन से बातचीत के दौरान की। धवन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की पैरवी कर रहे हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब धवन ने अदालत का ध्यान ‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद, ए हिस्टोरियंस रिपोर्ट टु द नेशन’ की ओर ध्यान दिलाया। इस रिपोर्ट के लेखक आरएस शर्मा, एम अतहर अली, डीएन झा और सूरज भान हैं। धवन ने बताया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला देते वक्त इस रिपोर्ट पर विचार नहीं किया। धवन के मुताबिक, ‘शायद इसलिए क्योंकि डीएन झा ने इस पर साइन नहीं किए थे।’

बता दें कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगाई की अध्यक्षता वाली बेंच 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिए फैसले को खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबड़े ने धवन से कहा, ‘उन्हें किसने (रिपोर्ट तैयार करने के लिए) ऐसा करने कहा था?’ वहीं, मस्जिद के पक्ष की पैरवी करने वाले सीनियर वकील जफरयाब जिलानी ने बताया कि वे (इतिहासकार) एक विचार विमर्श में शामिल हुए थे और खुद से पहले करके यह रिपोर्ट तैयार की थी।

हालांकि, रिपोर्ट को ‘राय’ बताए जाने के खिलाफ धवन ने दलील दी, ‘निश्चित तौर पर यह राय नहीं है। यह विशेषज्ञों का इतिहास है।’ इसके बाद, धवन ने इतिहासकारों की साख के बारे में जानकारी दी और रिपोर्ट में छपी बातों का जिक्र किया। हालांकि, बेंच इससे प्रभावित नजर नहीं आई। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘यह बातचीत के दौरान विश्व हिंदू परिषद के रुख को लेकर प्रतिक्रिया थी। जैसे विहिप की कही गई बातें हमारे समक्ष इतिहास की तरह नहीं रखी जा सकतीं, वैसे ही ये भी।’

धवन ने इस बात को खारिज किया कि यह रिपोर्ट विश्व हिंदू परिषद को जवाब था। हालांकि, बेंच ने साफ किया कि रिपोर्ट में यह बात साफ की गई है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘यह अलग बात होती अगर इतिहासकार आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से रखे गए सबूतों पर प्रतिक्रिया देते।’ बता दें कि एएसआई ने हाई कोर्ट के आदेश पर उस स्थल की खुदाई की थी।

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