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इन पांच कैटेगरी के लोगों को सबसे पहले मिलेगा कोरोना का टीका, अगस्त तक 30 करोड़ लोगों का टीकाकरण

इंडियन एक्सप्रेस 26/11 स्टोरीज ऑफ स्ट्रेंथ कार्यक्रम के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने अमिताभ बच्चन को दिए इंटरव्यू में कोरोना के वैक्सीन से जुड़ी तैयारियों के बारे में विस्तार से बात की।

कोरोना का टीका कब आएगा? आएगा तो आम लोगों को कब तक लग सकेगा? जब तक टीका नहीं आता, तब तक कोरोना से बचने के लिए क्या किया जा सकता है? आज इन सवालों के जवाब हर कोई जानना चाहता है। तो अमिताभ बच्चन में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन से यही सवाल पूछे। जानिए, उन्होंने क्या जवाब दिया:
अमिताभ बच्चन: आज हमारे साथ हैं भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन जी। ये खुद भी दिग्गज डॉक्टर हैं और इनके नेतृत्व में देश कोरोना से लड़ रहा है तो इस महामारी पर बात करने के लिए इनसे बेहतर भला और कौन हो सकता है? हर्षवर्धन जी, बहुत-बहुत धन्यवाद आपका, आपने समय दिया। पहला प्रश्न जो मन में आता है वह यह कि कोरोना के रूप में आए इस विशाल संकट के बीच देश के कोने-कोने में सेवा भाव की कई मशालें प्रज्वलित दिखीं। इन अनुभवों के बारे में आप हमें बताएँ।

डॉ. हर्षवर्धन: अमिताभ जी आपने बहुत सुंदर प्रश्न पूछा है। मुझे इस संदर्भ में अभी कोविड में ही नहीं, आज से 25-26 साल पहले, जब पहली बार भारत को पोलियो मुक्त करने का सपना भगवान की कृपा से मेरे हृदय में, मन में पैदा हुआ था और दिल्ली में जब इसका कार्यक्रम मैंने प्रारंभ किया था, तो पता नहीं कितने बड़े पैमाने पर साधारण इंसान और ढेर सारी समाजसेवी संस्थाओं को मैंने देखा और उन्हें देखने के बाद मैं इस बात के लिए कन्विंस हुआ कि भारत के डीएनए में परोपकार और सेवा-भाव है। हमारे लोगों के रक्त में एक इन्हेरेंट गुडनेस, एक इंसानियत का भाव, हमेशा रक्त में प्रवाह के रूप में बहता है।

कोविड की लड़ाई में तो देश में सरकार के साथ-साथ हज़ारों समाज सेवी संस्थाएं लगी हैं। मुझे याद है कि नीति आयोग ने देश भर में सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली कई हजार समाजसेवी संस्थाओं के साथ मेरा वीडियो कॉन्फ्रेंस से कांटेक्ट कराया था और मैंने देखा कि जो लोग तकलीफ में थे उनके लिए वे कितनी प्रकार की सेवाएं कर रहे थे। लेकिन इससे भी ज्यादा बड़ा मेरे लिए जो इस कोविड हीरो की तरह उभर के आया वह एक आम इंसान था। सिर्फ उदाहरण के रूप में मैं कहूंगा कि जब लॉकडाउन हुआ, हमने देखा कि लोग घरों के अंदर सिमट गए। कहीं किसी के घर में लोग कोविड से प्रभावित हो गए तो कोई परिवार खाना बनाकर उनके घर के बाहर रख दिया करता था। थोड़े दिन के बाद अखबार में जब इस तरह की खबरें आईं कि हमारे पक्षी, परिंदे, आवारा कुत्ते, गाय बहुत सारी ऐसी हमारी एक प्रकार से दिल को छूने वाली ऐसी खबरें, कि रेस्टोरेंट्स बंद हो गए, लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे, लोग उनको भोजन सर्व नहीं करते थे, इसके कारण उनको बहुत तकलीफ होने लगी तो बहुत बड़ी संख्या में देखा कि लोगों ने कैसे खुद बाहर आकर रिस्क लेकर भी इनकी भी सेवा करने के लिए, इनको पानी पिलाने के लिए, आवारा कुत्तों को खाना खिलाने के लिए कितने प्रकार के प्रयास किए।

