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राजनीति: राजनीति का अपराधीकरण बनाम मतदाता

अदालत के लगातार प्रयासों का राजनीतिक दलों और मतदाताओं पर अपेक्षित असर न होना भी सिद्ध करता है कि अगर अपराधी विजेता बने हैं तो माना यह भी जाएगा कि जनता ने उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जान कर भी उनको चुना है। क्या हमें इस पर आत्मचिंतन नहीं करना चाहिए कि मतदाताओं की पसंद ऐसे उम्मीदवार क्यों बन रहे हैं? 

Author Updated: December 23, 2020 3:23 AM
Criminal politican nexusराजनीति का अपराधीकरण। सांकेतिक फोटो।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

उच्चतम न्यायालय राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक लगाने के लिए सन 2003 से ही लगातार सक्रिय है। सक्रियता के मूल में माननीय न्यायाधीशों का यह मानना भी रहा है कि जनता को उम्मीदवारों का पिछला रिकार्ड जानने का पूरा हक है। तेरह मार्च, 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश से विधानसभाओं और संसद के चुनावों में खड़े प्रत्याशियों के लिए अपनी शिक्षा, सम्पत्तियां, बैंक खाते में जमा राशि, देनदारियों के साथ-साथ अपने आपराधिक मामलों से संबंधित विवरणों को स्वयं घोषित कानूनी शपथनामे में बताना अनिवार्य कर दिया था। अदालत के इन निर्देशों के अनुपालन के लिए चुनाव आयोग की ओर से भी बाईस मार्च 2003 को आदेश जारी हो गया था। उम्मीदवारों के शपथनामों को कोई भी प्राप्त कर सकता है।

इस मसले पर उच्चतम न्यायालय ने इसी साल तेरह फरवरी के अपने एक आदेश के तहत राजनीतिक दलों के लिए अपराध के आरोपितों को उम्मीदवार बनाने पर संचार माध्यमों और सोशल मीडिया के मंचों पर भी यह बताना आवश्यक कर दिया है कि उन्होंने अपराध के आरोपित को टिकट के अन्य आकांक्षियों के ऊपर अपना अधिकृत प्रत्याशी क्यों घोषित किया है। केवल ‘जिताऊ उम्मीदवार’ की दलील देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करना होगा कि अपेक्षाकृत स्वच्छ छवि के उम्मीदवार क्यों पार्टी टिकट पाने से वंचित रह गए थे। ऐसे विवरण राजनीतिक दलों को एक से अधिक बार निश्चित अंतराल पर देने की बाध्यता है।

राजनीतिक दलों के लिए फिर उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अंतर्गत ही अपने ऐसे प्रत्याशियों के चुने जाने के बहत्तर घंटे के भीतर इसकी सूचना निर्वाचन आयोग को देने का प्रविधान भी किया गया था। अपराध में संलिप्त लोगों के कानून निर्माताओं के रूप में पहुंच की संभावनाओं को कम करने के क्रम में उच्चतम न्यायालय ने फरवरी 2020 के पहले से ही निर्वाचन आयोग को भी यह जिम्मेदारी दी हुई थी कि वह सुप्रीम कोर्ट को आपराधिक पृष्ठभूमि के विजेता उम्मीदवारों के परिप्रेक्ष्य में यह भी बताएगा कि ऐसे उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट के सारे नियमों का पालन किया है या नहीं।

उम्मीदवार अपराधी है या अन्य प्रत्याशियों के ऊपर वरीयता क्यों दी गई, यह जानकारी उजागर करने से भी राजनीतिक दलों को कोई नुकसान पहुंचा हो, कम से कम पिछले महीने संपन्न बिहार विधानसभा के चुनावों के आंकड़ों के विश्लेषणों से तो ऐसा नहीं लगता है। नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा में दो-तिहाई से ज्यादा करीब अड़सठ प्रतिशत ऐसे विधायक होंगे, जिनके विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद वे जनता की पहली पसंद रहे।

खास बात यह भी है कि यह प्रतिशत 2015 की विधानसभा में चुने गए ऐसे उम्मीदवारों से ज्यादा है। जहां चुनावी मैदान में उतरे कुल उम्मीदवारों में आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का प्रतिशत लगभग एक तिहाई था, वहीं कुल विजेता उम्मीदवारों के संदर्भ में यही अनुपात बढ़ कर दो तिहाई हो गया है। बिना आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवारों में पत्नी समेत कुछ उनके ही संबंधी होते हैं। इससे साफ लगता कि राजनीतिक दलों की अपराधी या अपराधी रहे उम्मीदवारों की ‘जिताऊ उम्मीदवार’ होने की दलील सही है।

बड़ी संख्या में अपराध आरोपितों का चुना जाना बिहार के मामले में चिंताजनक इसलिए भी है कि कुल हुए मतदान में महिला मतदाताओं का प्रतिशत ज्यादा था। महिलाओं का प्रतिशत मतदान पुरुषों से करीब पांच प्रतिशत ज्यादा था और विजेता उम्मीदवारों में इक्यावन प्रतिशत के खिलाफ कत्ल, हत्या की कोशिश, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामले हैं। ऐसे में जनता ने विकास को वोट दिया या जंगल राज के विरुद्ध वोट दिया, ऐसी दलीलें खोखली लगती हैं।

