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214 कोयला खानों के आबंटन रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने 218 में से महज 4 खदानों को बख्शा

नई दिल्ली। कारपोरेट जगत के लिए एक जबर्दस्त झटका भरे घटनाक्रम में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न कंपनियों को 1993 से आबंटित किए गए 218 कोयला खदानों में से 214 के आबंटन रद्द कर दिए। दावा किया गया है कि इन कोयला खदानों में करीब दो लाख करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है। […]

Author September 25, 2014 7:44 AM

नई दिल्ली। कारपोरेट जगत के लिए एक जबर्दस्त झटका भरे घटनाक्रम में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न कंपनियों को 1993 से आबंटित किए गए 218 कोयला खदानों में से 214 के आबंटन रद्द कर दिए। दावा किया गया है कि इन कोयला खदानों में करीब दो लाख करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है। प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सिर्फ चार कोयला खदानों का आबंटन रद्द किए जाने की कार्रवाई से बख्शा।

रद्द होने से बचे कोयला ब्लाकों में एनटीपीसी और सेल के एक-एक ब्लाक और दो ब्लाक अति वृहद विद्युत परियोजनाओं के लिए दिए गए हैं। पीठ में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और कुरियन जोसफ भी शामिल हैं। अदालत ने जिन कंपनियों के कोयला ब्लाक रद्द किए हैं उन्हें उनमें अपना कामधाम समेटने के लिए छह हफ्ते का वक्त दिया है। अदालत ने इस फैसले से कंपनियों को सरकार के राजस्व के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया जिन्होंने अभी तक कोयला निकासी का काम चालू नहीं किया था। अदालत ने कैग के इस निष्कर्ष को स्वीकार किया कि इन कोयला ब्लाकों में उत्पादन चालू नहीं होने के कारण 295 रुपए प्रति टन की दर से राजस्व का नुकसान हुआ। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में राजग सरकार के इस दृष्टिकोण का भी संज्ञान लिया कि अगर कोयला खदानों का आबंटन रद्द किया जाता है तो वह इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का सामना करने के लिए तैयार है।

इस मामले की पहले सुनवाई के दौरान यूपीए सरकार ने कोयला ब्लाकों के आबंटन रद्द करने का विरोध करते हुए कहा था कि आबंटन के बाद से इनमें विभिन्न कंपनियों ने करीब दो लाख करोड़ रुपए निवेश किए हैं। शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को अपने फैसले में सरकार के 1993 से विभिन्न कंपनियों को आबंटित सारे कोयला खदानों के आबंटन गैरकानूनी और मनमाने घोषित कर दिए थे। शीर्ष अदालत ने 1993 से किए गए कोयला आबंटनों के लिए स्क्रीनिंग समिति की 36 बैठकों में अपनाई गई प्रक्रियाओं की निंदा करते समय हर तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था। लेकिन उस समय ये आबंटन रद्द नहीं किए थे। अदालत ने कहा था कि इसके परिणामों से उत्पन्न स्थिति पर विचार करना होगा।

अदालत ने 2010 में शुरू हुई नीलामी की प्रक्रिया से पहले के सभी 218 कोयला ब्लाकों के आबंटनों की जांच की थी और कहा था कि गंभीरता से विचार किए बगैर और जनहित को ध्यान में रखे बगैर ही बहुत ही लापरवाह तरीके से इनका आबंटन किया गया था। अदालत ने कहा था कि कोयला जैसी राष्ट्रीय संपदा का वितरण अनुचित तरीके से किया गया था और आबंटन में निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं थी। साथ ही कहा था कि 14 जुलाई 1993 से जांच समिति की 36 बैठकों में कोयला खदानों के आबंटन के बारे में की गई सारी सिफारिशें मनमानी थीं और इसमें अदालत ने अपने 163 पेज के फैसले में कहा था कि स्क्रीनिंग समिति के काम में कभी भी तारतम्यता नहीं थी और इसमें पारदर्शिता का अभाव था। कई मामलों में तो समिति के सामने कोई सामग्री और संबंधित तथ्य भी नहीं थे।

फैसले को थोड़ा कठोर बताते हुए उद्योग मंडल एसोचैम ने कहा कि इससे आयात पर निर्भरता बढ़ेगी। एसोचैम के अध्यक्ष राणा कपूर ने कहा-हमारी मुख्य चिंता अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को लेकर है। जिसमें दो साल की नरमी के बाद अब पुनरुद्धार के संकेत दिख रहे हैं। तापीय बिजली पर निर्भरता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इससे आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ेगा। साथ ही कोयला आयात पर निर्भरता बढ़ेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार कोयला खानों के तेजी से आबंटन को लेकर नई प्रणाली की जल्द घोषणा करेगी।

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