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4600 दिन की देरी से बोफोर्स केस दोबारा खोलना चाहती थी सीबीआई! सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

जांच एजेंसी ने 31 मई, 2005 को दिल्ली हाई कोर्ट के द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ इसी साल 2 फरवरी को अपील की थी। इस तरह सीबीआई ने इस मामले में फैसले के खिलाफ अपील करने में 4,600 दिनों से ज्यादा की देर की है।

भारत और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 24 मार्च 1986 को समझौता हुआ था। Express photo by Arul Horizon.

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (2 नवंबर) को बोफोर्स मामले में सीबीआई के द्वारा दाखिल की गई याचिका की सुनवाई से इंकार ​कर दिया। जांच एजेंसी ने 31 मई, 2005 को दिल्ली हाई कोर्ट के द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ इसी साल 2 फरवरी को अपील की थी। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस रंजन सोढ़ी ने इस मामले में 31 मई, 2005 को हिन्दुजा बंधुओं यानी श्री चंद हिन्दुजा, गोपीचंद हिन्दुजा और प्रकाश चंद हिन्दुजा समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। इस तरह सीबीआई ने इस मामले में फैसले के खिलाफ अपील करने में 4,600 दिनों से ज्यादा की देर की है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने की। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ये इजाजत दे दी कि वह याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल के द्वारा दायर की गई याचिका में बतौर पक्षकार अपना पक्ष रख सकते हैं। भाजपा नेता और एडवोकेट अजय अग्रवाल इस मामले को करीब एक दशक से देख रहे हैं। उन्होंने स्वयं से साल 2005 में इस संबंध में अपील की थी। ये अपील तब की गई थी जब सीबीआई 90 दिन की जरूरी अवधि में हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकी थी।

बता दें कि अजय अग्रवाल ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में रायबरेली लोकसभा सीट से तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। अजय अग्रवाल ने अपने द्वारा दाखिल की गई याचिका में सीबीआई को भी पक्षकार बनाया था। अग्रवाल की याचिका दाखिल हो चुकी है और उसकी सुनवाई अभी लंबित चल रही है।

एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद ये उम्मीद की जा रही थी कि सीबीआई या तो इस मामले में खुद अलग से कोई याचिका दायर करेगी या फिर अग्रवाल की या​चिका में पक्षकार के तौर पर पैरवी करेगी। काफी विवेचना के बाद, इसी साल सीबीआई ने सरकार से अनुमति मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। माना जा रहा है कि सीबीआई ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की सलाह पर हाई कोर्ट के फैसले को एक दशक से ज्यादा समय बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। यह केस 1987 में सामने आया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर भी इसमें शामिल होने के आरोप लगे थे।

गौरतलब है कि स्वीडन से बोफोर्स तोप खरीदने के लिए 64 करोड़ रुपये दलाली के आरोप यूरोपीय व्यापारी हिन्दुजा बंधुओं समेत तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और इटैलियन बिजनेसमैन ओतावियो क्वात्रोच्ची पर लगे थे। उस समय सियासी जगत में इस पर काफी हंगामा हुआ था। भारत और स्वीडिश आयुध निर्माण कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1437 करोड़ रुपये मूल्य के 155एमएम के कुल 400 हॉवित्सजर गन खरीदने का सौदा 24 मार्च 1986 को हुआ था। इसके बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो ने दावा किया था कि कंपनी ने इस रक्षा सौदे को पाने के लिए भारत में उच्च पदस्थ राजनीतिज्ञों और रक्षा अधिकारियों को दलाली दी है। बाद में सरकार ने इसकी जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया था। सीबीआई ने 22 जनवरी, 1990 को इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी। सीबीआई ने बिन चड्ढा और हिन्दुजा भाइयों को मामले में मुख्य आरोपी बनाया था।

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