पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो गए हैं। 4 मई को नतीजे घोषित होंगे। पिछले कुछ सालों से चुनावों में मतदान खत्म होते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर राजनीतिक पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। राजनीतिक पार्टियों की तरफ से ईवीएम के साथ-साथ स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल खड़े किए जाते हैं।

पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ सालों में स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर कई बार विवाद सामने आए हैं। गुरुवार रात भी कोलकाता में स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर कई टीएमसी नेता धरने पर बैठ गए। सबसे पहले टीएमसी नेता कुणाल घोष और शशि पांजा ने कोलकाता की मानिकतला विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले एक स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर धरना दिया। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी कार्यकर्ता ने स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर ईवीएम से छेड़छाड़ की। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी भी टीएमसी नेताओं का साथ देने पहुंचीं। बाद में चुनाव आयोग ने कथित सीसीटीवी फुटेज को झूठा बताते हुए स्पष्टीकरण जारी किया जिसके बाद यह धरना खत्म हुआ।

क्या आपको पता है कि स्ट्रॉन्ग रूम क्या होते हैं? कौन इनके अंदर जा सकता है? आखिर क्यों हर चुनाव के बाद यह मुद्दा सुर्खियों में आ जाता है? स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा को लेकर क्या नियम हैं, आपको बताते हैं इस बारे में विस्तार से…

क्या होता है स्ट्रॉन्ग रूम?

स्ट्रॉन्ग रूम चुनाव प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा है। यह कोई साधारण कमरा नहीं बल्कि हाई सिक्यॉरिटी वाला कंट्रोल्ड एरिया होता है जहां मतदान के बाद EVM और VVPAT मशीनों को मतगणना तक सुरक्षित रखा जाता है।

आमतौर पर यह कमरे सरकारी इमारतों, कॉलेज या पॉलिटेक्निक संस्थानों और वेयरहाउस या प्रशासनिक परिसरों में बनाए जाते हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा सुरक्षा मानकों के आधार पर इन्हें चुना जाता है।

मतदान के बाद क्या होता है?

मतदान खत्म होने के बाद पूरी प्रक्रिया बेहद व्यवस्थित और नियमबद्ध होती है:

-EVM और VVPAT मशीनों को पोलिंग बूथ पर ही सील किया जाता है
-इन मशीनों को कड़ी सुरक्षा के बीच स्ट्रॉन्ग रूम तक लाया जाता है
-उम्मीदवारों या उनके एजेंटों की मौजूदगी में इन्हें जमा किया जाता है
-इसके बाद स्ट्रॉन्ग रूम को सील कर दिया जाता है

यह प्रक्रिया पूरी तरह रिकॉर्ड की जाती है और कई जगह वीडियो रिकॉर्डिंग भी अनिवार्य होती है।

कितनी मजबूत होती है स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा?

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बहु-स्तरीय होती है जिसे ‘मल्टी-लेयर सिक्योरिटी’ कहा जाता है:

फिजिकल सिक्यॉरिटी
कमरे के बाहर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती होती है। स्ट्रॉन्ग रूम पर 24 घंटे निगरानी रखी जाती है।

CCTV निगरानी
हर गतिविधि कैमरे में रिकॉर्ड होती है और कई जगह लाइव फीड उम्मीदवारों को भी दिखाई जाती है।

सीलिंग सिस्टम
कमरे के दरवाजे पर विशेष सील लगाई जाती है जिस पर उम्मीदवारों के हस्ताक्षर होते हैं।

डबल लॉक सिस्टम
कमरे में अक्सर दो ताले लगाए जाते हैं जिनकी चाबी अलग-अलग अधिकारियों के पास होती है।

स्ट्रॉन्ग रूम में कौन अंदर जा सकता है?

स्ट्रॉन्ग रूम में हर किसी को जाने की अनुमति नहीं होती है। प्रवेश सख्ती से नियंत्रित होता है। कुछ चुनिंदा लोग ही स्ट्रॉन्ग रूम में जा सकते हैं:

-रिटर्निंग ऑफिसर
-जिला निर्वाचन अधिकारी
-अधिकृत चुनाव कर्मचारी
-मतगणना के दिन नियुक्त स्टाफ

स्ट्रॉन्ग रूम में कौन नहीं जा सकता?

स्ट्रॉन्ग रूम में कौन अंदर नहीं जा सकता है, इसे लेकर नियम एकदम स्पष्ट है।

-आम नागरिकों को प्रवेश नहीं
-मीडिया को अनुमति नहीं
-उम्मीदवार भी अंदर नहीं जा सकते

हालांकि, उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के एजेंटों को स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर निगरानी करने की अनुमति होती है। कई मामलों में वे 24 घंटे वहीं डेरा डालकर बैठते हैं। इस कमरे में सुरक्षा कर्मियों के अलावा किसी भी शख्स की दोबारा तभी एंट्री होती है जब मतगणना के लिए इन मशीनों को इस्तेमाल करना होता है।

