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‘लोमड़ी और मुर्गी को एक पिंजड़े में रखने का ख्‍वाब है भारत-चीन दोस्‍ती की उम्‍मीद’

सुप्रीम कोर्ट पूर्व जज काटजू के मुताबिक, आज दुनिया के लिए खतरा अमेरिका या यूरोप नहीं बल्कि चीन है, क्योंकि चीन दुनिया में आक्रामक विस्तार के रास्ते पर चल रहा है।

china productsसीमा पर तनाव के बाद भारत में चीन को लेकर लगातार बढ़ रही नफरत।

चीन ने लद्दाख में गलवान घाटी पर अवैध कब्जा कर लिया है और उसकी सेना ने भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 जवानों को मार दिया है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह घटना केवल सीमा के मुद्दे को लेकर किसी गलतफहमी  के कारण हुई है , लेकिन वे गलत हैं और उन सभी को अपनी आँखों से पर्दा हटाकर वास्तविक सत्य को देखने की ज़रुरत है। इस स्थिति को समझने के लिए कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को जानना ज़रूरी है।

आज का चीन साम्यवादी देश होने का केवल दिखावा करता है, लेकिन वास्तव में यह एक पूंजीवादी देश बन चुका है। यह लाभदायक निवेश, कब्जा करने के लिए बाजारों और सस्ते कच्चे माल  को प्राप्त करने के लिए पूंजी की तलाश में है। औद्योगिकीकरण के बाद एक निश्चित स्तर पर विकसित होने वाला देश साम्राज्यवादी हो जाता है, अर्थात यह विदेशी बाजारों और कच्चे माल की तलाश करता है। इसीलिए इंग्लैंड ने भारत पर विजय प्राप्त की और फ्रांस ने अल्जीरिया और वियतनाम पर। साम्राज्यवाद दो प्रकार के होते हैं, विस्तारवादी साम्राज्यवाद और रक्षात्मक साम्राज्यवाद। इनमें दूसरा कहीं अधिक खतरनाक होता है ।

1930 और 1940 के दशक में दुनिया के लिए  नाज़ी जर्मन साम्राज्यवाद वास्तविक खतरा था न कि ब्रिटिश या फ्रांसीसी साम्राज्यवाद। इसका कारण यह था कि हिटलर का साम्राज्यवाद विस्तारवादी और आक्रामक साम्राज्यवाद था, जबकि ब्रिटिशोंऔर फ्रांसीसियों का रक्षात्मक साम्राज्यवाद। दूसरे शब्दों में, ब्रिटिश और फ्रांस केवल अपने उपनिवेशों पर कब्जा बनाये रखना  चाहते थे जब की नाज़ी अन्य देशों को जीतना और गुलाम बनाना चाहते थे।

इसी तरह, आज दुनिया के लिए खतरा अमेरिका या यूरोप नहीं बल्कि चीन है, क्योंकि चीन दुनिया में आक्रामक विस्तार के रास्ते पर चल रहा है। वह बड़े पैमाने पर अपने माल और सस्ते रॉ मटीरियल्स के लिए बाजार की तलाश, अपने विशाल 3.2 ट्रिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा रिजर्व के लाभदायक निवेश के लिए आक्रामक विस्तारवाद की राह पे तेज़ी से बढ़ रहा है। इसी कारण से चीन दुनिया के लिए आज सबसे बड़ा खतरा है।

यह सच है कि वे वर्तमान में चीन नाजी जर्मनी की तरह सैन्य रूप से विस्तार नहीं कर रहा  है, लेकिन वे दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था को भेद कर, उसे कमतर कर आक्रामक रूप से आर्थिक विस्तार कर रहा है।  पिछले एक दशक में चीनी विदेशी निवेश आसमान छू चुका है। आज चीनी लगभग हर जगह हैं- एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और निस्संदेह संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में भी।

उनका बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव सड़कों, रेलवे, तेल पाइपलाइनों, बिजली ग्रिड, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का एक नेटवर्क है जो चीन को दुनिया से जोड़ता है। इसका उद्देश्य चीन और बाकी यूरेशिया के बीच बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी में सुधार करना है ताकि चीन इन पर हावी हो सके। चीन का ध्यान अक्सर बंदरगाहों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर रहा है। पाकिस्तान में ग्वादर, ग्रीस में पीरियस और श्रीलंका में हंबनटोटा इसका उदाहरण है, जिसका उद्देश्य इन देशों में एक रणनीतिक पायदान हासिल करना है।

