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सीमा विवाद : विशेष सीमांत बल से कैसे उड़ी चीन की नींद

भारत के एसएफएफ में मूलत: तिब्बती ही हैं, जो अपने देश को आजाद करने के संकल्प के लिए कुर्बानियां दे रहे हैं। सीमा के उस पार भी उसी नस्ल और क्षेत्र के तिब्बती हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: September 22, 2020 5:27 AM
सीमा पर चीन से मुकाबले के लिए विशेष सीमांत बल (SFF) पूरी तरह से तैयार है।

पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद में तिब्बत के मुद्दे पर कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर भारत के साथ अमेरिका ने भी कूटनीतिक कवायद शुरू कर दी है और फिलहाल चीन बैकफुट पर दिख रहा है। दरअसल, लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे से लगे इलाके में भारत के विशेष सीमांत बल ‘स्पेशल फ्रंटियर फोर्स’ की विकास रेजिमेंट के कंपनी लीडर नीमा तेंजिंग की सैनिक अभियान के दौरान मौत के बाद तिब्बत के मुद्दे पर कूटनीतिक कवायद तेज हुई है।

नीमा तेंजिंग भारत के अपनी रेजिमेंट में कंपनी लीडर थे और भारतीय टुकड़ी और चीनी सेना के बीच पैंगोंग झील क्षेत्र में हुई भिड़ंत में उनकी जान चली गई। तिब्बत की निर्वासित संसद की सदस्य नामडोल लागयारी के मुताबिक, तेंजिंग के शव को परिवार को सौंपते हुए घटना को गुप्त रखने की हिदायत दी गई थी, लेकिन तिब्बतियों की नाराजगी अब सामने आने लगी है।

तेंजिंग को भारत और तिब्बत के झंडे में लपेट कर अंतिम विदाई दी गई। उनकी अंत्येष्टि में स्वतंत्र तिब्बत के झंडे लहराए गए। इसके बाद तिब्बतियों को लेकर चीन दबाव में आ गया। दूसरे चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि पिछले छह महीने में बहुत धूमिल हुई है। कुछ दिन पहले ताइवान ने चीन की सैन्य पनडुब्बी को मिसाइल से ध्वस्त कर दिया था। ताइवान के सिर पर अमेरिका का हाथ है। के विश्वस्त पड़ोसी देशों, मसलन मलेशिया और थाईलैंड ने भी एक निश्चित दूरी बना ली है। ऐसे में तिब्बतियों का बगावत उसे भारी पड़ सकता है।

चीन की दुखती रग तिब्बत ही है। तिब्बत चीन के लिए दीवार की तरह है। चीन की सेना ने भारत के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने कब्जे वाले तिब्बतियों को लेकर गठित रेजिमेंट को तैनात करने की योजना बनाई थी। लेकिन तेंजिंग की शहादत के बाद चीन के कब्जे वाले तिब्बत में बगावत की आशंका के बाद यह योजना रोक दी गई।
यह संदेश साफ हो गया है कि भारत के एसएफएफ में मूलत: तिब्बती ही हैं, जो अपने देश को आजाद करने के संकल्प के लिए कुर्बानियां दे रहे हैं। सीमा के उस पार भी उसी नस्ल और क्षेत्र के तिब्बती हैं। अंतर इतना सा है कि वह चीन के चंगुल में हैं और इधर के लोग चीन के चंगुल से आजाद हैं। चीन को आशंका सता रही है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चल रही खींचतान तिब्बतियों के स्वतंत्रता संग्राम में न बदल जाए।

दरअसल, 1962 में तैयार किए गए विशेष सैन्यदल एसएफएफ को भारतीय फौज का नहीं, बल्कि भारत की गुप्तचर एजंसी रॉ का हिस्सा बनाया गया है। एसएफएफ के काम की निगरानी रॉ के जरिए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय करता है। इस सैन्य बल में तिब्बत के शरणार्थियों को नियुक्त किया गया है, जो 1950 में और बाद में दलाई लामा के साथ 1959 में भागकर भारत आ गए थे। पिछली सदी के छठे दशक में इस टुकड़ी के लोग खंपा विद्रोह के नायक के रूप में जानेजाते हैं। इस बगावत में तिब्बत को आजाद कराने का अभियान छेड़ा गया था।

खुफिया ब्यूरो के संस्थापक निदेशक भोलानाथ मल्लिक और दूसरे विश्व युद्ध के सैनिक और बाद में ओड़ीशा के मुख्यमंत्री रहे बीजू पटनायक की सलाह पर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बती गुरिल्ला टुकड़ी तैयार करने की सोची जो हिमालय के खतरनाक क्षेत्र में चीनियों से लोहा ले सके। एसएफएफ के प्रथम प्रमुख यानी प्रथम महानिरीक्षक थे मेजर जनरल (रिटायर्ड) सुजान सिंह उबान। वे द्वितीय विश्व युद्ध के ब्रिटिश भारतीय सेना में 22 माउंटेन रेजिमेंट के कमांडर थे।

कारगर एसएपएफ
इस सैन्य बल का मुख्यालय उत्तराखंड के चकराता में है। गठन के दौर में अमेरिकी और भारतीय खुफिया ब्यूरो द्वाराप्रशिक्षित एसएफएफ का भारत ने बांग्लादेश युद्ध, करगिल, आपरेशन ब्लू स्टार व कई कार्रवाइयों में इस्तेमाल किया। एसएफएफ के कमांडो को खंपा विद्रोह का उत्तराधिकारीनायक कहा जाता है।

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