दिल्ली शहर के अंदर एक उबर ड्राइवर का मैंने किस्सा सुना। वह गाड़ी में मास्क लगाकर चलता था तो किसी पढ़े लिखे व्यक्ति ने बिना मास्क लगाए उसकी गाड़ी में घुसने का प्रयास किया तो उसने मना कर दिया। उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तुम्हारी कंप्लेंट करूंगा, तो उसने कहा कि आपको कंप्लेंट करना है तो करिए लेकिन अपनी 1000-2000 रुपए की कमाई के लिए मैं अपने समाज के लोगों को खतरे में नहीं डाल सकता। मैं इस बीमारी को बढ़ाने में कंट्रीब्यूट नहीं कर सकता।

ऐसे पता नहीं कितने सारे किस्से हैं, जिसमें यह भाव स्पष्ट रूप से उभर कर आया कि लोगों को जब सहायता की जरूरत पड़ी तो जितने लोगों को सहायता की जरूरत पड़ी, उससे कई गुना ज्यादा लोग समाज में खुद खड़े हो जाते हैं, वरना ये जो लाखों हमारे माइग्रेंट लेबरर्स थे, जितनी तकलीफ में वे थे कितनी प्रकार की तकलीफ उनको हुई, लेकिन कितने सारे लोग उनकी सहायता के लिए खड़े हो गए और तकलीफ का पीरियड भी गुजर गया और कोविड के खिलाफ जंग पर भी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा।

मैं यही कहूंगा कि हैट्स ऑफ टू द कॉमन मैन ऑफ दिस कंट्री एंड हैट्स ऑफ एवरी इंडियन, उनके परोपकार की भावना को दिल की गहराइयों से मैं उस जज्बे को, सभी समाज सेवी संस्थाओं के साथ आम आदमी को सलाम करता हूं, सैल्यूट करता हूं।

अमिताभ बच्चन: मेरा अगला सवाल यह है कि कोरोना काल में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों ने जो सेवा की है उसके लिए पूरा देश सर झुका कर उन्हें नमन करता है। इन कोरोना योद्धाओं, हम उनको योद्धा ही कहेंगे, के लिए आपको क्या लगता है कि सरकार कुछ करेगी और हमारी जनता क्या कर सकती है?

हर्षवर्धन: देखिए सरकार भी कर रही है और करती रहेगी और जनता भी। मैं समझता हूं कि अपनी तरफ से जनता ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। मैं हमेशा जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के उस 22 मार्च के इनोवेटिव एक्सपेरिमेंट का स्मरण करता हूं, जब उन्होंने कहा कि जनता कर्फ्यू में सब वालन्टेरली (अपने मन से) अपने घर के अंदर रहें, लेकिन शाम को 5:00 बजे घर से बाहर निकलें और अपने-अपने सांकेतिक तरीके से देश के कोरोना वॉरियर्स को, डॉक्टर्स को, नर्सेज को, पैरामेडिकोज को, इन सब को सैल्यूट करें। उसके लिए किसी ने थाली बजाई, किसी ने दीपक जलाया। मुझे आज भी एक वीडियो याद है। एक बहुत ही बुजुर्ग महिला जो शायद मजदूरी का काम करती थीं, उनके उस वीडियो को मैंने देखा कि वह ईटों के ऊपर छोटी सी एक लकड़ी की डंडी से उसे पीट रही हैं। यह उनके अपने जज्बात बयां करने का तरीका था और मैं समझता हूं कि जो प्रधानमंत्री जी ने लगातार कोविड वॉरियर्स को उत्साहित किया, जिस प्रकार से उनके सम्मान की रक्षा के लिए लगातार देशवासियों से बात की है, जहां तक सरकार का प्रश्न है तो हमने बहुत ही शुरुआती दौर में देश भर के सभी कोविड वॉरियर्स के लिए सोचना और काम करना शुरू कर दिया था। हम लोगों ने इतनी बड़ी स्कीम सारे देश के लिए, भारत सरकार ने, स्वास्थ्य मंत्रालय ने बनाई थी कि अगर दुर्भाग्य से किसी कोविड वॉरियर की मृत्यु हो जाती है, उसके प्राण किसी यज्ञ में न्योछावर हो जाते हैं तो उसके लिए 50 लाख रुपए तक का बीमा हो सके। आज 400 से 500 हमारे कोविड वॉरियर्स शहीद हुए, उनमें से बहुत सारे के इंश्योरेंस क्लेम सेटल हो चुके हैं, बहुत सारे लोगों के प्रोसेस में हैं। अभी हमने कोविड वॉरियस के वार्ड्स (आश्रितों) के लिए एक स्कीम भी घोषित की है, जिसमें देश में जो राष्ट्रीय स्तर पर एक नॉमिनेशन का कोटा होता है MBBS सीट्स का मेडिकल कॉलेज में, खासकर कोई इसी तरह के लोगों के लिए होता है, कोई आर्मी का जवान शहीद हो गया, कोई बीएसएफ का जवान शहीद हो गया, इस तरह के जो कैटेगरी के लोग हैं उसी में हमने 5 सीट्स एमबीबीएस में इन कोविड वॉरियर्स के वार्ड्स के लिए घोषित की हैं।

