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जीवन सूत्र: किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार…

नाम था दुखभंजन। कहते थे कि खुदा से उनका साक्षात्कार होता रहता है। स्वभाव से बहुत सीधे सरल, मिलनसार, स्नेही और हमेशा खुशदिल। उनका कहना था कि वे जिस से भी मिलते उसका दुख हर लेते थे। सब लोग उनका बहुत सम्मान करते थे।

दुखभंजन दास जी कहते थे कि हमें अपने जानने वालों, मित्रों, रिश्तेदारों के दु:ख-दर्द सुनने चाहिए और अपने दु:ख-दर्द बांटने चाहिए क्योंकि दु:ख बांटने और प्रेम स्नेह से ही दूर किया जा सकता है।

नरपत दान चारण

मनुष्य जीवन में आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परिस्थितियां आती रहती हैं। इन परिस्थितियों से प्रताड़ित मनुष्य कभी कभी इतना दुखी होता है की उसे जीवन दर्द और जीना दुश्वारी भरा लगने लगता है। ऐसे हालात में मायूसी भी घर कर लेती है। आहिस्ता आहिस्ता आदमी भीतर से टूटने लगता है। स्वभाव से ही मनुष्य भावनाओं को लेकर बेहद संजीदा है। जब कभी भावनात्मक रुप से जुड़े व्यक्ति या वस्तु से दर्द मिलता है तो वह दर्द सबसे बड़ा होता हैं। उस दर्द से उबरना भी आसान नही होता। विडम्बना यह है कि कोई किसी का दुख दर्द सुनना नहीं चाहता।

ऐसी ही एक कहानी है। एक फकीर थे। नाम था दुखभंजन। कहते थे कि खुदा से उनका साक्षात्कार होता रहता है। स्वभाव से बहुत सीधे सरल, मिलनसार, स्नेही और हमेशा खुशदिल। उनका कहना था कि वे जिस से भी मिलते उसका दुख हर लेते थे। सब लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। जैसा कि सामान्यतया होता है कोई न कोई व्यक्ति पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से दुखी रहता है, उसी प्रकार वहां भी कुछ लोग दुखी थे।अब उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना दु:ख दर्द मिटाने फकीर के पास जाएंगे। चेहरे पर गहरी मायूसी लिए दस बारह लोग पहुंच गए।

फकीर की कुटिया में। फकीर ने उनको गले लगाया और अपने हाथों से पानी पिलाया। सभी के दु:ख वृतान्त सुने और विनम्र स्वभाव से कहा-आप सब की दु:ख-दर्द की कहानी का निवारण होगा। इसलिए आप दस दिन मेरे पास आइए। जब मुझे आपकी व्यथा वृतान्त समझ आ जाएगा तभी मैं उसे ईश्वर से कह पाऊंगा। सभी ने उनकी बात स्वीकार की और चल दिए अपने गांव। अब रोज वे सब आते और फकीर से मिलते। वह उन्हें गले लगाता और उनकी दु:ख कथा सुनता और सांत्वना देता।

ग्यारहवें दिन सब लोग आए जो उम्मीद और उत्सुकता से भरे थे। क्योंकि आज दु:ख मिटाने का फैसला था। अचानक फकीर जोर से हंसता हुआ कुटिया से निकला। सब को गले लगाया और सभी को एक-एक फूल और आशीर्वाद दिया। फिर वह बोला-मेरे प्यारे लोगों। आज मै देख रहा हूं कि आज आप लोगों के चेहरे पर मायूसी नहीं दिख रही है। सब लोगों ने कहा-हां गुरुदेव,अब हमें इतना दु:ख महसूस नही हो रहा है।

हम भूल गए हैं कुछ दर्द। शायद आपने हमारे दु:ख दर्द खुदा से मिलकर मिटा दिए हैं। तभी हम प्रसन्न है। फकीर ने गंभीरता से कहा-प्यारे बंधुओ! मंै भी आप जैसा ही इंसान हूं। मैं कोई खुदा से दु:ख मिटाने की अर्जी लेकर नहीं जाता। मैंने जानबूझकर दस दिन तक आपके दु:ख-दर्द सुने। आपने अपना दु:ख-दर्द मुझसे साझा किया और इससे आपका दु:ख हल्का हुआ। आपका मन अब दु:ख से आजाद है,भले ही आपको वो दु:ख याद है।

दु:ख की जगह आपकी भावनाओं से मैं जुड़ा और मैने आपको खुदा से जोड़ा। इसी प्रक्रिया में आपके विचार और मन जो केवल दु:ख की पीड़ा से जकड़े हुए थे अब वे विभाजित हो गए हैं। आपका मन हल्का हो गया है। बस इसी कारण आप खुश हुए हैं। फकीर ने कहा-यही दु:ख-दर्द की दवा है कि आप उसे अपनों से बांट लो। एकांत में मत रहो। आगे से आप लोग यह शपथ लें कि आप लोग भी दूसरों के दर्द को सुनेंगे, उसे सांत्वना देंगे।

जब समाज के सभी लोग मिलकर रहेंगे, एक दूसरे के दु:ख-दर्द बांटेंगे, एक दूसरे की सहायता करेंगे तो कोई दुखी नही रहेगा। दु:ख का कारण भी हम हैं, क्योंकि हम दु:ख और दुखी दोनों से दूर भागते हैं। इसे गले लगाओ। हमें अपने जानने वालों, मित्रों, रिश्तेदारों के दु:ख-दर्द सुनने चाहिए और अपने दु:ख-दर्द बांटने चाहिए क्योंकि दु:ख बांटने और प्रेम स्नेह से ही दूर किया जा सकता है। इसलिए दोस्तों किसी का दर्द मिटाते रहिए।

सब अच्छी बातें ही सुनना चाहते हैं। कई लोग अपने मित्र के बारे में बताते हंै कि यार वह तो हमेशा अपना दुखड़ा सुनाता रहता है। यानी कोई किसी के दुख का भागीदार बनना नहीं चाहता और यही दुख के बढ़ने का कारण है। अगर कोई किसी के दुख-दर्द को सुने, समझे और सांत्वना दे तो उसका दिल हल्का हो जाता है और धीरे धीरे समय के साथ उस दर्द को पूर्णतया भुलाया भी जा सकता है। कहा जाता है कि अगर किसी दुखी व्यक्ति को अपनत्व का सम्बल मिल जाए तो उसका दुख भाग जाता है। उसे मायूसी में खुशी की आशा नजर आने लगती है।

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