जिस कीमत पर अमेरिकी या यूरोपीय निर्माता सामान बेच सकते हैं (अपनी उच्च श्रम लागत को देखते हुए), उससे आधी कीमत पर सामान बेचकर, चीनियों ने कई अमेरिकी और यूरोपीय उद्योगों को नष्ट कर दिया है। अब चीनी अविकसित देशों में बाजारों और कच्चे माल को बहुत कम दामों पर डंप करके स्थानीय उत्पाद को अप्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान सस्ते चीनी सामानों से भरा पड़ा है। विदेशी बाजारों पर कब्जा करते समय, चीनी उच्च टैरिफ द्वारा सावधानीपूर्वक अपनी रक्षा करते आये हैं।  इस बात का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को देना चाहिए कि उन्होंने चीन के इस झांसे को सबके सामने रखा और चीन को स्पष्ट रूप से कहा कि यह नहीं चलेगा। जब अमेरिका में कारों के आयात के लिए केवल 2.5 %  टैरिफ लगता है, तो चीन में ऑटोमोबाइल के आयात पर 25% टैरिफ नहीं लगाया जा सकता।

ट्रम्प ने कई चीनी सामानों पर शुल्क लगाया है और भविष्य में और अधिक शुल्क लगाने की घोषणा की है। इस फैसले के कारण चीन ने प्रतिशोधी टैरिफ की घोषणा की, परन्तु इस से अमेरिकियों को थोड़ा नुकसान भी होगा। यह सर्वविदित है कि चीन में कोई व्यावसायिक नैतिकता नहीं है। यही कारण है कि कई अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियां चीन मुख्य-भूमि से चीनियों को काम पर रखने से हिचकते हैं क्योंकि वे अक्सर औद्योगिक रहस्यों की जासूसी करते हैं। चूंकि, मैं एक भारतीय हूं, इसलिए मैं भारत के साथ चीन के आर्थिक संबंधों का उल्लेख करना चाहूंगा।

जैसा कि सब जानते हैं, भारत 1947 तक एक ब्रिटिश उपनिवेश था और ब्रिटिश नीति भारत को औद्योगीकरण से दूर रखने की थी।  हालाँकि, आजादी के बाद भारत में कुछ हद तक औद्योगिकीकरण हुआ और हमने उन चीज़ों का उत्पादन शुरू किया, जिन्हे हमें पहले इम्पोर्ट करना पड़ता था। अब कुछ हद तक चीनियों ने हमारे घरेलू बाजार में प्रवेश कर, अपनी जगह बना ली है।

चीन को भारतीय निर्यात मात्र 16 बिलियन डॉलर का है, मुख्य रूप से कच्चे माल का लेकिन चीन से भारत का आयात 68 बिलियन डॉलर का है, जिसमें मुख्य रूप से मूल्य वर्धित सामान हैं। जैसे मोबाइल फोन, प्लास्टिक, इलेक्ट्रिकल सामान, मशीनरी और इन चीज़ों को बनाने में  लगने वाले पुर्ज़े। यह एक उपनिवेश और साम्राज्यवादी देश के बीच का जैसा संबंध है। चीनी कंपनियां आक्रामक मूल्य निर्धारण, स्टेट सब्सिडी, संरक्षणवादी नीतियों और सस्ते वित्तपोषण का उपयोग करती हैं। कुछ क्षेत्रों में चीनी कंपनियों का भारतीय बाजार पर वर्चस्व है। दूरसंचार क्षेत्र में 51% चीनी कब्जा है। भारतीय घरों में चीनी सामानों की भरमार है। फिटिंग, लैंपशेड, ट्यूबलाइट आदि।

अब चीनी इस से भी कई कदम आगे जाना चाहते हैं। उनकी कंपनियों जैसे हुआवेई, जेड टी ई, लेनोवो, श्याओमी, सीएसआईटीईसी, सीएमआईईसी, हायर, टीसीएल, जिआंगसु ओवरसीज ग्रुप कंपनियों और फाइबरहोम टेक्नोलॉजीज को दुनिया भर में फैलाने के लिए चीन सरकार और आक्रामक कूटनीति द्वारा सहायता प्राप्त है।

ये कंपनियां उच्च तकनीक, इंटरकॉम, कंप्यूटर, धातु विज्ञान, स्टील आदि जैसे क्षेत्रों में हैं और भारत में जड़ें जमा चुकी हैं। जो लोग सोचते हैं कि मीठे शब्दों और चापलूसी से चीनी खतरे को कम किया जा सकता है, वह सभी चीनी साम्राज्यवाद की प्रकृति को समझने में विफल रहे हैं। चीनी साम्राज्यवाद लोहे की भाँति कठोर आर्थिक कानूनों पर आधारित है, जो व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाओं के निरपेक्ष काम करता है।

यह सोचते रहना कि भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार हो सकता है, केवल इच्छा से पूर्ण सोच है। ऐसी कल्पना करना यह कहने के सामान है जैसे कि लोमड़ी और मुर्गी एक ही पिंजड़े में साथ रह  सकते हैं। इस खतरे को नजरअंदाज करना एक शुतुरमुर्ग की भाँति बर्ताव करने जैसा होगा, जैसा कि नेविल चेम्बरलेन ने किया था। वह सोचते रहे कि हिटलर से कोई  खतरा नहीं है पर जब उन्हे यह अहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। यहां व्‍यक्‍त विचार उनके निजी हैं।)   

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