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जल्लीकट्टू : केंद्र की अधिसूचना पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

तमिलनाडु में पोंगल के मौके पर अब जल्लीकट्टू खेल नहीं हो सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसके आयोजन पर लगा प्रतिबंध हटाने संबंधी केंद्र की अधिसूचना पर मंगलवार को रोक लगा दी..
Author नई दिल्ली/चेन्नई | January 13, 2016 02:12 am
जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल के त्योहार के हिस्से के तौर पर मट्टू पोंगल के दिन आयोजित किया जाता है (फाइल फोटो)

तमिलनाडु में पोंगल के मौके पर अब जल्लीकट्टू खेल नहीं हो सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसके आयोजन पर लगा प्रतिबंध हटाने संबंधी केंद्र की अधिसूचना पर मंगलवार को रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और तमिलनाडु सरकार के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि जल्लीकट्टू प्राचीन परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है और इसे नहीं रोका जाना चाहिए क्योंकि सरकार की सात जनवरी की अधिसूचना में सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान हैं। उधर, बंबई हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की इस रोक के बाद जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए केंद्र की अधिसूचना के खिलाफ दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी रमण के पीठ ने अपने आदेश में कहा – ‘अंतरिम उपाय के रूप में हम निर्देश देते हैं कि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 7 जनवरी, 2016 को जारी अधिसूचना पर रोक रहेगी।’ कोर्ट ने इसके साथ ही अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किए।

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड और पेटा सहित विभिन्न संगठनों की याचिकाएं सवेरे प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाले पीठ के समक्ष सूचीबद्ध थीं। लेकिन प्रधान न्यायाधीश ने इन याचिकाओं को न्यायमूर्ति मिश्रा की अध्यक्षता वाले पीठ के पास भेज दिया था क्योंकि न्यायमूर्ति ठाकुर के साथ पीठ में उपस्थित न्यायमूर्ति भानुमति ने इसकी सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल, आनंद ग्रोवर, सीए सुंदरम और सिद्धार्थ लूथरा सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने शीर्ष अदालत के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया। इनका तर्क था कि 21वीं सदी में संस्कृति और परंपरा के नाम पर पशु के साथ क्रूरता नहीं की जा सकती है।

दूसरी ओर, केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने इस अनुरोध का विरोध किया और कहा कि किसी भी याचिकाकर्ता संगठन के किसी मौलिक अधिकार का हनन नहीं हुआ है और वैसे ही अधिसूचना में इस बात का ध्यान रखा गया है कि जल्लीकट्टू के दौरान सांडों के साथ किसी प्रकार की क्रूरता नहीं की जाए। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत जिला कलक्टर या आयुक्तों को जल्लीकट्टू के आयोजन की देखरेख करने और अदालत में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कह सकती है।

अटार्नी जनरल ने क्रिकेट के मामले में न्यायमूर्ति लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी खेल में कुछ गलत है तो ऐसे खेल पर पाबंदी लगाने की बजाय उस गलती को दुरुस्त करना चाहिए।
तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस नफडे और एल नागेश्वर राव ने जल्लीकट्टू के खिलाफ याचिकाओं का विरोध किया और कहा कि इस अधिसूचना के मद्देनजर यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं कि किसी भी सांड के साथ क्रूरता नहीं हो।

इन तमाम दलीलों का पीठ पर कोई असर नहीं हुआ और उसने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी और केंद्र व तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात सरीखे राज्यों को इस पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
यह अधिसूचना जारी करते समय केंद्र ने इसमें कुछ शर्तें लगाई थीं। इसमें कहा गया था कि बैलगाड़ियों की दौड़ का आयोजन सही तरीके से बने मैदान में होगा और दौड़ दो किलोमीटर से अधिक नहीं होगी।

उधर, बंबई हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति वीएम कनाडे और न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे का खंडपीठ सामाजिक कार्यकर्ता लोरेंजो स्टेनडेन और गार्गी गोगोई की दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ को मामले में पेश हो रहे वकीलों ने सूचित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना पर रोक लगा दी है और मामले पर अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी। इस पर न्यायमूर्ति कनाडे ने कहा-‘चूंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है, इसलिए हमारे लिए जरूरी नहीं रह गया है कि इन याचिकाओं में किए गए राहत दावों पर हम विचार करें।’’ उन्होंने जनहित याचिकाओं की सुनवाई के लिए नौ फरवरी की तारीख तय की।

जयललिता ने कहा, अध्यादेश जारी करे केंद्र 

केंद्र की अधिसूचना पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने जल्लीकट्टू के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अध्यादेश जारी करने की अपील की है। जयललिता ने कहा-‘मुद्दे की तात्कालिकता को देखते हुए मैं जल्लीकट्टू के आयोजन को संभव बनाने के लिए तत्काल अध्यादेश जारी करने के अपने अनुरोध को मजबूती से दोहराती हूं।’ प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा-‘तमिलनाडु के लोगों की ओर से मैं आपसे इसे लेकर तत्काल कार्रवाई करने की अपील करती हूं।’

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  1. अशोक.गोविंद.शहा
    Jan 13, 2016 at 12:08 am
    वन्दे मातरम- ऐसे छोटे छोटे विवादोपर अध्यादेश जारी करना उचित नहीं होगा तमिलनाडु,और केंद्र सरकार दूसरे पर्यायोको तलाश सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने वर्षोसे चली आ रही परंपरा को बंद करके समाज में विवाद खड़ा किया है गाय,मुर्गी,बकरा काटने वालो के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट करवाई करेगी? जा ग ते र हो
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