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केंद्र सरकार को बड़ा झटका, पांच जजों की संविधान पीठ ने वित्त कानून 2017 में संशोधन को किया खारिज, ट्रिब्यूनल्स में बहाली के लिए बनाने होंगे नए नियम

क्या संशोधनों को मनी बिल के रूप में पारित किया जा सकता है? इस मुद्दे पर अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास विचार के लिए भेज दिया। शीर्ष न्यायालय ने फरवरी 2018 में इन संशोधनों पर रोक लगा दी थी।

Author नई दिल्ली | Updated: November 14, 2019 8:06 AM
एनजीओ सोशल एक्शन फॉर फोरेस्ट एंड इन्वायरमेंट ने सुप्रीम कोर्ट में इन संशोधनों को चुनौती दी थी। (फाइल फोटो)

 Apurva Vishwanath

केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 2017 वित्त कानून के संशोधित प्रावधानों पर रोक लगा दी। इस कानून को मनी बिल के रूप में पारित कराया गया था। इससे विभिन्न ट्रिब्यूनल्स की संरचना और कार्यप्रणाली में बदलाव किया गया था।

पीठ ने सरकार को ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति के संदर्भ में नए नियम बनाने का निर्देश दिया है। पीठ में शामिल अन्य सदस्यों जस्टिस एनवी रमना, डीवाई चंद्रचूड़, दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना ने कहा कि संशोधनों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है क्योंकि यह संविधान में वर्णित सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत हैं।

क्या संशोधनों को मनी बिल के रूप में पारित किया जा सकता है? इस मुद्दे पर अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास विचार के लिए भेज दिया। शीर्ष न्यायालय ने फरवरी 2018 में इन संशोधनों पर रोक लगा दी थी। पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वह न्यायालय द्वारा दिए गए सिद्धांतों के अनुरूप नियमों को फिर से तैयार करें और यह सुनिश्चित करें कि नियम गैर-भेदभावपूर्ण हैं और सेवा के समान शर्तें हैं जिनमें सुनिश्चित कार्यकाल शामिल है।

अदालत ने यह भी कहा कि जब तक नए नियम तैयार नहीं किए जाते, तब तक नियुक्तियां मौजूदा कानूनों के अनुसार होंगी, न कि वित्त अधिनियम, 2017 के तहत। अदालत ने फरवरी 2018 में संशोधनों पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि जब तक अधिनियम के प्रावधान को चुनौती नहीं दी जाती है, तब तक सभी ट्रिब्यूनल्स में नियुक्तियां पहले के नियमों के अनुसार की जाएंगी।

संशोधनों ने केंद्र को नियुक्तियों को संचालित करने और ट्रिब्यूनल्स के सदस्यों की सेवा शर्तों और शर्तों को संशोधित करने की शक्ति दी। संशोधन के बाद, सरकार ने 8 ट्रिब्यूनल्स का विलय कर दिया, जिससे कुल ट्रिब्यूनल्स की संख्या 24 से घटकर 19 हो गई।

एनजीओ सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट (SAFE) ने वित्त अधिनियम में संशोधनों को अवैध करार दिया था और तर्क दिया था कि इससे न्यायाधिकरणों के कामकाज और स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, विशेषकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी)।

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