आपका जो प्रश्न है कि समाज क्या कर सकता है तो मैं समझता हूं कि समाज उनके सम्मान की रक्षा के लिए उनको सम्मान देने के लिए अपने-अपने क्षेत्र में समाज के लोग, अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से अपनी-अपनी योजनाओं के हिसाब से चाहे क्षेत्र सरकारी हो चाहे वह गैर सरकारी हो, सब में ऐसी-ऐसी योजना बनाकर इन कोविड वॉरियर्स के वार्ड्स की सहायता कर सकता है और मैं समझता हूं कि यह अवसर इन कोविड वॉरियर्स के साथ-साथ इनकी माताओं को और इनके परिवारजनों को भी सलाम करने का है, उनका अभिनंदन करने का है।

दस महीने से ज्यादा हो गए हैं कोविड के खिलाफ जंग लड़ते हुए, माताओं ने कितने कोविड वॉरियर्स को शहीद होते हुए भी देखा है। कोविड वॉरियर्स थक गए हैं, लेकिन ये कभी नहीं कहते कि हम थक गए हैं और पूरे भारत में, 135 करोड़ के देश में अभी तक एक ऐसा किस्सा नहीं सुना कि किसी मां ने, किसी बहन ने, अपने परिवार के बच्चे से कहा हो कि बहुत हो गया अब कोविड के वार्ड में जाना बंद कर दो, तुम्हारे प्राण को खतरा हो सकता है। मैं समझता हूं कि यह जो भाव है यह किसी भी प्रकार से ना तो कंपनसेट किया जा सकता है, ना कोई स्कीम से इसका मुकाबला किया जा सकता है।

कोविड वॉरियर्स और इसमें खासकर मैं समझता हूं कि खाली यह हेल्थ के जो हमारे वर्कर्स हैं वही नहीं है, इसमें फ्रंटलाइन वर्कर्स भी हैं, इसमें जर्नलिस्ट भी हैं, जो कि ग्राउंड जीरो पर जाकर अवेयरनेस क्रिएट की है। कितने सारे कोविड वॉरियर्स के रूप में जर्नलिस्ट भी हैं जो मृत्यु का शिकार हुए हैं। इन सबके कंट्रीब्यूशन इतिहास में हमेशा सब लोगों को ऐसे तकलीफ के समय पर प्रेरणा देते रहेंगे। समाज के लोगों को मैं हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं कि आज इन कोविड वारियर्स के प्रति सारे देश में सारी दुनिया में बहुत ही गहरी सच्ची संवेदना और सम्मान का भाव पूरी तरह से जागृत हो चुका है।

अमिताभ बच्चन: वैक्सीन को लेकर अगला प्रश्न है। वैक्सीन को लेकर तमाम बातें कही जा रही हैं और तरह-तरह की उम्मीद भी जगाई जा रही है। आपको क्या लगता है, आपके मुताबिक यह वैक्सीन कब तक बन जाएगी या आ जाएगी और देश के हर नागरिक को टीका लगाना पड़ेगा तो यह टीका लगाने में कितना वक्त लगेगा? क्या अनुमान है आपका?

