ताज़ा खबर
 

NRC में जगह पाने के लिए मुस्लिमों से ज्यादा हिंदुओं ने लगाए फर्जी दस्तावेज: रिपोर्ट

National Register of Citizens (NRC) को जारी करने में अब महज 5 दिन ही बचे हैं। इस बीच, राज्य की सत्ताधारी बीजेपी इन अटकलों को लेकर बेचैन है कि आखिरी सूची से बहुत सारे हिंदू जो मुख्यत: बंगाली, नेपाली या हिंदीभाषी हैं, वे बाहर हो जाएंगे।

Author नई दिल्ली | Published on: August 26, 2019 8:40 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स रॉयटर्स फाइल फोटो)

असम में विवादास्पद National Register of Citizens (NRC) की डेडलाइन बेहद नजदीक है। न्यूज एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों ने हवाले से रविवार को बताया कि एनआरसी में नाम दर्ज करवाने के लिए मुसलमानों से अधिक हिंदुओं ने फर्जी दस्तावेज जमा कराए हैं। बता दें कि असम के प्रमाणित नागरिकों की पहचान करने वाली NRC की अंतिम सूची 31 अगस्त को प्रकाशित होगी।

सूत्रों के मुताबिक, ‘‘यह रोचक तथ्य है कि संदिग्ध हिंदू आवेदकों की ओर से बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया। उनकी ओर से जमा 50 फीसदी से अधिक दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया गया। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है क्योंकि छवि यह है कि संदिग्ध मुसलमान अप्रवासी ही एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए गलत हथकंडों में शामिल हैं। हालांकि, कई संदिग्ध हिंदुओं की पहचान की गई है और अनुमान लगाया जा सकता है कि बड़ी संख्या में ऐसे अप्रवासी असम में मौजूद हैं।’’

हाल में असम की भाजपा सरकार ने दावा किया था कि एनआरसी के ड्राफ्ट से मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं के नाम बाहर किए गए है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की गोपनीयता बरतने के निर्देश को नजरअंदाज करते हुए विधानसभा में हटाए गए नामों की जिलेवार सूची पेश की थी। कोर्ट ने ऐसी सूचनाओं को सील बंद लिफाफे में जमा करने को कहा है।

National Register of Citizens (NRC) को जारी करने में अब महज 5 दिन ही बचे हैं। इस बीच, राज्य की सत्ताधारी बीजेपी इन अटकलों को लेकर बेचैन है कि आखिरी सूची से बहुत सारे हिंदू जो मुख्यत: बंगाली, नेपाली या हिंदीभाषी हैं, वे बाहर हो जाएंगे। वहीं, बड़ी तादाद में अवैध प्रवासियों’ को लिस्ट में जगह मिल जाएगी।

और तो और, बीजेपी नेता अब सार्वजनिक तौर पर खुलकर इसके खिलाफ बोल रहे हैं। वहीं, दक्षिणपंथी संगठन मसलन एबीवीपी और हिंदू जागरण मंच ने असम में कई जगह प्रदर्शन भी किया है। द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत करते हुए असम के मंत्री और सरकार के प्रवक्ता चंद्र मोहन पटवारी ने कहा कि फाइनल ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद उन्हें इस बात का आभास हुआ कि कार्बी अंगलोंग और धेमाजी जैसे जिलों में कुछ सही नागरिक भी सूची से बाहर हो गए। वहीं, कुछ ऐसे जिले जहां पार्टी को लगता था कि बहुत ज्यादा लोग सूची से बाहर हो जाएंगे, वहां ऐसा नहीं हुआ।

उधर, राज्य सरकार ने दावा किया कि आंकड़े जाहिर करते हैं कि भारत-बांग्लादेश सीमा से लगते जिलों के मुकाबले मूल निवासी बहुल जिलों में अधिक लोगों के नाम एनआरसी से बाहर किए गए हैं। ऐसे में एनआरसी में खामी है क्योंकि सीमावर्ती जिलों में अधिक मुस्लिम अप्रवासी होने की आशंका अधिक है। वहीं, आरएसएस असम क्षेत्र के वरिष्ठ पदाधिकारी और बौद्धिक प्रचार प्रमुख शंकर दास ने कहा कि एनआरसी में खामियां हैं और इसे चुनौती दी जाएगी।

दास ने कहा, ‘‘कोई भी सही आंकड़ा नहीं दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट केवल प्रतीक हजेला (एनआरसी स्टेट कॉर्डिनेटर) की सूचना के आधार पर कार्रवाई कर रही है। इसलिए अभी तक हम किसी लीक आंकड़े पर भरोसा नहीं करते फिर चाहे यह हिंदुओं के बारे में हो या मुसलमानों के बारे में। हम जानते हैं कि यह एनआरसी गलत होगा और इसे चुनौती दी जाएगी।’’उन्होंने कहा,‘‘ ऐसे कई जगह हैं जहां प्रशासन ने कहा कि सुरक्षा के बावजूद वे वहां नहीं जाएंगे। ऐसे में एनआरसी का सत्यापन कैसे होगा? हजेला इस बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे रहे। ऐसे में कैसे कह सकते हैं हिंदुओं ने अधिक फर्जीवाड़ा किया? हम इसपर भरोसा नहीं करते।’’

एनआरसी के अपडेशन की प्रक्रिया में शामिल सूत्रों ने बताया कि निखिल दास का मामला इसका उदाहरण है, जिन्होंने पिता नितई दास, मां बाली दास, भाई निकिंद्र दास और बहन अंकी दास को एनआरसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया, लेकिन दस्तावेजों की जांच के दौरान पता चला कि उसके अलावा परिवार के सभी सदस्य बांग्लादेश के सुमानगंज जिले के कछुआ गांव में रहते हैं। पूछताछ में निखिल ने स्वीकार किया कि अक्टूबर 2011 में अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ था और यह इकलौता मामला नहीं है। रोचक बात है कि निखिल के पास मतदाता पहचान पत्र, भारत का जन्म प्रमाण पत्र और यहां तक कि पैन कार्ड भी था।

बता दें कि 24 मार्च 1971 से पहले बांग्लादेश से भारत आए अप्रवासी कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा कर सकते हैं। असम में दशकों से बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश से अवैध तरीके से आ रहे हैं। इसलिए 1985 में हुए असम समझौते की एक शर्त अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें बाहर निकालने की है।

(भाषा इनपुट्स)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में वीवीआईपी के जमावड़े के बीच जेबकतरे भी पहुंचे!
2 शरद पवार की बेटी पर महाराष्ट्र पुलिस ने लगाया जुर्माना, कई NCP नेताओं पर भी हुआ ऐक्शन
3 ‘बीजेपी नेताओं को देख खून खौलता है, जी करता है सिर कलम कर दूं’, कभी एनडीए सहयोगी रहे राजभर की धमकी