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राज्य बनाम केंद्रः क्या हैं सिविल सर्विस अफसरों के लिए सेंट्रल डेपुटेशन के नियम ?

पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेट्री जैसे मामले पहले भी हो चुके हैं। बंगाल ने दो बार पहले भी नहीं मानी थी केंद्र की बात। ऐसा ही तमिलनाडु में भी हुआ था, जहां एक बार अटल सरकार के दो मंत्री गिरफ्तार कर लिए गए थे।

अलपन बंद्योपाध्याय को नई दिल्ली में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया है। (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी अलपन बंद्योपाध्याय मंगलवार को अपने रिटायरमेंट के बाद तीन महीने के सेवा विस्तारण (extension) के अंतर्गत ड्यूटी शुरू करने वाले थे। लेकिन, केंद्र सरकार ने उन्हें एक दिन पहले सोमवार को अचानक दिल्ली पहुंच कर अपनी सेवाएं केंद्र सरकार को देने का आदेश जारी कर दिया। आखिर क्या हैं सेंट्रल डेपुटेशन के नियम? और, मामले में आगे क्या हो सकता है?

मामला: पश्चिम बंगाल सरकार ने 25 मई को केंद्र सरकार के 24 मई के अनुमोदन पत्र का उल्लेख करते हुए एक आदेश जारी किया। आदेश था कि जनहित के मद्देनज़र बंद्योपाध्याय का कार्यकल तीन महीने के लिए बढ़ाया जाता है। लेकिन, 28 मई को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) अचानक पत्र भेज कर सूचित किया कि कैबिनेट की नियुक्ति कमेटी ने चीफ सेक्रेट्री की तैनाती, तत्काल प्रभाव से, केंद्र सरकार में करने की मंजूरी दे दी है। पत्र में राज्य सरकार से अनुरोध किया गया था कि वह बंद्योपाध्याय को तत्काल प्रभाव से रिलीव कर दे। पत्र में बंद्योपाध्याय से 31 मई को सुबह दस बजे तक दिल्ली में रिपोर्ट करने को कहा गया था।

बंद्योपाध्याय को केंद्र सरकार में तैनात करने का कदम मुख्यमंत्री और चीफ सेक्रेट्री के प्रधानमंत्री की मीटिंग में न पहुंचने के बाद उठाया गया। मीटिंग पश्चिम बंगाल में ही थी, जहां प्रधानमंत्री तूफान से हुई क्षति का जायजा लेने गए थे।

कैसे होता है सेवा विस्तारण : मृत्यु सह रिटायरमेंट बेनीफिट नियमों की धारा 16 (1) कहती है कि यदि कोई अधिकारी बजट के काम में लगा है अथवा एक कमेटी का पूर्ण कालिक सदस्य है, जिसका काम कुछ महीनों में सिमट जाना है तो जनहित के मद्देनज़र उसे अधिकतम तीन महीने का सेवा विस्तार दिया जा सकता है। किसी राज्य के चीफ सेक्रेट्री के लिए यह अवधि छह महीने तक हो सकती है।

सेंट्रल डेपुटेशन: सामान्यतः होता यह है कि केंद्र सरकार हर साल उन आईएएस, आईपीएस और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस के अधिकारियों की सूची मांगती है जो सेंट्रल डेपुटेशन में जाना चाहते हैं। इसी सूची में से केंद्र उन अफसरों को छांट लेता है जो उसको उपयुक्त लगते हैं।

आइएएस काडर का रूल 6(1) कहता है कि चयनित अधिकारी को केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार में तैनाती का काम केंद्र सरकार और राज्य सरकार (जहां अधिकारी संबद्ध था) की सहमति से किया जाता है। किसी असहमति की स्थिति में मामला केंद्र सुलझाता है और उसका फैसला राज्य या राज्यों को लागू कराना होता है।

पिछले साल अबू सोहेल नाम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा कर कहा था कि उपर्युक्त नियम रद्द कर दिया जाए। वकील ने कहा था कि इस नियम के कारण राज्यों को केंद्र की मनमानी सहनी पड़ती है लेकिन इसी के साथ अगर राज्य न चाहे तो केंद्र को अपनी बात मनवाना कठिन हो जाता है। अदालत ने याचिका को महत्वहीन करार देकर खारिज कर दिया था।