हर्षवर्धन: देखिए अमिताभ जी आपने वह प्रश्न पूछा है जो आज सारे भारतवासियों के और शायद दुनिया के हर व्यक्ति के मन में है। भारत की वैक्सीन पर रिसर्च व इसका उत्पादन करने की दृष्टि से जो योग्यता और क्षमता है, वह सारी दुनिया में जगजाहिर है। डेवलपिंग कंट्रीज को 60% जो वैक्सीन्स है वहां के बच्चों के लिए या जिनको वैक्सीन की जरूरत है वह भारत उपलब्ध कराता है और अगर पूरी दुनिया की बात करें तो शायद जो वैक्सीन्स की एक चौथाई दुनिया की जरूरत है वह भारत उपलब्ध कराता है। आज भी जब असाधारण परिस्थितियों में सारी दुनिया वैक्सीन के डेवलपमेंट पर रिसर्च कर रही है तो अगर आपको मैं मोटा-मोटा एक आंकड़ा दूं तो दुनिया में 200 से ज्यादा वैक्सीन कैंडिडेट वैक्सीन की खोज में काम कर रहे हैं। इनमें से 30 वैक्सीन कैंडीडेट्स भारत में काम कर रहे हैं। इन 30 कैंडीडेट्स में से 5 कैंडीडेट्स ऐसे हैं जो क्लिनिकल ट्रायल्स के विभिन्न चरण में हैं। दो तो क्लिनिकल ट्रायल के थर्ड फेज में भी एडवांस स्टेज में पहुंच गए हैं। दो ऐसे हैं जो प्रीक्लिनिकल ट्रायल्स के एडवांस स्टेज में हैं। अगर मैं इन सब चीजों की डिटेल में ना जाकर जो अभी तक की जानकारी है, जो अभी तक हमारे अपने देश में जो वैक्सीन उपलब्ध होने वाली है, हमारे अपने वैज्ञानिकों के प्रयास से, हमारी अपनी इंडस्ट्री के प्रयास से, उसकी अगर जानकारी शेयर करूं तो जो इंटरनल रिपोर्ट आ रही है जो हम लोग डेलिब्रेशंस कर रहे हैं तो मुझे आपको अच्छी खबर देनी है कि जैसे ही 2021 शुरू होगा तो मुझे पूरी उम्मीद है कि पहले दो-तीन महीनों के अंदर-अंदर देश के लोगों के लिए भारत में इफिसियंसी और सेफ़्टी की दृष्टि से अच्छी वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी।

अब आपका जो दूसरा प्रश्न है कि क्या यह वैक्सीन सारे देश के लोगों को लगाने के लिए उपलब्ध होगी, तो जैसा कि हम जानते हैं एक साथ 135 करोड़ लोगों के लिए शायद मैन्युफैक्चर ना हो पाए, लेकिन हमने योजनाबद्ध तरीके से ऐसा सोचा है कि जुलाई तक हम लगभग देश के 30 करोड़ लोगों को टीका लगा दें। हमने प्रॉयरटाइज किया है। पहली कैटेगरी हेल्थ वर्कर सरकारी और गैर सरकारी यानी प्राइवेट सेक्टर के अंदर हेल्थ केयर सेटिंग्स में काम करने वाले सारे लोग, दूसरे फिर फ्रंटलाइन वर्कर्स जो फील्ड में काम करते हैं वह पुलिस हो, कारपोरेशन के कर्मचारी हो, सैनिटेशन के लोग हों, पैरामिलिट्री फोर्सेज हो, आर्मी हो यह सारे जितने फील्ड के लोग हैं। फिर उसके बाद हमारे जो 65 साल से ऊपर के लोग हैं, फिर 50 और 65 के बीच के लोग हैं और फिर 50 साल के कम के लोग जिनको कोई भी बीमारी है पहले से शरीर में, डायबिटीज है, हार्ट की बीमारी है, किडनी की तकलीफ है। ये सारे मिलाकर हमने एक रफ ऐस्टीमेट किया है कि यह करीब 30 करोड़ की संख्या है और हमें उम्मीद है कि लगभग इतने लोगों के लिए वैक्सीन जून जुलाई-अगस्त तक उपलब्ध भी हो जाएगी और हम उनको लगा भी देंगे और आप जानते हैं कि भारत के पास पर्याप्त अनुभव है दुनिया के 60% केसेस भारत में होते थे पोलियो ग्रस्त बच्चों के, लेकिन हमने एक बड़ा सपना देखा और भारत 2014 में पूरी तरह से पोलियो मुक्त हो गया।

