scorecardresearch

कहीं आधे न रह जाएं दक्षिण एशिया के हिमनद

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी के मुताबिक, दुनिया के मुकाबले हिमालयी क्षेत्र में तापमान करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है।

कहीं आधे न रह जाएं दक्षिण एशिया के हिमनद

एशिया के उच्च पर्वतीय क्षेत्र को सेंट्रल एशियन माउंटेन रीजन भी कहा जाता है। इसमें हिमालयन, कराकोरम और हिंदुकुश पर्वत श्रृंखलाएं आती हैं जो चीन से लेकर अफगानिस्तान तक फैला है। इस क्षेत्र में करीब 55 हजार हिमनद हैं, जिनमें पेयजल का जितना भंडार है उतना पृथ्वी पर एक साथ पेयजल कहीं नहीं है, सिवाय उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के।

इन हिमनदों से पिघला हुआ जल एशिया की दस सबसे बड़ी नदियों को जीवन देता है, जिन पर करीब दो करोड़ लोगों की आबादी निर्भर रहती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियां ही करीब 7.5 अरब लोगों को जीवन देती हैं। चीन की यांग्सी नदी एशिया की सबसे बड़ी नदी है तो दक्षिण-पूर्व एशिया की मेकांग नदी भी हिमालयी हिमनदों के पानी पर ही निर्भर हैं।

बढ़ते तापमान की वजह से इन सभी पर खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी के मुताबिक, दुनिया के मुकाबले हिमालयी क्षेत्र में तापमान करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है जिसकी वजह से बर्फ पिघल रही है और बर्फबारी हो रही है। यदि दुनिया भर के नेता अपने वादे के मुताबिक वैश्विक तापमान में 1.5 फीसद कमी करने के फैसले पर अमल नहीं करते हैं तो इस शताब्दी के अंत तक दक्षिण एशिया के पहाड़ों पर जो बर्फ है, उसका आधा या फिर दो-तिहाई हिस्सा गायब हो जाएगा।

जर्मनी के एक गैर लाभकारी समूह जर्मनवाच के क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स के मुताबिक, नेपाल और पाकिस्तान उन दस प्रमुख देशों में हैं, जहां जलवायु परिवर्तन का खतरा सबसे ज्यादा है, जबकि भारत और अफगानिस्तान इस मामले में शीर्ष के बीस देशों में आते हैं। भारत में कोलकता के जीआइएस विश्वविद्यालय में हिमनद मामलों के जानकार अतनु भट्टाचार्य कहते हैं, ग्लेशियरों को निश्चित तौर पर पिघलना है।

हालांकि, अभी ताजे यानी पीने योग्य पानी की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में है, लेकिन भविष्य में यह कितना बचा रहेगा, यह स्पष्ट नहीं है। भट्टाचार्य कहते हैं कि नीति निर्धारकों को खेती के बारे में भी सोचना चाहिए जो कि इस क्षेत्र में लोगों की आमदनी और आजीविका का सबसे प्रमुख साधन है। उनके मुताबिक खेती में जल प्रबंधन और जल शोधन के क्षेत्र में निवेश करने की जरूरत है। पिघलते हिमनदों की वजह से बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के बाहरी हिस्सों में 250 से ज्यादा पनबिजली परियोजनाएं हैं।

झीलों में पानी बढ़ने से यहां भी बाढ़ आ जाती है। हर तीन में से एक बिजली संयंत्र को इस बाढ़ का अनुभव होता है और इसकी वजह से होने वाला नुकसान इनके निर्माण पर होने वाले खर्च की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। भट्टाचार्य कहते हैं, यदि हमारे पास हिमालय से आने वाले पानी की कमी है या पानी नहीं आता है तो हम बिजली नहीं पैदा कर सकते।

पिछले साल भारत ने गंगा नदी पर नए पनबिजली संयंत्रों के निर्माण पर रोक लगा दी थी, ताकि निचले इलाकों में नदियों के पानी के बहाव को बनाए रखा जा सके और नदियां सूखने ना पाएं। जानकारों का कहना है कि वायु प्रदूषण में कमी लाकर हिमनदों को बचाया जा सकता है। एशिया में दो-तिहाई राख र्इंट के भट्ठों और लकड़ियों के जलाने से पैदा होती है। इसके बाद सबसे ज्यादा प्रदूषण डीजल वाहनों से होता है।

कुल प्रदूषण में डीजल वाहनों की हिस्सेदारी सात से 18 फीसद तक होती है। ग्लेशियरों के पिघलने की दर को कम करने के तरीके ढूंढ़ने के बावजूद, तमाम वैज्ञानिक भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। जीवाश्म र्इंधनों के जरिए लोग उन गैसों को वायुमंडल में छोड़ते हैं जो पृथ्वी के चारों ओर ग्रीनहाउस की तरह काम करती हैं और धरती गर्म होने लगती है। कोयला, तेल और गैस जलाने पर कालिख और पार्टिकुलेट मैटर छोड़ते हैं। हवा के जरिए ये काले पदार्थ बर्फ के ऊपर जम जाते हैं और सफेद बर्फ की तुलना में ज्यादा गर्मी सोखते हैं। इस वजह से वातावरण में कम सौर विकिरण होता है, बर्फ तेजी से गर्म होती है और पिघलने लगती है।

पढें राष्ट्रीय (National News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.