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सांसदों, विधायकों की अयोग्यता पर SC का मोदी सरकार को सुझाव- स्पीकर नहीं, स्वतंत्र संस्था ले फैसला

यहां आपको बता दें कि सदस्यता रद्द करने को लेकर जो मौजूदा कानून है उसके मुताबिक स्पीकर को यह अधिकार होता है कि वो किसी सदस्य की सदस्यता रद्ध करे या बरकरार रखे।

जनप्रतिनिधियों की सदस्यता रद्द करने को लेकर अदालत ने अहम सुझाव दिये हैं।

सांसदों या विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम सुझाव मोदी सरकार को दिये हैं। जस्टिस एफ नरिमन की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि संसद को इस बात पर विचार करना चाहिए कि कोई स्वतंत्र संस्था, सांसद या विधायकों की अयोग्यता रद्द किये जाने या बरकरार रखे जाने के बारे में निर्णय ले। अदालत ने कहा कि विधायक या सासंद की सदस्यता रद्द करने में स्पीकर को दी गई शक्तियों पर फिर से विचार करने की जरुरत है। बेंच ने पूछा कि जब स्पीकर किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य होता है तब उसके फैसले पर भरोसा कैसे किया जाए? अदालत ने कहा कि अगर कोई सांसद या विधायक दल-बदल जैसे मुद्दों की वजह से अयोग्य करार दिये जाते हैं तो उन्हें एक दिन भी पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

दरअसल सदस्यता रद्द करने को लेकर जो मौजूदा कानून है उसके मुताबिक स्पीकर को यह अधिकार होता है कि वो किसी सदस्य की सदस्यता रद्ध करे या बरकरार रखे। लेकिन अब अदालत ने अहम सुझाव देते हुए कहा कि किसी रिटायर्ड जजों की कमिटी को सदस्यता रद्द करने या बरकार रखने का अधिकार दिया जाए। ये कमिटी या कोई ट्रिब्यूनल हर जगह सालों भर काम करे जहां सदस्यता से जुड़े मसले तय किए जाएं।

‘सुप्रीम’ अदालत ने यह बात मणिपुर से जुड़े एक मामले पर सुनवाई के दौरान कही है। दरअसल यहां दो विधायकों ने यहां के मंत्री श्यामकुमार की सदस्यता रद्द करने की मांग करते हुए अदालत में याचिका दायर की है। श्यामकुमार पहले कांग्रेस में थे और बाद में बीजेपी में शामिल होकर मंत्री बन गए। इस मामले में याचिकाकर्ता का कहना है कि मणिपुर के स्पीकर इसपर कोई फैसला नहीं ले रहे हैं। मंगलवार को अदालत ने मणिपुर के स्पीकर को 4 हफ्तों में फैसला लेने के लिए कहा है।

बता दें कि आम तौर पर जब दल बदल या सरकार को समर्थन देने या वापस लेने का मामला होता है तो उस सदस्य कि सदस्यता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। ऐसे में स्पीकर को अधिकार होता है कि वह सदस्य कि सदस्यता रद्द करे, बरकरार रखे, या कोई फैसला ही ना ले। लेकिन ऐसी स्थिति में मामला फिर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाता है।

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