देश में लाखों सेंटर्स पर कोल्ड चेन को मेंटेन करते हुए वैक्सीन -20 डिग्री सेंटीग्रेट पर उपलब्ध कराई जाती थी और दो बूंद जिसके बारे में आपने भी अमिताभ जी इतना कैंपेन किया वह हर बच्चे के मुंह में पहुंचाई जाती थी। आज दुनिया का सबसे बड़ा रॉबस्ट यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम हम कर रहे हैं। उसमें हम 12 टीके देते हैं सारे देश के बच्चों को। इसी तरह से अभी हमने दुनिया का मीजल्स रूबेला का, जिसमें शायद 300 मिलियन के करीब बच्चों को, यंग लोगों को यह वैक्सीन दी गई तो हमारे पास पर्याप्त अनुभव है।

पिछले 3 महीने से, जो एक्टिविटी हमने 2021 में करनी है वैक्सीन को देने की, इन टारगेट ग्रुप्स को, उसकी डिटेल्ड तैयारियां चल रही हैं। हमने अपनी तैयारियों में स्टेट्स को ऑन बोर्ड लिया है और इसके साथ साथ पहले हमारा एक प्लेटफार्म था कि eVIN प्लेटफार्म, इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क। अब उसको हमने कोविन (COVIN) प्लेटफार्म में बदल दिया है। अब इस प्लेटफार्म के ऊपर ऐसे सभी लोग जिनको वैक्सीन मिली है और पोटेंशियल बेनेफिशरी लिस्ट होगी उनको वैक्सीन कब मिलेगा? कहां पर, उनको जाना है, उसका उनको sms भेजा जाएगा, फिर किसने वैक्सीन दी, कहां पर दी, कब दी इसकी सारी जानकारी उस प्लेटफार्म पर होगी और फिर इलेक्ट्रॉनिक उसी प्लेटफार्म पर उन्हें सर्टिफिकेट मिलेगा और फिर जब दूसरी डोज लगनी होगी उसका उसी प्लेटफार्म से रिमाइंडर होगा।

वैक्सीन देश में कहां-कहां है, कितने टेंपरेचर पर है, ये सारी चीजों की ट्रैकिंग होगी और फिर इस काम को करने वाले लोगों की ट्रेनिंग से लेकर और वैक्सीनेटर और दूसरे मैन पावर को डेवलप करना सोसाइटिल जो संगठन हैं, एनजीओ हैं उनके साथ अभी से हम लोगों ने मीटिंग शुरू कर दी है, वॉलिंटियर्स हर एक ऐसे वैक्सीनेशन सेंटर पर हेल्प करने के लिए। तो भारत की पर्याप्त तैयारी भी है भारत के पास पर्याप्त अनुभव भी है और भारत को पूरी उम्मीद है कि बहुत शीघ्र अगले कुछ महीनों के अंदर हम भारतवासियों के लिए एक प्रभावकारी और अपने ही देश के लोगों द्वारा बनाई गई, रिसर्च की गई, मैन्युफैक्चर की गई वैक्सीन, जो पूरी तरह से कामयाब होगी, वह उपलब्ध करा पाएंगे।

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अमिताभ बच्चन: एक बात पूछनी थी आपसे। क्या भारत में पहले कभी इस तरह के टीके पर काम हुआ है? आपकी राय में इस वैक्सीन को सभी लोगों तक पहुंचने में बहुत सारी मुसीबतें आएंगी, चुनौतियां आएंगी। क्या लगता है आपको?

हर्षवर्धन: अमिताभ जी, देखिए मुझे पता नहीं था कि आपका यह प्रश्न आने वाला है, लेकिन मैंने शायद जो पिछले प्रश्न का उत्तर दिया उसमें इस प्रश्न के उत्तर का कुछ अंश आ गया है। भारत वैक्सीन की फील्ड में रिसर्च डेवलपमेंट में ऐसा नहीं है कि पहली बार काम कर रहा है। हमने रोटावायरस का टीका, जो छोटे बच्चों को जिनकी डायरिया के कारण डेथ होती थी, उसके ऊपर हमारे यहां रिसर्च हुई है। टाइफाइड का टीका है जिसके ऊपर रिसर्च हुआ है, जापानी इंसेफेलाइटिस जिसके कारण छोटे-छोटे बच्चों की बिहार में और उत्तर प्रदेश में डेथ हुआ करती थी, मलेरिया के टीके के ऊपर हमारे यहां रिसर्च हो रहा है और अभी कोविड का।

