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बजट आबंटन में कंजूस हैं राज्य सरकारें

राष्ट्रीय राजधानी में दो दिसंबर को आयोजित कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों द्वारा पेश आंकड़ों से इन प्रदेशों की अपने यहां बाल अधिकारों को लेकर गंभीरता का अंदाजा मिलता है।

Author December 7, 2018 7:36 AM
तस्वीर का उपयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

नोएडा के कुख्यात निठारी कांड के बाद साल 2007 में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) का गठन हुआ और कई साल की मशक्कत के बाद राज्य स्तर पर भी बाल अधिकार संरक्षण आयोगों (एससीपीसीआर) का गठन किया गया। लेकिन, क्या राज्य सरकारें अपने यहां बच्चों के अधिकारों को लेकर गंभीर हैं? हाल ही में दिल्ली में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की कार्य पद्धति पर आयोजित कार्यशाला में देश भर के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा पेश आंकड़ों से पता चलता है कि अगर एससीपीसीआर के लिए आबंटित बजट व संसाधनों की बात करें तो गुजरात सबसे आगे है, वहीं मध्य प्रदेश सबसे पीछे माना जा सकता है। मध्य प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो अन्य हिंदीभाषी राज्यों में आयोग के बजट को लेकर गंभीरता दिखती है, हालांकि, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने बजट की जानकारी नहीं दी है।

राष्ट्रीय राजधानी में दो दिसंबर को आयोजित कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों द्वारा पेश आंकड़ों से इन प्रदेशों की अपने यहां बाल अधिकारों को लेकर गंभीरता का अंदाजा मिलता है। अगर बजट की बात करें तो गुजरात में राज्य बाल आयोग को 2018-19 के लिए सबसे ज्यादा 5.8 करोड़ रुपए आबंटित किए गए। वहीं उपलब्ध आंकड़ों में मध्य प्रदेश पीछे से दूसरे नंबर पर है। बड़ा राज्य होने के बावजूद यहां 2018-19 के लिए एससीपीसीआर को मात्र 9.2 लाख रुपए आबंटित किए गए। इतना ही नहीं मध्य प्रदेश में आयोग के अंदर 46 तकनीकी और गैर तकनीकी पदों का प्रावधान है, लेकिन सिर्फ 18 पदों पर नियुक्तियां हुई हैं और बाकी रिक्त हैं।

लांकि, मप्र सरकार ने आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री के बराबर का दर्जा दिया है, लेकिन वेतन या मानदेय मात्र 6500 रुपए प्रतिमाह रखा है। हालांकि, मध्य प्रदेश उन छह राज्यों में है जहां शिक्षा का अधिकार कानून के लिए बजट आबंटित किया गया है। बजट के मामले में मध्य प्रदेश से पीछे मात्र त्रिपुरा है जहां 2018-19 के लिए आयोग को नौ लाख का बजट दिया गया।

मध्य प्रदेश को यदि छोड़ दिया जाए तो अमूमन हिंदी भाषी राज्यों का प्रदर्शन बजट (2018-2019) के लिहाज से बेहतर है। बिहार और छत्तीसगढ़ ने दो करोड़ रुपए आबंटित किए। चंडीगढ़ ने एक करोड़, दिल्ली ने 1.25 करोड़, झारखंड ने 70 लाख और उत्तराखंड ने 18.18 लाख रुपए आबंटित किए। वहीं उत्तर प्रदेश राज्य आयोग ने अपने लिए आवंटित बजट की जानकारी उपलब्ध करवाने में असमर्थ रहा। लेकिन आयोग ने शिक्षा का अधिकार कानून के तहत बजट आवंटन दिखाया है। राजस्थान एससीपीसीआर ने भी केंद्रीय आयोग द्वारा मांगे गए जरूरी आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने कहा कि राज्य बाल आयोगों को उचित संसाधन नहीं मुहैया कराए जाते जिससे बाल अधिकारों की निगरानी प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा राज्य सरकारों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। एससीपीसीआर की कार्य पद्धति पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी लोकुर ने कहा कि हमारे पास उत्तम नीतियां हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन सही ढंग से सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है। उन्होंने आयोगों को विधिक सहायता उपलब्ध कराने के प्रति भी संभव मदद करने का आश्वासन दिया। एनसीपीसीआर की सदस्य सचिव गीता नारायण ने कहा कि आयोगों में निश्चित स्टाफ की संख्या के लिए दिशानिर्देश विकसित किए जाने के लिए संभव कदम उठाए जाएंगे।

शिक्षा का अधिकार : सिर्फ छह राज्यों ने आबंटित की राशि
मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई), 2009 के प्रावधानों के मुताबिक शिक्षा का अधिकार कानून की निगरानी भी एससीपीसीआर के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में से एक है। लेकिन 27 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक केवल छह राज्यों ने जरूरी राशि आबंटित किए हैं। बिहार ने दो करोड़, दिल्ली ने 3.89 करोड़, केरल ने 22 लाख, मध्य प्रदेश ने 6.3 लाख और महाराष्ट्र ने 74.5 लाख रुपए की राशि आरटीई के लिए आबंटित की है। उत्तर प्रदेश ने भी आईटीई के लिए राशि आबंटित की है।

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