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जानें-समझें: कोरोना काल में कमाई की चाह, शराब की बिक्री जरूरी या मजबूरी

दक्षिण के पांच राज्यों समेत महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान का कुल मिलाकर शराब खपत में 75 फीसद हिस्सा है। शराब की दुकानों को फिर खोलना इन राज्यों के लिए एक बड़ी चुनौती भी बन सकती है, क्योंकि देश में कोरोना विषाणु संक्रमण के 85 फीसद से ज्यादा मामले इन्हीं राज्यों में सामने आए हैं। इसमें सबसे अधिक 31.2 फीसद मामले महाराष्ट्र में हैं।उसके बाद दिल्ली में 10 फीसद, तमिलनाडु में 7.6 फीसद, मध्य प्रदेश में सात फीसद और उत्तर प्रदेश में 5.9 फीसद कोरोना संक्रमण के मामले हैं। सबसे कम मामले केरल में हैं, जो एक फीसद से भी नीचे हैं।

शराब की बिक्री शुरू करने की अनुमति मिलने से दुकानों पर सोशल डिस्टेंसिंग को दरकिनार कर भारी भीड़ जुटी।

चार मई से देश के सभी राज्यों में शराब की दुकानें खुल गई हैं। दुकानों पर भीड़ उमड़ रही है। कोरोना संक्रमण के काल में सुरक्षात्मक दूरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे संक्रमण और फैलने की आशंका जताई जा रही है। लेकिन राज्य सरकारों का जोर शराब से हो रही अपनी आमदनी और आमदनी बढ़ाने की योजनाओं पर है। करीब 40 दिन बाद खुलीं दुकानों से राज्य सरकारों के आमदनी में जबरदस्त इजाफा हुआ है। कई राज्यों में शराब की रेकॉर्ड बिक्री दर्ज की गई है।

कैसी हो रही कमाई
शराब की दुकानों में बिक्री ने कई रेकॉर्ड कायम किए हैं। कर्नाटक सरकार ने सिर्फ एक दिन में शराब की बिक्री से 45 करोड़ रुपए कमाए हैं। आंध्र प्रदेश में पहले दिन की कमाई 40 करोड़ रुपए रही। दिल्ली में शराब की दुकानों पर जनसैलाब टूट पड़ा है। महाराष्ट्र का आबकारी विभाग सिर्फ मई महीने में दो हजार करोड़ रुपए कमाने का लक्ष्य बना चुका है। वहां रोजाना 80-100 करोड़ कमाने की योजना है। दिल्ली में 70 फीसद कोरोना फीस लगाकर कीमत वसूली जा रही है। राज्य का तर्क है कि कमाई का इस्तेमाल मरीजों के इलाज में किया जाएगा।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले हफ्ते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर शराब के ठेके खोलने की अनुमति मांगी थी। कैप्टन ने इसके पीछे खराब हो रही वित्तीय स्थिति का हवाला दिया था। उन्होंने कहा कि राज्य को हर महीना 521 करोड़ की आय से हाथ धोना पड़ रहा है। कमोबेश इसी तरह के तर्क सभी राज्य सरकारों ने दिए। गुजरात, बिहार, मिजोरम और नागालैंड में पूर्ण रूप से शराबबंदी है। हरियाणा और आंध्रप्रदेश में शराबबंदी फेल साबित हुई।

राजस्व और आबकारी शुल्क
रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019-20 के दौरान 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली एवं पुदुचेरी ने शराब से 1,75,501.42 करोड़ रुपए का उत्पाद शुल्क जुटाने का बजट रखा था। यह 2018-19 के शुल्क 1,50,657.95 करोड़ रुपए से 16 फीसद अधिक था। 2018-19 में राज्यों ने प्रति माह लगभग 12,500 करोड़ रुपए जुटाए, जो 2019-20 में प्रति माह लगभग 15,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