नॉर्मली जो वैक्सीन का रिसर्च होता है, कई कई साल लग जाते हैं, आठ-आठ, दस-दस साल लग जाते हैं वैक्सीन के टीके को डिवेलप करने में। लेकिन, कोविड की इमरेजंसी में तो हमारे वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया है और शायद हमारे ही नहीं पूरी दुनिया के अंदर वैज्ञानिकों ने 1 साल के अंदर जो टीका उपलब्ध करा दिया है। जहां तक देश के लोगों को इतनी सारी, इतने बड़े देश में दूर-दराज के गांव में, आदिवासी क्षेत्र में, पहाड़ पर, जंगल में सब जगह पर लोग रहते हैं, सब जगह पर टीका उपलब्ध कराने की बात है तो इसकी जो लॉजिस्टिक्स है उस पर हम पिछले 3 महीने से काम कर रहे हैं। यानी पूरे कितने वैक्सीन कैरियर्स और चलेंगे, कितने और रेफ्रिजरेटर्स चलेंगे, कितने और इंसुलेटेड रेफ्रिजरेटर जो वैन्स हैं उनकी और जरूरत होगी, कितने वैक्सीन करियर्स की और जरूरत होगी, कितने करोड़ सीरिंज की जरूरत होगी, कितने हेल्थ वर्कर्स, वैक्सीनेटर्स की जरूरत होगी, कितनी उनके असिस्टेंट की जरूरत होगी, कैसे उनकी ट्रेनिंग होगी यह सारे प्लेटफार्म पर काम किया जा रहा है और मैंने जैसा अभी आपको बताया है कि हमारे इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म को आज स्थिति यह है कि हमने जो अपना कोविन प्लेटफार्म डिवेलप किया है, हम कोविन प्लेटफार्म के टेक्नोलॉजी के माध्यम से दूसरे देशों को भी हेल्प करने की स्थिति में हैं। उन्हें अगर अपने देश में लोगों तक वैक्सीन को पहुंचाना है, लगाना है, बिना किसी हर्डल्स के तो वह योग्यता और क्षमता भी भारत ने विकसित की है। इसमें जितनी भी प्रकार की मैटिकुलयस बातें हो सकती हैं, यहां तक कि एडवर्स रिएक्शन स्तर की भी कल्पना करके कि कहीं अगर कोई एडवर्स रिएक्शन होते हैं तो उसके लिए भी अलग से ग्रुप हैं। फिर हमारा नेशनल एक्सपर्ट्स का एडवाइजरी ग्रुप बना है, जिसमें सब प्रकार के डिपार्टमेंट्स के सेक्रेट्रीज हैं, एक्सपर्ट्स हैं, इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के लोग हैं, एम्स के लोग हैं, राज्य सरकारें हैं, वह हर पहलू के ऊपर बहुत विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

वैक्सीन बनाने वालों से हम लगातार संपर्क में हैं। इस पूरी एक्सरसाइज के अमल की तमाम बारीकियों की कल्पना करके और पुराने अनुभवों का लाभ उठाते हुए हम सब तरह की तैयारियां कर रहे हैं। हमारे लिए सबसे बड़े सौभाग्य की बात यह है कि हमारे अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी इस विषय को भी खुद मॉनिटर करते हैं। इसकी बारीकी तक वह जानते हैं, दो-दो तीन-तीन घंटे तक वह मीटिंग्स करते हैं, अभी भी उन्होंने पिछले सप्ताह भी इसके लिए बहुत विस्तार से मीटिंग की है। वह लगातार चीफ मिनिस्टर्स के साथ मीटिंग करते हैं, सारे अधिकारियों के साथ करते हैं, सारे दूसरे मंत्रालयों के साथ करते हैं।

अमिताभ बच्चन: अच्छा जब तक वैक्सीन नहीं आती तब तक के लिए हमारे जितने भी देशवासी हैं उन्हें क्या करना चाहिए, क्या सलाह होगी उनके लिए आपके पास?