मतगणना वाले दिन सुबह लगभग 7 बजे स्ट्रांग रूम खोला जाता है। इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर और चुनाव आयोग के ऑब्जर्वर वहां मौजूद रहते हैं। इसके बाद ईवीएम को मतगणना स्थल तक ले जाया जाता है। इस दौरान सुरक्षा काफी कड़ी होती है और पूरे रास्ते का वीडियो भी बनाया जाता है। ताला खोलते समय सभी उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि भी वहां मौजूद रहते हैं। इसके बाद EVM की कंट्रोल यूनिट को काउंटिंग टेबल पर लाया जाता है।

काउंटिंग सेंटर में लोगों की संख्या तय होती है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, हॉल में लगी हर टेबल पर उम्मीदवार की ओर से एक एजेंट मौजूद रहता है। एक हॉल में अधिकतम 15 एजेंट ही हो सकते हैं। इन एजेंटों का चयन उम्मीदवार करते हैं और उनके नाम, फोटो व अन्य जानकारी जिला निर्वाचन अधिकारी को पहले से उपलब्ध कराई जाती है।

पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होती है?

चुनाव आयोग के अनुसार, पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी रखने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाते हैं।

-हर स्टेप पर राजनीतिक दलों को शामिल किया जाता है
-सीलिंग के समय सभी को बुलाया जाता है
-CCTV निगरानी होती है
-किसी भी संदिग्ध गतिविधि की शिकायत तुरंत दर्ज की जा सकती है

स्ट्रॉन्ग रूम पर विवाद क्यों?

सुरक्षा, पारदर्शिता होने के बावजूद स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद होता रहता है। जानें हर चुनाव के बाद स्ट्रॉन्ग रूम पर सवाल क्यों उठते हैं?

राजनीतिक अविश्वास
भारतीय राजनीति में भरोसे की कमी एक बड़ी वजह है। हार की आशंका में पार्टियां पहले से ही शक जताने लगती हैं।

EVM पर बहस
कुछ राजनीतिक दल लंबे समय से EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं। इससे स्ट्रॉन्ग रूम भी विवाद के दायरे में आ जाता है।

छोटी घटनाएं, बड़ा असर
कभी-कभी छोटी प्रशासनिक चूक जैसे- गलत जगह ईवीएम का मिलना, सुरक्षा में कमी और परिवहन में देरी बड़े विवाद का कारण बन जाती है।

पश्चिम बंगाल में क्यों हो रहा ज्यादा बवाल?

पश्चिम बंगाल में स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा देखने को मिलते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:

-कड़ा राजनीतिक मुकाबला
-राज्य में चुनाव बेहद प्रतिस्पर्धी होते हैं जहां हर सीट पर कड़ा संघर्ष होता है।
-हिंसा और तनाव का इतिहास
-चुनाव के दौरान तनाव और हिंसा की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं जिससे अविश्वास बढ़ता है।
-लगातार आरोप-प्रत्यारोप
-हर चुनाव में पार्टियां एक-दूसरे पर EVM और स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर आरोप लगाती हैं।

स्ट्रॉन्ग रूम विवाद में अब सोशल मीडिया भी एक बड़ा फैक्टर बन रहा है। आज के दौर में कोई भी वीडियो या फोटो वायरल होकर माहौल को गरमा सकता है। भले ही वह अधूरी जानकारी पर आधारित हो या फेक हो। पश्चिम बंगाल में गुरुवार रात को हुए ड्रामे के लिए भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक सीसीटीवी फुटेज है। बाद में चुनाव आयोग ने इसे झूठा करार दिया।

चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग बार-बार यह स्पष्ट करता रहा है कि EVM पूरी तरह सुरक्षित हैं। स्ट्रॉन्ग रूम में छेड़छाड़ लगभग असंभव है। हर प्रक्रिया में राजनीतिक दलों को शामिल किया जाता है। आयोग यह भी कहता है कि ज्यादातर विवाद ‘गलतफहमी’ या ‘अधूरी जानकारी’ के कारण होते हैं।

तकनीकी रूप से सिस्टम मजबूत है लेकिन स्थानीय स्तर पर मानवीय त्रुटि संभव है। कई बार स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा में ढिलाई के आरोप कभी-कभी सामने आते हैं। हालांकि, अब तक ऐसे कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं जो यह साबित करें कि स्ट्रॉन्ग रूम के जरिए चुनाव परिणाम बदले गए हों।

चुनाव खत्म होने के बाद असली लड़ाई स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर शुरू होती है जहां राजनीति, भरोसा और टेक्नोलॉजी तीनों आमने-सामने होते हैं।

यह भी पढ़ें: बंगाल चुनाव में मतदाता सूची से 27 लाख नाम हटे, फिर भी रिकॉर्ड वोटिंग, 96 सीटों पर दिखा स्पष्ट पैटर्न

पश्चिम बंगाल के चुनाव दो कारणों से खास रहे। पहला- ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (डेटा में गड़बड़ी या शक होने पर नाम हटाना) नाम के नए मानदंड के तहत मतदाता सूची से 27.16 लाख नाम हटाए गए। दूसरा- रिकॉर्ड 92.95% मतदान हुआ जिसमें 2021 की तुलना में 31 लाख से ज्यादा वोट डाले गए। पढ़ें पूरी खबर….