अदम्य साहस और वीरता के लिए देश में अभी तक 21 फौजियों को परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। भारतीय सेना के कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया एकमात्र ऐसे सैनिक हैं, जिन्हें देश के बाहर असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान देने के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
यह कहानी बताने से पहले लेकर आपको चलते हैं कांगो, जहां 65 साल पहले बेहद विकट हालात थे। अफ्रीकी गणराज्य कांगो साल 1960 में बेल्जियम से स्वतंत्रता मिलने के गृहयुद्ध जैसे हालातों का सामना कर रहा था। मोइज त्शोम्बे के नेतृत्व में कांगो के कटांगा प्रांत को अलग देश घोषित कर दिया गया था। उस समय एलिजाबेथविल (आज का नाम लुबुम्बाशी) कटांगा राज्य का सबसे महत्वपूर्ण शहर था।
एलिजाबेथविल शहर में विदेशी भाड़े के सैनिक मौजूद थे। हालात को संभालने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कांंगो में शांति सैनिकों को भेजा। इन सैनिकों में भारत सहित कई देशों के सैनिक शामिल थे। इस मिशन का मकसद एलिजाबेथविल शहर में शांति बनाए रखना और अलगाववादी ताकतों को रोकना था।
तब एलिजाबेथविल शहर में भारी लड़ाई चल रही थी। यहां सड़कों को ब्लॉक करना, घात लगाकर हमले करना और गोलीबारी बेहद आम बात थी। ऐसे हालातों से निपटने के लिए UN ने यहां शांति सेना भेजी। भारतीय सेना में कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया भी इसी मकसद से कांगो भेजे गए थे।
कहानी कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया की वीरता की
5 दिसंबर 1961 का दिन था। कांगो के एलिजाबेथविल में आम दिनों की तरह तनाव चरम पर था। यहां शहर के एक बेहद महत्वपूर्ण चौराहे को दुश्मन ने ब्लॉक किया हुआ था। यह अवरोध शहर में मौजूद यूएन मुख्यालय और एयर फिल्ड के बीच था। इस रोड ब्लॉक को हटाने का महत्वपूर्ण काम कैप्टन गुरबचन सिंह और उनकी टीम को सौंपा गया।
योजना के अनुसार, दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया एयरफिल्ड की तरफ से चौराहे की तरफ बढ़े। कैप्टन सलारिया और उनके सैनिकों की कुल संख्या 90 के करीब रही होगी, जबकि दुश्मन काफी ज्यादा थे।
जब कैप्टन गुरबचन सिंह और उनकी टीम रोडब्लॉक वाली जगह से करीब 1400 मीटर दूर रही होगी, तभी अचानक दाहिनी ओर से उनकी टुकड़ी पर गोलियों की बौछार शुरू हो गई। दुश्मन पहले से घात लगाकर बैठा था, स्थिति बेहद खतरनाक थी।
हालात को भापते हुए कैप्टन सलारिया को समझ आया कि उनकी टुकड़ी अंबुश (ambush) में फंस गई है, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने समझदारी से फैसला लेते हुए तय किया कि वे आगे बढ़कर मुकाबला करेंगे, ताकि हेड क्वार्टर सुरक्षित रह सके। उन्होंने अपनी छोटी से टुकड़ी से हमला करते हुए दुश्मन के 40 सैनिकों को मार गिराया।
हालांकि, इस दौरान उनके गले में गोलियां लगीं, लेकिन बेहोश होने तक लड़ते रहे। कैप्टन गुरबचन सलारिया और उनकी छोटी सी टुकड़ी के साहस के सामने अधिक संख्या में होने के बाद भी दुश्मन घबरा गया और पीछे हटने को मजबूर हुआ। अगर यहां दुश्मन को सफलता मिल जाती तो वह मुख्य चौराहे पर लड़ रही बटालियन को घेर सकता था, जिससे संयुक्त राष्ट्र के हेड क्वार्टर को खतरा हो सकता था।
05 दिसंबर 1961 को 3/1 गोरखा राइफल्स को संयुक्त राष्ट्र संघ मिशन कार्य के दौरान एलिजाबेथविले में कटंगी सैनिकों द्वारा लगाए गए सड़क के अवरोधों को हटाने का आदेश मिला। जब कैप्टन सलारिया ने गोरखा कंपनी के साथ मिलकर अवरोध को हटाने का प्रयास किया तो उन्हें दुश्मन के भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। दुश्मन ने उनके दल पर स्वचालित हथियारों से भारी गोलाबारी की।
कैप्टन सलारिया के सैनिकों ने दुश्मन पर संगीनों, खुखरी और हथगोलों से आक्रमण कर 40 दुश्मनों को मार डाला और उनकी दो कारों को नष्ट कर दिया। कैप्टन सलारिया ने गर्दन पर गंभीर जख्म होते हुए भी तब तक लड़ाई जारी रखी जब तक कि वे अपने जख्मों के कारण वीरगति को प्राप्त नहीं हो गए।
उनकी बहादुरी और साहसपूर्ण कार्रवाई से दुश्मन बुरी तरह हतोत्साहित हो गया और अधिक संख्या में होने के बावजूद वहां से भाग खड़ा हुआ। इस तरह एलिजाबेथविले में स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय को बचा लिया गया। इस असाधारण नेतृत्व और अदम्य साहस के लिए कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय समर स्मारक
कांगो में दिखाई गई इस बहादुरी के लिए कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भारत सरकार ने साल 2023 में अंडमान और निकोबार के एक द्वीप का नाम भी उनके नाम (सलारिया द्वीप) पर रखा। दरअसल 23 जनवरी 2023 को पराक्रम दिवस के मौके पर अंडमान और निकोबार के 21 बड़े द्वीपों का नाम परमवीर चक्र से नवाजे गए 21 ‘धुरंधरों’ के नाम पर रखा गया था।
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बाना सिंह ने अपना हथियार जाम हो जाने के बाद बंकर में एक ग्रेनेड फेंका और दरवाजा बंद कर दिया, जिससे बंकर में मौजूद सैनिक मारे गए। इसके बाद आमने-भारतीय सैनिक बंकर के बाहर मौजूद पाकिस्तानियों पर टूट पड़े। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