केंद्र-राज्य टकरावः पुराने मामले

*फरवरी 2019 में गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेट्री से पांच आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक पत्र लिखा। इस पुलिस अफसरों ने सीबीआई छापों के खिलाफ टीएमसी के धरने में कथित रूप से भाग लिया था। गृह मंत्रालय ने इन अफसरों के मेडल वापस लेने को कहा था। इस बाबत इंडियन एक्सप्रेस ने इस साल जनवरी में एक आरटीआई लगा कर पूछा था तो सवालों को अस्पष्ट और काल्पनिक बताते हुए जवाब आया था कि ये चीज़ें आरटीआई की परिधि में नहीं आतीं। हालांकि एक पहले की आरटीआई याचिका पर इतना सूचित किया गया था कि किसी भी अफसर के मेडल वापस नहीं लिए गए हैं।

*अभी पिछले साल दिसंबर में भी केंद्र सरकार ने तीन आईपीएस अफसरों को डेपुटेशन पर मांगा था लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र की बात मानी ही नहीं। मामला भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिेले पर टीएमसी के कथित हमले का था। ये तीन अफसर सिक्योरिटी इंचार्ज थे। राज्य सरकार ने इनको केंद्र को न सौंपते हुए जवाब दिया था कि हमारे यहां पहले से ही अफसरों की कमी है। राजीव मिश्रा, प्रवीण त्रिपाठी और भोलानाथ पांडेय नामके ये अफसर अब भी बंगाल सरकार की सेवा में लगे हैं।

*तमिलनाडु में 2001 में जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के एक माह बाद राज्य की सीबी-सीआईडी ने डीएमके के दिग्गज नेता करुणानिधि के घर छापे डाले थे और करुणानिधि एवं मुरासोली मारन व टीआर बालू को गिरफ्तार कर लिया था मारन व बालू उस वक्त अटल सरकार में मंत्री थे। इस मामले के अगले ही महीने केंद्र ने तीन आईपीएस अफसरों को केंद्र भेजने का आदेश दिया था, जिसे जयललिता ने कभी नहीं माना। वे तो आज्ञा मानने की जगह दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस मामले में समर्थन जुटाने में लग गई थीं। गाज राज्यपाल फातिमा बीबी पर गिरी थी। केंद्र मामले में उनकी रिपोर्ट से खुश नहीं था।

*तमिलनाडु का दूसरा मामला 2014 का है। वहां की आईपीएस अफसर अर्चना रामसमुद्रम को सीबीआई में डेपुटेशन मिला था मगर राज्य सरकार ने उनको रिलीव नहीं किया और आदेश न मानने के आधार पर सस्पेंड कर दिया। लेकिन सस्पेंशन की कार्रवाई उन पर लागू ही नहीं हुई क्योंकि उसके पहले वे सीबीआई ज्वाइन कर चुकी थीं।

अब क्या हो सकता है : किसी राज्य में तैनात सिविल सर्विस अधिकारी के खिलाफ केंद्र सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। ऑल इंडिया सिविल सर्विस रूल्स, 1969 के मुताबिक कार्रवाई शुरू करने और सजा लागू करने का अधिकार उस राज्य की सरकार के पास निहित होगा जहां पर अधिकारी सेवाएं दे रहा होगा।  लेकिन नियमों के मुताबिक कार्रवाई के लिए राज्य के साथ केंद्र सरकार का सहमत होना जरूरी है।

बंद्योपाध्याय के पास विकल्प क्या हैं: डीओपीटी सूत्रों के मुताबिक बंद्योपाध्याय के पास तीन विकल्प हैं। पहला कि वे तीन महीने का सेवा विस्तार न लेते हुए रिटायर हो जाएं। दूसरा, वे सेवा विस्तार लेकर इस दौरान राज्य में बतौर चीफ सेक्रेट्री अपनी सेवाएं देते रहें। और, तीसरा, वे डीओपीटी को रिपोर्ट करें और तीन महीने का एक्सटेंसन पीरियड केंद्र की मर्जी से काटें। चीफ सेक्रेट्री ने इस बाबत इंडियन एक्सप्रेस द्वारा भेजे गए प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया।

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