प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में एक संभावित ऐतिहासिक अल नीनो (El Niño) डिवेलप हो रहा है। अमेरिका की नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के अनुसार, इस बात की 69 फीसदी संभावना है कि यह अल नीनो 1950 के बाद दर्ज किसी भी अल नीनो से ज्यादा शक्तिशाली साबित हो सकता है।

NOAA के मुताबिक, यह मौसमीय घटना साल के आखिर तक और मजबूत होगी तथा उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) की सर्दियों के दौरान अपने चरम पर पहुंचेगी। हालांकि भारत पर इसका सबसे बड़ा असर इस साल के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लगभग समाप्त होने के बाद देखने को मिल सकता है।

आपको बता दें कि अल नीनो का प्रभाव हिंद महासागर और भारत के आसपास के क्षेत्रों पर आमतौर पर कई सप्ताह की देरी से दिखाई देता है। वहीं भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा है कि अब तक मौजूदा मानसून पर अल नीनो का कोई असर नहीं पड़ा है।

मजबूत अल नीनो बनने की 90 प्रतिशत संभावना

NOAA ने अपने मासिक अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) बुलेटिन में कहा है कि उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों के दौरान ‘मजबूत’ (Strong) अल नीनो बनने की 90 प्रतिशत संभावना है।

बुलेटिन में कहा गया है, ”अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान 69 प्रतिशत संभावना है कि यह एक ऐतिहासिक अल नीनो होगा जिसकी तीव्रता 1950 के बाद आए सभी अल नीनो घटनाओं से अधिक हो सकती है।”

एजेंसी ने कहा कि जुलाई के दौरान मौजूदा अल नीनो और अधिक मजबूत हुआ है और आने वाले महीनों में इसके और तेज होने की संभावना है। NOAA ने कहा, ”इस स्तर के एल नीनो के साथ इसके प्रभाव भी अधिक व्यापक और स्पष्ट रूप से देखने को मिलने की संभावना बढ़ जाती है।”

अल नीनो (El Niño), अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का गर्म चरण (Warm Phase) है। यह एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है जो उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (Tropical Pacific) में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाले बदलावों के कारण विकसित होता है।

यह दुनियाभर के मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है और इसके कारण कई क्षेत्रों में सूखा, भीषण गर्मी और सामान्य से कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाती है।

भारत में अल नीनो का असर

भारत के लिए अल नीनो इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि जिन सालों में यह घटना होती है, उन वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना ऐतिहासिक रूप से अधिक देखी गई है।

हालांकि, अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच सीधा (वन-टू-वन) संबंध नहीं है। भारतीय मानसून कई अन्य महासागरीय और वायुमंडलीय कारकों से भी प्रभावित होता है।

इस वर्ष का मानसून पहले से ही सामान्य से कम बारिश दर्ज कर चुका है। 1 जून से 13 अगस्त के बीच भारत में 491.8 मिमी वर्षा हुई जो सामान्य से 12 प्रतिशत कम है।

जून में वर्षा 35.4 प्रतिशत कम रही। जुलाई में बारिश लगभग सामान्य स्तर पर दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अगस्त और पूरे शेष मानसून सीजन के लिए भी सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान जताया है।

हालांकि, विकसित हो रहे अल नीनो का समय ऐसा है कि इसका असर मौजूदा मानसून पर सीमित रह सकता है। आमतौर पर अल नीनो का प्रभाव हिंद महासागर और भारत के आसपास क्षेत्रों में करीब 40 से 45 दिनों की देरी से दिखाई देता है। ऐसे में जब तक इसका असर पूरी तरह सामने आएगा, तब तक दक्षिण-पश्चिम मानसून 30 सितंबर की अपनी आधिकारिक वापसी की तारीख के करीब पहुंच चुका होगा।

अल नीनो कब घोषित किया जा सकता है

अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole-IOD) भी संतुलित कर सकता है। IOD को हिंद महासागर में ENSO का समकक्ष माना जाता है। फिलहाल IOD तटस्थ (Neutral) स्थिति में है लेकिन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि मानसून के अंत तक यह सकारात्मक (Positive) हो सकता है। सकारात्मक IOD, भारतीय मानसून पर अल नीनो के कुछ नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है।

ENSO (अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन) की तीन अवस्थाएं होती हैं- ल नीनो (El Niño), न्यूट्रल (Neutral) और ला नीना (La Niña)। इनका निर्धारण मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (Equatorial Pacific) की समुद्री सतह के तापमान के आधार पर किया जाता है।

जब संबंधित तीन महीने की औसत समुद्री सतह तापमान विसंगति (Sea Surface Temperature Anomaly) तय सीमा से ऊपर पहुंच जाती है तब आधिकारिक तौर पर अल नीनो घोषित किया जाता है।

सुपर अल नीनो क्या है? भारतीय अर्थव्यवस्था को किस हद तक पहुंचा सकता है नुकसान 

भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून की एक बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की खेती, ग्रामीण और खाद्य कीमतें बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती हैं। ऐसे में अगर सुपर अल नीनो जैसी शक्तिशाली जलवायु घटना के कारण मानसून प्रभावित होता है, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रह सकता है। कृषि उत्पादन घटने और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।