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सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों की ली खबर, पूछा- कोविड वैक्सीन की कीमतों में इतना फ़र्क कैसे?

रेमडिसिवर कोई प्राइवेट आदमी कैसे स्टोर कर सकता है? वैक्सीनों की कीमतें अलग-अलग क्यों? एफीडेविट में सच क्यों नहीं बताते? निर्बाध अंतर्राज्यीय ऑक्सीजन सप्लाई केंद्र नहीं तो कौन सुनिश्चित करेगा?

corona virusकानपुर में अस्पताल के बाहर बैठी मरीज की रिश्तेदार। फोटो- पीटीआई

इन दिनों अदालतें सरकारों की खूब खबर ले रही हैं। जहां एक तरफ दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी की सरकार को जमकर लताड़ लगाई तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि इस स्थिति को मूकदर्शक बनकर देखा नहीं जा सकता है।

*बॉम्बे हाइकोर्ट का केंद्र सरकार से सवाल है कि कोई प्राइवेट आदमी भला किस तरह रेमडिसिविर जैसी दवा मैन्यूफैक्चरर से सीधे खरीद कर बांट सकता है?

*सुप्रीम कोर्ट केंद्र से यह समझाने को कह रहा है कि कोविड वैक्सीनों की कीमतों में इतना फर्क कैसे? यह भी पूछा है कि पहली तारीख से जब 18 से 45 साल वाले वैक्सीन के लिए उमड़ेंगे तो उससे निपटने की क्या रणनीति बनाई है।

*गुजरात हाइकोर्ट सरकार को फटकार रहा है कि आपका हलफनामा सच बताने की जगह हालात की गुलाबी-गुलाबी तस्वीर पेश कर रहा है।

*मध्य प्रदेश हाइकोर्ट केंद्र सरकार को बता रहा है कि ऑक्सीजन की निर्बाध सप्लाइ सुनिश्चित करना आपका धर्म है। यूपी या कोई दूसरा राज्य सप्लाइ को रोक नहीं सकता।

बॉम्बे हाइकोर्टः पांच किसानों ने हाइकोर्ट से मांग की थी कि अहमद नगर से भाजपा के सांसद डॉ सुजय विखे के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए। इन किसानों का सवाल था कि सांसद आखिर किस तरह दिल्ली में रेमडिसिवर के दस हजार इंजेक्शन सीधे खरीद सका और उन्हें चार्टर्ड विमान से लाकर यहां महाराष्ट्र में बांट सका।

अदालत ने यही सवाल केंद्र सरकार से पूछ लिया कि आखिर ऐसा किस तरह हो रहा है। इस पर जब असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ये बातें तो न्यूज-रिपोर्ट में कही गई हैं तो अदालत ने उनकी बात काट कर कहा कि सांसद ने खुद सोशल मीडिया में लिखा था कि वे दवा ले आए हैं।

सुप्रीम कोर्टः सबसे बड़ी अदालत ने वैक्सीनों के दामों में फर्क का मामला खुद-ब-खुद, सुओ मोटो उठा लिया और सरकार से पूछ डाला कि इनके दामों में अंतर का आधार क्या है। जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस रवीन्द्र भट और नागेश्वर राव की पीठ ने सरकार से इस बाबत हलफनामा मांगा है। अगर वैक्सीन निर्माता अलग-अलग कीमतें पेश कर रही हैं तो आखिर सरकार क्या कर रही है। अदालत ने ड्रग्स कंट्रोल एक्ट के अंतर्गत सरकार को हासिल अधिकारों की याद दिलाई और कहा कि इन अधिकारों का इस्तेमाल इस संकट काल में नहीं तो कब।

अदालत ने इसी के साथ सरकार को यह बताने को भी कहा है कि जब एक मई से वैक्सीन लगवाने वाले युवाओं का हुजूम उमड़ेगा तो वैक्सीनों की बढ़ी हुई मांग से निपटने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।

मप्र हाइकोर्टः ऑक्सीजन टैंकर को रोकने के एक मामले की सुनवाई में अदालत ने कहा कि इस प्राण रक्षक गैस की निर्बाध सप्लाइ की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। दरअसल, बोकारो से सागर, मप्र के लिए चला एक ऑक्सीजन टैंकर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने रूट बदलवा कर झांसी पहुंचा दिया था। यही केस सामने आया तो अदालत ने कहा कि केंद्र ही विभिन्न राज्यों के लिए ऑक्सीजन का कोटा तय करता है। यह उसकी ही जिम्मेदारी है कि अंतर्राज्यीय परिवहन में कोई अड़चन न आए और राज्यों को अपना कोटा मिले।

गुजरात हाइकोर्टः बीस अप्रैल को जारी निर्देश पर राज्य सरकार ने अदालत में हालात पर हलफनामा पेश किया। अदालत ने उसे पढ़ कर नाराज़गी जताते हुए कहा कि हकीकत की बजाए इसमें मीठी-मीठी बातें की गई हैं। अदालत ने सरकार से दरअसल रेमडिसिवर वितरण पॉलिसी के बारे में पूछा था। वैसे मंगलवार को सुनवाई का मुख्य मुद्दा प्राइवेट एम्बुलेंस से सरकारी अस्पताल जाने वाले मरीजों को लौटाए जाने का था। शिकायत थी कि सरकारी अस्पताल केवल सरकारी एम्बुलेंस से लाए गए मरीजों को भर्ती करते हैं और प्राइवेट वालों को लौटा देते हैं। कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई कि डॉक्टर किसी मरीज को एम्बुलेंस के आधार पर मना नहीं कर सकते।

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