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राफेल: सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से मांगी सौदे की जानकारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार यह बताए कि कैसे डील फाइनल हुई। मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल से कहा, "सरकार से कहिए कि राफेल विमान को लेकर हुई डील की प्रक्रिया के बारे में कोर्ट को सूचित किया जाए।"

Author Updated: October 10, 2018 5:35 PM
राफेल डील में कोर्ट ने सिर्फ तीन पहलुओं पर सुनवाई की और मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को एकसाथ खारिज कर दिया। (फोटो सोर्स : Indian Express)

भारत और फ्रांस के बीच हुई राफेल डील पर मोदी सरकार से अब सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी मागी है। सर्वोच्च अदातल में बुधवार को राफेल जेट को लेकर हुई डील के खुलासे की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार यह बताए कि कैसे डील फाइनल हुई। इस मामले की अगली सुनवाई इस महीने के आखिर में होगी। डील के खुलासे के लिए याचिकाएं दाखिल हुई थीं। इसमें अपील की गई थी कि, सरकार राफेल की कीमतों का खुलासा करे। राफेल पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीस रंजन गोगोई, एस.के कौल और जस्टिस जोसेफ ने कहा है, सरकार बताए कि राफेल डील को फाइनल करने के लिए जो फैसले लिए गए उनकी क्या प्रक्रिया थी।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार को दो हफ्ते से ज्यादा का समय देते हुए कहा है कि 29 अक्टूबर तक वह डील होने की प्रक्रिया उपलब्ध कराए। इस मामले में 31 अक्टूबर को अब अगली सुनवाई होगी।

मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, हम सरकार से राफेल जेट की कीमत या उनकी तकनीकी जानकारी नहीं मांग रहे। केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने कोई नोटिस या आदेश नहीं दिया है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से मांगी गई जानकारी सीलबंद लिफाफे में देने को कहा गया है।

मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि, “सरकार से कहिए कि राफेल विमान को लेकर हुई डील की प्रक्रिया के बारे में कोर्ट को सूचित किया जाए। यह आदेश केवल आश्वस्त करने के लिए है कि डील फाइनल करने में प्रक्रिया का पालन किया गया।”

बता दें, बता दें कि बीते काफी समय से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से केंद्र की मोदी सरकार को राफेल डील के मामले में लगातार घेरा जा रहा है। इस डील को लेकर मोदी सरकार पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार का आरोप लगा चुके हैं। राहुल गांधी का आरोप है कि रिलायंस के अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को सौदे से बाहर कर दिया गया।

मामले ने उस वक्त जोर पकड़ लिया जब पिछले दिनों फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में कह दिया कि रिलायंस को पार्टनर बनाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प ही नहीं था। ओलांद ने कहा था कि यह एकमात्र विकल्प भारत सरकार ने प्रस्तावित किया था। नतीजतन, राफेल बनाने वाला कंपनी दसॉल्ट के पास रिलायंस को साझेदार बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

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