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‘ऑक्सीजन देखते रहना’, नर्स की बात याद कर रो पड़ी महिला, 5 महीने के बेटे को खोने के बाद दंपत्ति ने बताया कोटा अस्पताल का हाल

एनआईसीयू के बाहर एक खुले डस्टबिन में जूठा खाना रखा हुआ मिला और सर्जिकल मास्क का इस्तेमाल किया गया जबकि ऑक्सीजन सिलेंडर चारों ओर बिखरे हुए मिले।

Edited By रवि रंजन कोटा (राजस्थान) | Updated: January 3, 2020 12:47 PM
जेके लोन अस्पताल में भर्ती बच्चे और उनके साथ परिजन (Express photo by Rohit Jain Paras)

पदमा रावल राजस्थान के कोटा जिले के जेके लोन सरकारी अस्पताल के उस विशाल परिसर के अंदर हैं जहां लोग काफी तनाव में हैं। उनकी उम्र 20 साल के आसपास है और वे अपने पति संजय के साथ हैं। वे काफी चिड़चिड़ाहट, गुस्से और दुख के दौर से गुजर रही हैं। रावल कहती हैं, “इतनी सारी प्रार्थनाओं के बाद मुझे एक बच्चा मिला लेकिन अब उसे भी मैं खो चुकी हूं।” निमोनिया से पीड़ित होने के बाद उन्होंने इस अस्पताल में अपने बच्चे को भर्ती करवाया था। भर्ती करवाए जाने के एक दिन बाद 23 दिसंबर को उनके पांच महीने के बेटे की मौत हो गई।

पदमा के पति संजय स्थानीय बीज बाजार में काम करते हैं. वे कहते हैं, “अस्पताल के कर्मचारी हमें यह कहते थे कि वे यह चेक करते रहें कि ऑक्सीजन पाइप काम कर रहा है या नहीं? आखिर हम इसका पता कैसे लगा पाते? यह यह नर्सिंग स्टाफ की ड्यूटी नहीं है? साथ ही यहां सफाई भी नहीं है।” दिसंबर महीने में जेके अस्पताल में 100 बच्चों की मौत हुई है। रावल दंपति का बच्चा भी इन्हीं बच्चों में से एक था।

मौजूदा कांग्रेस सरकार यह कहते हुए अपना बचाव कर रही है कि यह असामान्य घटना नहीं है। जेके लोन सरकारी अस्पताल में 2019 में 963 बच्चों की मृत्यु पूर्ववर्ती वर्षों की तुलना में कम है। इससे पहले 1198 (2014), 1260 (2015), 1193 (2016), 1027 (2017) और 1005 (2018) बच्चों की मौत हो चुकी है। महीने में औसतन करीब 100 बच्चों की मौत।

जब इंडियन एक्सप्रेस ने गुरुवार को अस्पताल का दौरा किया, तो मरीजों के परिवारों ने निराशाजनक सुविधाओं की ओर इशारा किया और शिकायत की कि मदद के लिए उनकी पुकार नहीं सुनी जा रही है। दरअसल, नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) के बाहर एक खुले डस्टबिन में जूठा खाना रखा हुआ मिला और सर्जिकल मास्क का इस्तेमाल किया गया जबकि ऑक्सीजन सिलेंडर चारों ओर बिखरे हुए मिले। लोगों की लंबी कतार, ज्यादातर माता-पिता और रोगियों के रिश्तेदार, सहायता के लिए इंतजार कर रहे थे।

कोटा के रहने वाल 32 वर्षीय वसीम खान कहते हैं, “सफाई की हालत बहुत खराब है और कोई भी मरीजों के परिवारों के अनुरोधों या प्रश्नों पर ध्यान नहीं देता है। मेरे भतीजे का जन्म लगभग 15 दिन पहले इसी अस्पताल में हुआ था। करीब एक हफ्ते के बाद, उसे और उसकी मां को छुट्टी दे दी गई। लेकिन घर जाने के दो-तीन दिनों के भीतर उन्होंने सांस लेने की समस्या बताई और उन्हें एक बार फिर से भर्ती कराया गया।” अस्पताल के बाल रोग विभाग के अनुसार, जनवरी 2019 से हर महीने कम से कम 60 बच्चों की मौत हुई है। कुछ महीनों में संख्या 100 – अगस्त (87), सितंबर (90), अक्टूबर (91), नवंबर (101) और दिसंबर (100) के करीब हो गई है।

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