ताज़ा खबर
 

पिछड़ापन तय करने का एकमात्र पैमाना जाति नहीं, सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग है जाट : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण कोटे में शामिल करने के लिए पूर्व यूपीए सरकार की जारी की गई अधिसूचना मंगलवार को रद्द कर दी। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन के पीठ ने कहा-हम केंद्र की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में जाटों को शामिल करने की अधिसूचना […]

Author Updated: March 18, 2015 11:42 AM
पिछड़ापन तय करने का एकमात्र पैमाना जाति नहीं, सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग है जाट : सुप्रीम कोर्ट (फोटो: रॉयटर्स)

सुप्रीम कोर्ट ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण कोटे में शामिल करने के लिए पूर्व यूपीए सरकार की जारी की गई अधिसूचना मंगलवार को रद्द कर दी। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन के पीठ ने कहा-हम केंद्र की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में जाटों को शामिल करने की अधिसूचना निरस्त करते हैं। पीठ ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के उस निष्कर्ष की अनदेखी करने के केंद्र के फैसले में खामी पाई जिसमें कहा गया था कि जाट केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल होने के हकदार नहीं हैं क्योंकि वे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग नहीं हैं।

इसने ओबीसी आरक्षण पर मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन पर वृहद पीठ के फैसले का हवाला दिया और कहा कि जाति यद्यपि एक प्रमुख कारक है। लेकिन यह किसी वर्ग के पिछड़ेपन को तय करने का एकमात्र कारक नहीं हो सकती। अतीत में ओबीसी सूची में किसी जाति को संभावित तौर पर गलत रूप से शामिल किया जाना दूसरी जातियों को गलत रूप से शामिल करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जाट जैसे राजनीतिक रूप से संगठित वर्ग को शामिल किए जाने से दूसरे पिछड़े वर्गों के कल्याण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

पीठ ने यह भी कहा कि हालांकि भारत सरकार को संवैधानिक योजना के तहत किसी खास वर्ग को आरक्षण मुहैया कराने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन उसे जाति के पिछड़ेपन के बारे में दशकों पुराने निष्कर्ष के आधार पर ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। यह फैसला ‘ओबीसी रिजर्वेशन रक्षा समिति’ की दायर जनहित याचिका पर आया है। इस समिति में केंद्र की पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल समुदायों के सदस्य शामिल हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि चार मार्च की अधिसूचना तत्कालीन केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले जारी की थी, ताकि तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी को वोट जुटाने में मदद मिल सके। शीर्ष अदालत ने एक अप्रैल को केंद्र से पूछा था कि उसने जाट समुदाय को आरक्षण के लाभों से दूर रखने के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीएसी) की सलाह की कथित अनदेखी क्यों की।

अदालत ने यह भी कहा था कि मामला गंभीर है और सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह इसके समक्ष फैसले से संबंधित सभी सामग्री, रिकॉर्ड और फाइलें रखे। जिससे कि यह देखा जा सके कि चार मार्च को अधिसूचना जारी करते समय सरकार ने दिमाग लगाया था या नहीं।

वर्तमान राजग सरकार ने जाट समुदाय को केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल करने के यूपीए सरकार के फैसले का पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में समर्थन किया था। इसने कहा था कि मंत्रिमंडल ने फैसला करने से पहले भारतीय सामाजिक विज्ञान व अनुसंधान परिषद (आइसीएसएसआर) की गठित एक विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का संज्ञान लिया था। इसने कहा था कि सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के नजरिए को खारिज किया और विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों के आधार पर फैसला किया।

अदालत ने जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था और इसके अनुपालन में हलफनामा दायर किया गया। संगठन के अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले दिल्ली निवासी तीन अन्य व्यक्तियों- राम सिंह, अशोक कुमार और अशोक यादव ने भी केंद्र की अधिसूचना को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने अन्य वर्गों के मुकाबले काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।

याचिकाकर्ताओं ने यह व्यवस्था देने के लिए निर्देश दिए जाने का आग्रह किया था कि जाट समुदाय पिछड़ा वर्ग नहीं है और वह ओबीसी सूची में शामिल किए जाने का हकदार नहीं है। साथ ही एनसीबीसी के निष्कर्षों को जोड़ने का भी आग्रह किया गया। जिसने 26 फरवरी 2014 की रिपोर्ट में जाट समुदाय को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने के केंद्र के आग्रह को खारिज कर दिया था।

उधर केंद्र की ओबीसी सूची में जाटों को शामिल किए जाने संबंधी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट के रद्द किए जाने के बीच अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने कहा कि अदालत में समीक्षा याचिका दायर की जाएगी। मलिक ने कहा कि जरूरत पड़ने पर सरकार पर इस बात के लिए भी दबाव डाला जाएगा कि वह जाटों को आरक्षण देने के लिए संसद में कानून पारित करे। मलिक ने कहा कि वे अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। सरकार को इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की जानी चाहिए।

मलिक ने कहा कि पहले समीक्षा याचिका दायर की जाएगी। उसके बाद भी अदालत का फैसला जाटों के हित में नहीं आने पर आंदोलन किया जाएगा और सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाया जाएगा कि शाहबानो मामले की तरह ही वह जाटों को आरक्षण देने के लिए संसद में कानून बनाए। जद (एकी) सांसद केसी त्यागी ने भी अदालत के फैसले पर चिंता जताई है और राजग सरकार पर तोहमत मढ़ते हुए कहा है कि उसने अदालत में सरकार का पक्ष कारगर तरीके से नहीं रखा।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories