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गांधी जी की हत्या की नए सिरे से जांच चाहते हैं सुब्रमण्यम स्वामी, कहा- क्यों नहीं हुई थी अटॉप्सी

सुप्रीम कोर्ट पिछले साल ही एक आईटी प्रोफेशनल द्वारा दायर महात्मा गांधी की हत्या की जांच की मांग वाली याचिका को रद्द कर चुका है।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | October 7, 2020 3:43 PM
LAC Dispute, Subramanian Swamy, BJP MP, Rajnath SinghBJP सांसद सुब्रमण्यम स्वामी। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः गजेंद्र यादव)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मृत्यु को 72 साल पूरे हो चुके हैं। देश को आजादी दिलाने के एक साल बाद 1948 में ही नाथूराम गोडसे ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी थी। इस साल उनकी जयंती पर जहां देश-विदेश के नेताओं ने गांधीजी को याद किया, वहीं ट्विटर पर एक धड़े ने 2 अक्टूबर को ट्विटर पर नाथूराम गोडसे के समर्थन में भी ट्वीट किए। इसे लेकर कई बड़े नाम गुस्सा जता चुके हैं। इस बीच राज्यसभा से भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी एक ट्वीट के जरिए हलचल मचा दी। उन्होंने मांग की है कि गांधीजी की हत्या के मामले की जांच दोबारा की जानी चाहिए। स्वामी पहले भी इशारों में कह चुके हैं कि हो सकता है कि यह कभी स्थापित ही न हो कि राष्ट्रपिता को नाथूराम गोडसे ने ही गोली मारी थी।

सुब्रमण्यम स्वामी ने इस संबंध में ट्विटर पर एक पुराना न्यूज लिंक शेयर करते हुए पूछा कि आखिर क्यों गांधीजी के शव की अटॉप्सी नहीं की गई थी। बता दें कि स्वामी पहले भी गांधीजी की हत्या से जुड़े दावों पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने इसी साल फरवरी में एक ट्वीट में कहा था- “गांधीजी के पार्थिव शरीर का कोई पोस्टमार्टम या ऑटोप्सी क्यों नहीं की गई? क्यों आभा और मनु, जो कि घटना की प्रत्यक्षदर्शी थीं, उनसे सवाल नहीं किए गए? गोडसे के रिवॉल्वर में कितने चैंबर खाली मिले थे? इटैलियन रिवॉल्वर खोजा भी नहीं जा सका, क्यों? हमें इस केस को दोबारा खोलने की जरूरत है।”

गांधीजी की हत्या की दोबारा जांच की याचिका रद्द कर चुका है सुप्रीम कोर्ट: गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही महात्मा गांधी की हत्या की दोबारा जांच की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर चुकी है। यह याचिका अक्टूबर 2017 में एक आईटी प्रोफेशनल डॉक्टर पंकज कुमुदचंद्र फडनिस ने लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इस याचिका को रद्द कर दिया था। इसमें कहा गया था कि इस बात पर अभी भी अस्पष्टता है कि गांधीजी पर चली चौथी गोली नाथूराम गोडसे ने ही चलाई थी, इसलिए इस मामले की फिर से जांच होनी चाहिए।

इस याचिका में कहा गया था कि गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे को सुप्रीम कोर्ट के गठन (26 जनवरी 1950) से 71 दिन पहले ही फांसी दी गई थी। इसका मतलब था कि साजिशकर्ता या उनके परिवार को पूर्वी पंजाब की अदालत के फैसले को चुनौती देने का मौका ही नहीं मिला। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि गांधीजी की हत्या का ट्रायल कानूनी तौर पर अंतिम रूप नहीं ले सका।

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