ताज़ा खबर
 

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्‍टर को 20 साल बाद लापरवही बरतने के आरोप से किया बरी, कहा- शर्तिया इलाज की गारंटी संभव नहीं

जस्टिस एम.बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने अपने पहले के फैसले का संदर्भ देते हुए मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच का फैसला दरकिनार कर दिया।

Author Updated: April 9, 2017 5:25 PM
सुप्रीम कोर्ट की तस्वीर। (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के एक डॉक्टर को, सड़क हादसे में घायल हुए एक व्यक्ति की अस्पताल में मौत होने की घटना के 20 साल बाद चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप से बरी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि जिन मामलों में डॉक्टरों जैसे पेशेवरों के खिलाफ लापरवाही का आरोप लगाया जाता है उन मामलों में आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले अदालतों को सावधान रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि वह कह चुका है कि किसी भी डॉक्टर के लिए यह आश्वासन या गारंटी देना संभव नहीं है कि इलाज का सकारात्मक असर ही होगा।

जस्टिस एम.बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने अपने पहले के फैसले का संदर्भ देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच का फैसला दरकिनार कर दिया। नागपुर पीठ के फैसले के बाद डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई थी। यह डॉक्टर उस अस्पताल में मांग पर बुलाई जाने वाली सर्जन थी जहां पीड़ित को भर्ती कराया गया था। बेंच ने कहा ‘‘हमारा विचार है कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें अपीलकर्ता को उस स्थिति में सुनवाई का सामना करना चाहिए जबकि 20 साल बीत चुके हों।’’

इस डॉक्टर को 29 अगस्त 1997 को अमरावती के इरविन अस्पताल में पीड़ित की जांच के लिए बुलाया गया। जांच करने के बाद डॉक्टर ने पाया कि मरीज को पेट में तीव्र दर्द था जिसके बाद उसने एक फीजीशियन को बुलाने के लिए कहा। सर्जन पर मुख्य आरोप यह था कि उसने फीजीशियन के पहुंचने तक इंतजार नहीं किया जबकि मरीज हीमोफीलिया से पीड़ित था। हीमोफीलिया में खून की थक्का बनने की क्षमता प्रभावित होती है।

आरोप में कहा गया कि मरीज की अगले ही दिन मौत हो गई जबकि वह फीजीशियन आया ही नहीं जिसे सर्जन ने बुलाया था। घटना के बाद पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई जिसमें मृतक के भाई ने आरोप लगाया कि अस्पताल के तीन डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मरीज की जान गई।

अलग से की गई विभागीय जांच में तीनों डॉक्टरों को ड्यूटी के दौरान लापरवाही बरतने का दोषी ठहराया गया। उनमें से एक को सजा के तौर पर सालाना वेतनवृद्धि से वंचित कर दिया गया, दूसरे डॉक्टर का तबादला कर दिया गया और सर्जन को अमरावती के इरविन अस्पताल में प्रवेश करने से हमेशा के लिए रोक दिया गया। तब सर्जन ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज करने के लिए याचिका दाखिल की। लेकिन, हाई कोर्ट ने यह कहते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी कि रात करीब 11 बजे पीड़ित को छोड़ कर चले जाना और फीजीशियन का इंतजार न करना उसकी ओर से बरती गई गंभीर लापरवाही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील को विचारार्थ स्वीकार करते हुए कहा कि सर्जन के खिलाफ एकमात्र आरोप यह है कि वह मरीज को छोड़ कर चली गई। उसे जरूरत के अनुसार बुलाया जाता था जिसके देखते हुए, वह तब अस्पताल आई और मरीज की जांच की जब उसे बुलाया गया था।

कोर्ट ने कहा कि मरीज को रक्तस्राव या चोट का कोई प्रमाण न मिलने पर उसने कहा कि फीजीशियन को बुलाया जाए। इसके बाद वह 11 बजे रात को अस्पताल से चली गई। यह सच है कि उसने फीजीशियन का इंतजार नहीं किया लेकिन यह समझा जा सकता है कि उसे लगा होगा कि फीजीशियन जल्द आएगा।

बेंच ने कहा कि यह फैसले में खामी हो सकती है लेकिन आईपीसी की धारा 304 ए के तहत आने वाला, लापरवाहीपूर्ण कृत्य नहीं था। अगर रात 11 बजे से अगले दिन सुबह पांच बजे के बीच मरीज की हालत बिगड़ती तो अस्पताल का नर्सिंग स्टाफ अपीलकर्ता को फिर से फोन कर सकता था लेकिन उन्होंने नहीं किया।

देखिए वीडियो - महाराष्ट्र: बॉम्बे हाई कोर्ट ने डॉक्टरों से हड़ताल खत्म कर काम पर लौटने को कहा, सुरक्षा का दिया भरोसा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 पाकिस्‍तानी नौसेना ने गुजरात तट से पकड़े 18 भारतीय मछुआरे, तीन नौकाएं भी कर लीं जब्‍त
2 नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल: हर मंत्री से मांगा गया 5 उपलब्धियों का ब्‍योरा, 26 मई से पहले छपेगी बुकलेट
3 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लिए मेजबान बनीं शेख हसीना, खुद किचन में जाकर पकाई ‘हिलसा’ मछ्ली
ये पढ़ा क्या?
X