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संसद से सड़क तक दिखी विपक्षी एकता की ताकत

मोदी सरकार के खिलाफ पहली बार विपक्ष की एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में मंगलवार को 14 राजनीतिक दलों के नेताओं ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधनों के खिलाफ संसद से राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला और ‘करो या मरो’ की लड़ाई जारी रखने का एलान किया। पूर्व प्रधानमंत्रियों मनमोहन […]

मोदी सरकार के खिलाफ पहली बार विपक्ष की एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में मंगलवार को 14 राजनीतिक दलों के नेताओं ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधनों के खिलाफ संसद से राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला और ‘करो या मरो’ की लड़ाई जारी रखने का एलान किया।

पूर्व प्रधानमंत्रियों मनमोहन सिंह और एचडी देवगौड़ा समेत 26 नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की और उनसे अनुरोध किया कि मोदी सरकार पर राज्यसभा में संशोधनों पर आगे नहीं बढ़ने का दबाव बनाकर किसानों के हितों का संरक्षण करें। उन्होंने कहा कि इन प्रावधानों का मकसद सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना है।

पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार विपक्षी दल इतनी बड़ी संख्या में भाजपा नीत सरकार के खिलाफ एक साथ सामने आए हैं।

प्रतिनिधिमंडल की राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद सोनिया ने कहा-हम भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम 2013 में पारदर्शिता और उचित मुआवजे के अधिकार संबंधी नरेंद्र मोदी सरकार के संशोधनों का विरोध करने के लिए साथ आए हैं।

सभी प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और भविष्योन्मुखी ताकतें विभाजन और सामाजिक विसंगति को बढ़ावा देने के मोदी सरकार के सोच को परास्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम राष्ट्रपति से अनुरोध करने आए हैं कि हमारे किसानों के हितों का संरक्षण करने के लिए हस्तक्षेप करें और मोदी सरकार पर राज्यसभा में संशोधनों पर आगे नहीं बढ़ने के लिए दबाव बनाएं। ये कुछ वजहें हैं जिनके लिए हम यहां आए हैं।

मार्च के समन्वयक जद (एकी) नेता शरद यादव ने घोषणा की कि विधेयक न केवल किसान विरोधी है बल्कि भारत विरोधी भी है। इससे पहले जद (एकी), सपा, तृणमूल कांग्रेस, भाकपा और माकपा, राकांपा, आप और इनेलो समेत कई प्रमुख राजनीतिक दलों के 100 से अधिक सांसदों और नेताओं ने कड़ी सुरक्षा के बीच रायसिना हिल पर राष्ट्रपति भवन तक करीब एक किलोमीटर का मार्च निकाला।

पहले दिल्ली पुलिस ने क्षेत्र में नियामक आदेश लागू होने का हवाला देते हुए मार्च का विरोध किया लेकिन बाद में जब नेताओं ने मार्च निकालने पर जोर दिया तो पुलिस ने नरमी बरती। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल भूमि अधिग्रहण विधेयक को किसान विरोधी और कारपोरेट समर्थक बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं।

राष्ट्रपति से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे, सपा के रामगोपाल यादव, माकपा के सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा, तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन, द्रमुक से कनिमोड़ी, इनेलो के दुष्यंत चौटाला, राकांपा के प्रफुल्ल पटेल, आप के धर्मवीर गांधी, आइयूएमएल के ई अहमद, केरल कांग्रेस-एम के जॉय अब्राहम और राजद के जयप्रकाश यादव आदि शामिल थे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार विरोधी नारे लगाए और कहा कि जब तक मोदी सरकार विधेयक में बदलाव नहीं करती, उनका विरोध जारी रहेगा।

ज्ञापन में कहा गया कि अध्यादेश में संशोधनों को लोकसभा ने मंजूरी दे दी है क्योंकि वहां भाजपा बहुमत में है। इन्हें अब राज्यसभा की मंजूरी का इंतजार है लेकिन पहले संशोधनों पर स्थाई समिति द्वारा विचार किया जाना चाहिए। नेताओं ने कहा, यह नहीं हुआ क्योंकि मोदी सरकार स्थाई समितियों और प्रवर समितियों की संस्थाओं को ही ध्वस्त करने का इरादा रखती है।

ज्ञापन में कहा गया है-निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण के मामले में 80 फीसद किसानों की सहमति और पीपीपी परियोजनाओं के लिए 70 फीसद की सहमति की जरूरत को हटाने के लिए संशोधन लाया गया है।

यह जबरन अधिग्रहण के दरवाजे खोलता है जैसा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 में अनुमति थी, जिसकी जगह 2013 का कानून लाया गया था। हमारी राय है कि संशोधन किसान विरोधी हैं और सभी लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध हैं।

जिस तरीके से इन संशोधनों को लाने का प्रयास किया गया है उससे मोदी सरकार की अधिकारवादी सोच का पता चलता है। ये संशोधन मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों का महज एक उदाहरण हैं। इसी तरह का एक बड़ा उदाहरण है धान और गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए आबंटन में भारी कटौती।

नेताओं ने कहा कि उन्हें लगता है कि मोदी सरकार ने किसानों की जमीन छीनकर उनकी कीमत पर कारपोरेट के फायदे के लिए सार्वजनिक नीति को अनुचित तरीके से बदलने के लिए सोची-समझी कार्रवाई की है। दिल्ली पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के सुरक्षाकर्मियों को बड़ी संख्या में इलाके में तैनात किया गया था।

संसद से राष्ट्रपति भवन के मार्ग पर बैरिकेड भी लगाए गए थे। लोकसभा पिछले हफ्ते भूमि अधिग्रहण विधेयक को मंजूरी दे चुकी है और उसकी असली परीक्षा अब राज्यसभा में है जहां सत्तारूढ़ गठबंधन अल्पमत में है।

 

 

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