राज्यों के राजस्व में शराब पर लगने वाला एक्साइज टैक्स यानी आबकारी शुल्क का योगदान बड़ा होता है। शराब और पेट्रोल-डीजल के जीएसटी से बाहर होने पर राज्य अब शराब पर भारी टैक्स लगाकर अपना राजस्व बढ़ाते हैं। ज्यादातर राज्यों के कुल राजस्व का 15 से 30 फीसद हिस्सा शराब से आता है। उत्तरप्रदेश में शराब से मिलने वाला आबकारी शुल्क कुल राजस्व का करीब 20 फीसद है।

पूर्णबंदी में कितना नुकसान
पिछले वित्त वर्ष में सभी राज्यों ने कुल मिलाकर करीब 2.48 लाख करोड़ रुपए, 2018 में 2.17 लाख करोड़ और 2017 में 1.99 लाख करोड़ की कमाई की थी। 2019 के आंकड़ों के अनुसार, पूर्णबंदी के पहले और दूसरे चरण में 40 दिनों के दौरान सभी राज्यों को शराब की बिक्री नहीं होने पर औसतन करीब 27 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। 2019 में महाराष्ट्र ने 24,000 करोड़ रुपए, उत्तर प्रदेश ने 26,000 करोड़, तेलंगाना ने 21,500 करोड़, कर्नाटक ने 20,948 करोड़, पश्चिम बंगाल ने 11,874 करोड़, राजस्थान ने 7,800 करोड़ और पंजाब ने 5,600 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल किया था।

दिल्ली ने करीब 5,500 करोड़ रुपये का आबकारी शुल्क हासिल किया था। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की एक रिसर्च के मुताबिक, पूर्णबंदी से पहले 16 करोड़ लोग शराब का सेवन करते थे, उनमें से तीन करोड़ लोगों को शराब की लत थी। छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल में शराब से होने वाली आय में 100 गुना इजाफा देख सरकार ने खुद शराब बेचने को फैसला किया।

आधी खपत दक्षिणी राज्यों में
देशभर में जितनी शराब की खपत होती है, उसमें से करीब आधी शराब अकेले पांच दक्षिणी राज्यों में पी जाती हैं। दिल्ली सरकार अपने राजस्व का 12 फीसद शराब से कमाती है, लेकिन देश के कुल शराब उपभोग में इसकी हिस्सेदारी मात्र चार फीसद है। रेटिंग एजंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में 45 फीसद शराब की खपत होती है।

लेकिन शराब से इनकी राजस्व आय मात्र 10-15 फीसद है। इसमें भी तमिलनाडु और केरल को शराब से 15 फीसद राजस्व मिलता है।
आंध्रप्रदेश और कर्नाटक को इससे 11 फीसद और तेलंगाना को उनके कुल राजस्व का 10 फीसद राजस्व ही प्राप्त होता है। देश के कुल शराब उपभोग में सबसे अधिक हिस्सेदारी 13 फीसद तमिलनाडु की है। कर्नाटक में 12 फीसद खपत होती है। देश में शराब पर सबसे अधिक कर महाराष्ट्र में वसूला जाता है, लेकिन राज्य के राजस्व में हिस्सेदारी सिर्फ आठ फीसद है।

जानकारों की राय
पूर्णबंदी से पहले हर राज्य को सिर्फ शराब की बिक्री से रोजाना 700 करोड़ रुपए की कमाई होती रही है। 2019-20 वित्तीय वर्ष में सभी राज्यों की कुल सालाना कमाई 2.48 लाख करोड़ रुपए रही है। आमदनी के इस आंकड़े को नजरअंदाज करना सहज नहीं है।
– अमृत किरण सिंह, अध्यक्ष, इंटरनेशनल स्पीरीट एंड वाइन एसोसिएशन आॅफ इंडिया

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 में स्वास्थ्य के लिए नुकसान पहुंचाने वाले मादक पेय पर प्रतिबंध का जिक्र किया गया है। अनुच्छेद 47 सीधे तौर पर शराब पर पाबंदी नहीं लगाता है, लेकिन शराब समेत नशीले पदार्थ पर पाबंदी को सरकार का प्राथमिक कर्त्तव्य बताया गया है।
– उपेंद्र मिश्रा, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

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