हर्षवर्धन: देखिए, जब यह कोविड के खिलाफ जंग शुरू हुई थी और शुरुआती महीने ही थे, मुझे ख्याल नहीं कि मैंने यह शायद फरवरी या मार्च में इस्तेमाल किया था, शायद लॉकडाउन के पीरियड में पहली बार इस्तेमाल किया था, तब शायद कोई ऐसा पॉजिटिव सिगनल भी नहीं था कि वैक्सीन कब आएगी, तब मैंने लोगों से कहा था कि वैक्सीन तो जब आएगी तब आएगी, लेकिन जो सबसे पावरफुल और पोटेंट वैक्सीन देशवासियों के लिए है वह सोशल वैक्सीन है और सोशल वैक्सीन को मैंने डिस्क्राइब किया था- मास्क का प्रॉपर इस्तेमाल करना। मास्क से नाक को ढँक कर रखना। बातचीत करते समय भी नहीं उतारना, खाते समय उतारना तो अकेले में खाना, डाइनिंग टेबल पर बैठकर नहीं खाना, दो गज की दूरी बना कर रखना, हाथों को पानी-साबुन से धोकर रखना और रेस्पिरेट्री एटीट्यूट जिसको हमने कहा कि खांसी जुकाम, छींक कुछ भी आती है तो अपनी एल्बो को नाक के ऊपर और मुंह के ऊपर रखो और अपने हाथ को बार-बार नाक और मुंह पर नहीं लेकर जाना। उस समय मैंने कहा था कि शायद यह लॉकडाउन भी एक प्रकार की सोशल वैक्सीन में कंट्रीब्यूट कर रहा है और हमने सब से कहा कि डोंट वेट फॉर द एक्चुअल वैक्सीन, बट हैव फेथ ऑन द सोशल वैक्सीन (वास्तविक वैक्सीन के आने का इंतजार मत करें लेकिन सोशल वैक्सीन को जारी रखें)।

आज इस लड़ाई के 11वें महीने में, 8 जनवरी को मैंने स्वास्थ्य मंत्रालय में पहली मीटिंग की थी। आज 11वां महीना चल रहा है और मैं बड़े कॉन्फिडेंस के साथ कह सकता हूं। मैं सारी दिल्ली में, अस्पतालों में गया, सब कोविड वार्ड्स में गया हूं, इतने लोगों से मिला हूं, कोविड के पेशेंट्स से भी, शायद कोई बहुत दूरी बनाकर नहीं मिला होऊंगा, लेकिन यह जो सोशल वैक्सीन है यह इतना बड़ा पोटेंट वीपन (हथियार) है जिसने मेरी रक्षा की है और जिसने पता नहीं देश में कितने लोगों की रक्षा की है। आज हम 117 करोड़ लोगों को कॉलर ट्यून में मैसेज दे रहे हैं। मेरा लोगों को यही संदेश है कि जो आपको संदेश कॉलर ट्यून में दे रहे हैं उस संदेश का गहराई से, सच्चाई से, ईमानदारी से पालन करिए। यह आप के फायदे के लिए है, भीड़ में जाने की जरूरत नहीं है, जबरदस्ती बाजार में जाने की जरूरत नहीं है, जबरदस्ती सोशल गैदरिंग में जाकर यह कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर के जो प्रिंसिपल्स हैं, उसको वायलेट करने की जरूरत नहीं है। शायद सबसे महत्वपूर्ण बात आज कोविड के खिलाफ जंग में यही है और यही मैं देशवासियों से रिपीट करना चाहता हूं और मैं चाहता हूं कि आप कॉलर ट्यून में तो कहते ही हैं लेकिन आप अपने हर प्रोग्राम में और खासकर आपका जो है करोड़पति वाला कार्यक्रम उसको तो बहुत लोग देश में देखते हैं, उसमें आप कभी-कभी रिमाइंड भी करते हैं लोगों को, उसमें भी आप इसकी अगर लगातार चर्चा करें और कुछ सवाल अगर कोविड पर भी बना कर डाल दें तो शायद मुझे लगता है कि यह जो कोविड के खिलाफ जंग है हमारी वह और ज्यादा प्रभावकारी हो जाएगी। शायद आज के समय में तो यही एक सबसे बड़ा संदेश देशवासियों को हो सकता है।

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