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राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने की कोई टाइमलाइन है क्या? SC ने पूछा तो सॉलिसिटर बोले- ‘चार हफ्ते दीजिए फिर बताऊंगा’

केंद्रीय मंत्रालय ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दया याचिका और क्यूरेटिव पिटीशन के नियम बदलने की मांग की थी।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: May 27, 2020 1:42 PM
supreme courtतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

देश को चौंकाने वाले दिल्ली गैंगरेप कांड में वकीलों ने दोषियों की फांसी टालने के लिए निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में दया याचिका से लेकर क्यूरेटिव पिटीशन तक का तरीका अपनाया था। इस पर इसी साल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। आज जब सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर गृह मंत्रालय से सवाल पूछा, तो सॉलिसिटर जनरल बिना तैयारी के दिखे। उन्होंने कोर्ट से कहा कि वे 4 हफ्ते बाद इस सवाल के जवाब के साथ मौजूद होंगे।

दरअसल, कोर्ट ने पूछा था कि दोषियों की ओर से दया याचिका लगाए जाने के बाद क्या गृह मंत्रालय की राष्ट्रपति के सामने इन दया याचिकाओं को रखने की कोई टाइमलाइन (अवधि) होती है? इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि वे जल्द इस सवाल का जवाब देंगे।

दया याचिका के संदर्भ में क्या बदलवाना चाहती है केंद्र सरकार?
केंद्र सरकार की मांग है कि कोर्ट मौत की सजा पाए दोषियों की क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने की समयसीमा निर्धारित कर दे और उन्हें डेथ वॉरंट जारी होने के बाद दया याचिका दायर करने के लिए सिर्फ 7 दिन का समय दिया जाए। दरअसल, 16 दिसंबर के दिल्ली गैंगरेप और मर्डर केस में दोषियों की फांसी में क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका दायर करने में काफी समय लगा। वकीलों ने इस कमी का फायदा उठाते हुए चारों दोषियों के लिए अलग-अलग दया याचिका दायर की और उनके कई डेथ वॉरंट टल गए।

इसके जरिए दोषियों की फांसी की सजा कई महीनों तक टलती रही और कानून की इस खामी को दूर करने की मांग उठने लगी। सॉलिसिटर जनरल ने इस मामले में केंद्र की तरफ से पेश होने के बाद कहा था कि घृणित अपराध करने वाले फांसी की सजा पाए कई दोषी अनुच्छेद 21 (जीने और निजी स्वतंत्रता) के तहत मिले अधिकारों का फायदा उठाकर न्यायिक व्यवस्था का मजाक बनाते हैं। वे समाज के विवेक को डिगाते हैं। कई लोग न्याय में देरी के लिए इसे औजार की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं।

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