बिहार से आगे अब दिल्ली की भी बात कर लें। उच्चतम न्यायालय के 2018 में दिए गए इस निर्देश के बाद भी कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड सार्वजनिक करें, दिल्ली विधान सभा के 2020 के चुनाव में लगभग इकसठ फीसद विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या और बलात्कार जैसे मामले भी हैं। जबकि विजेता पार्टियां शुचिता की घोषित पक्षधर ‘आप’ और भाजपा हैं। राजनीतिक दल भी अपराध आरोपित उम्मीदवारों के पक्ष में उनके जिताऊ होने की दलीलें इसीलिए प्रस्तुत करते हैं कि कई बार वे जनता के भी पसंद होते हैं।

आज उच्चतम न्यायालय को भी मालूम है है कि इसकी सख्ती का ज्यादा असर नहीं पड़ रहा है। लेकिन अगर सब काम न्यायालय ही करेंगे तो जनता क्या करेगी! अदालत के लगातार प्रयासों का राजनीतिक दलों और मतदाताओं पर अपेक्षित असर न होना भी सिद्ध करता है कि अगर अपराधी विजेता बने हैं तो माना यह भी जाएगा कि जनता ने उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जान कर भी उनको चुना है।

क्या हमें इस पर आत्मचिंतन नहीं करना चाहिए कि मतदाताओं की पसंद ऐसे उम्मीदवार क्यों बन रहे हैं? इसके लिए चुनाव पूर्व के मतदाता जागरूकता अभियानों की ही तरह चुनाव बाद जन-सुनवाई भी आयेजित की जा सकती हैं। कई सामाजिक कार्यकर्ता और संगठन उम्मीदवारों के शपथनामों के विवरणों से जुटाई गई जानकारियों से मतदाताओं को जागरूक करने का अभियान चलाते हैं।

दुखद यह भी है कि नई पीढ़ी के युवा भी अपने अपनी संबद्धता वाले दलों द्वारा अपराधियों को टिकट देने पर आपत्ति या विरोध का स्वर उठाते हुए नहीं दिखते हैं। बल्कि वे राजनीति में रहने के लिए उसी रीति-नीति के पोषक हो जाते हैं। जब एक तरफ सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को या मीडिया समूहों को इतना मजबूत समझा जाता है कि वे मीडिया ट्रायल कर मुकदमों के निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं तो वे अपराधी उम्मीदवारों के विरुद्ध स्थानीय स्तर पर जनमत बनाने मे क्यों सक्रिय नहीं दिखते हैं?

लगता है कि जनता के लिए नैतिकता का सवाल भी बहुत मायने नहीं रखता है। दल बदलू विधायक या जिन विधायकों के विरुद्ध ऐसे आरोप लगते हैं कि उन्होंने पैसे लेकर दलीय निष्ठा बदली, वे भी चुनाव जीत जाते हैं। आदर्श आचार संहिता तो कोई मायने ही नहीं रखती।

इसके बावजूद कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट यह सब हर स्तर पर रोकना चाहता है। लेकिन जनता क्यों यह सवाल अपने-अपने विधानसभा संसदीय नगर निकाय या ग्राम पंचायत क्षेत्रों में नहीं करती है कि वहां चुनाव में अपराधी उम्मीदवार क्यों खड़ा किया जा रहा है, क्यों उसे समर्थन दिया जा रहा है। किसी आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार के जीत जाने के बाद यही कहा जाता है कि जनता की अदालत ने उसे बरी कर दिया है।

एक बादशाह ने अपने मंत्री की सलाह पर लोगों को परखने का एक नायाब तरीका अपनाया। उसने एक बड़े हौज में सुबह रोशनी से पहले ही एक-एक लोटा दूध डालने को कहा। सुबह हौज में उसे पानी ही पानी दिखा। सबने या जनता के भारी बहुमत ने यही सोचा कि मेरे एक के पानी डालने से क्या फर्क पड़ेगा।

बाकी सब तो बादशाह के डर से दूध ही डालेंगे। सवाल है कि क्या किसी अपराधी का साथ देने वालों को अपराधी नहीं माना जाता है? ऐसे में जब हम जानते-समझते हुए भी किसी अपराधी को वोट देते हैं, उसे जिताते हैं तो क्या हमें खुद को भी जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए? आखिर ‘नोटा’ का विकल्प तो है ही!

अगर कभी ‘नोटा’ को पड़े वोटों का प्रतिशत ज्यादा हो गया तो दलों को अपने उम्मीदवार तय करने से पहले सोचना पड़ेगा। यह कितने अफसोस की बात होगी कि सभी पार्टियां मिल कर भी जनता के सामने ऐसा उम्मीदवार नहीं दे पार्इं, जो अपराध की दुनिया से मुक्त छवि रखता हो और मजबूर होकर जनता को अपना वोट ‘नोटा’ को देना पड़े। सार यह है कि चुनावों में साफ-सुथरे उम्मीदवारों को आगे लाने के लिए साफ-सुथरे मतदाता भी चाहिए।

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