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तीन-तीन चुनाव हारने वाले जितिन प्रसाद को विधान परिषद भेजने की अटकल, यूपी बीजेपी में गुटबाज़ी बढ़ने का डर

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव से ठीक पहले कांग्रेसी नेता जितिन प्रसाद का बीजेपी में शामिल होना अब भगवा पार्टी में गुटबाजी की वजह बन सकता है।

जितिन प्रसाद कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए हैं। (एक्सप्रेस फोटो)।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव से ठीक पहले कांग्रेसी नेता जितिन प्रसाद का बीजेपी में शामिल होना अब भगवा पार्टी में गुटबाजी की वजह बन सकता है। दरअसल ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी जितिन प्रसाद को विधान परिषद भेज सकती है। यूपी विधान परिषद में जो 4 सीटें खाली हो रही हैं, इस समय उन सीटों से समाजवादी पार्टी के नेता सदन के सदस्य हैं। बीजेपी बहुत आराम से इन चारों सीटों पर जीत हासिल करने वाली है।

उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी ने जितिन प्रसाद को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पार्टी में शामिल किया है। जिससे कि सूबे में ब्राह्मण वोट पार्टी की तरफ रहे। उत्तर प्रदेश में 12% आबादी ब्राह्मण वोटरों की है ऐसे में पार्टी नहीं चाहती है कि वोटरों का यह तबका पार्टी से नाराज हो। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जितिन प्रसाद को भारतीय जनता पार्टी में केंद्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी दी जाएगी या फिर राज्य स्तर पर काम सौंपा जाएगा। हालांकि इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर रहा है कि उन्हें विधान परिषद भेजा जा सकता है।

हालांकि जितिन प्रसाद की एंट्री से बीजेपी के उन नेताओं के सपने चकनाचूर हो सकते हैं जो कि यह सोच रहे थे कि उन्हें पार्टी की ओर से विधान परिषद का सदस्य बनाया जा सकता है। इससे पहले पूर्व नौकरशाह अरविंद शर्मा, जो कि पीएम मोदी के करीबी माने जाते हैं, को कुछ इसी तरीके से विधान परिषद का टिकट मिल गया था। हालांकि शर्मा पूर्वांचल की भूमिहार जाति से संबंध रखते हैं।

राज्य इकाई ने फिलहाल इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन पार्टी भी सोच रही है कि क्या दूसरे दल से आए नेता को इस तरह से विधान परिषद भेजना कितना सही रहेगा? पार्टी नहीं चाहती है कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अंदर भीतरी और बाहरी नेताओं को लेकर बहस छिड़े।

मालूम हो कि जितिन प्रसाद केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। हालांकि जितिन प्रसाद को बीते 2 लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी जितिन प्रसाद को हार का ही मुंह देखना पड़ा था।

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