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वक़्त की नब्ज़ : तानों की परवाह क्यों

ऐसा लगने लगा है कि गांधी परिवार के ताने कुछ ज्यादा ही सताने लग गए हैं प्रधानमंत्री को। ऐसा न होता तो कभी सोनिया गांधी की बेमतलब ‘हवाबाजी’ वाली बात का वे जवाब न देते..

नई दिल्ली | Updated: September 13, 2015 3:48 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

ऐसा लगने लगा है कि गांधी परिवार के ताने कुछ ज्यादा ही सताने लग गए हैं प्रधानमंत्री को। ऐसा न होता तो कभी सोनिया गांधी की बेमतलब ‘हवाबाजी’ वाली बात का वे जवाब न देते। इतना बेमतलब था यह ताना कि हम आपस में बैठ कर सोच ही रहे थे कि हवाबाजी होती क्या है कि प्रधानमंत्री ने ‘हवालाबाजी’ में जवाब दे डाला। सोनियाजी नरेंद्र मोदी को बदनाम करती आई हैं 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के समय से। क्या याद नहीं हैं प्रधानमंत्री को उनके वे भाषण, जिनमें उन्होंने कहा था कि मोदी झूठे वादे कर रहे हैं जनता को गुमराह करने के लिए? क्या याद नहीं उनको सोनियाजी का यह भी कहना कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो ‘भारत को भगवान बचाए।’

बीते वर्ष में कांग्रेस अध्यक्ष ने एक भी बार मोदी सरकार के किसी कार्यक्रम की तारीफ नहीं की है। उल्टा जब उनके किसी समर्थक ने गलती से स्वच्छ भारत की तारीफ करने की हिम्मत की, तो उनको सरेआम डांट पड़ी है। न ही सोनियाजी ने जाहिर किया है अपने किसी वक्तव्य में कि और कुछ हुआ हो या न हो, इतना तो हुआ है मोदी सरकार के पहले वर्ष में कि आशा की एक छोटी-सी किरण जगी है, जहां पहले था निराशा का अंधेरा। अगर प्रधानमंत्री अब भी सोचते हैं कि सोनियाजी का बर्ताव कभी बदल जाएगा, तो गलत सोच रहे हैं। उनको अगर अपना शासनकाल सफल बनाना है, तो गांधी परिवार के तानों को अनसुना करना होगा। फिलहाल तो लगता है कि उनको राहुल गांधी के ताने भी तकलीफ दे रहे हैं। ‘सूट-बूट की सरकार’ क्या कह दिया कि प्रधानमंत्री जैसे घबरा से गए, इतना कि भारतीय उद्योगपतियों से पहली बार मिले, तो पिछले हफ्ते।

पहले मिलने की तकलीफ की होती तो जान गए होते कि क्यों अभी तक इस देश के अपने धनवान निवेश नहीं कर रहे हैं भारत की प्रगति में। विदेशी निवेशक चाहे जितने भी आ जाएं, भारत का निर्माण तो हमारे अपने ही कर पाएंगे। लेकिन अभी तक उन्होंने निवेश करना शुरू नहीं किया है, क्योंकि बिजनेस के लिए माहौल अभी वैसा ही है जैसा था मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी के राज में। आज भी मौजूद हैं वही गलत किस्म के टैक्स कानून, आज भी मौजूद हैं वही गलत किस्म के टैक्स अधिकारी और आज भी कारोबार शुरू करने से पहले लेनी होती है ढेर सारी इजाजतें।

प्रधानमंत्री ने जब देसी उद्योगपतियों से कहा था पिछले हफ्ते वाली मुलाकात के दौरान कि चीन की अर्थव्यवस्था में जो वर्तमान संकट है, उसका फायदा भारत उठा सकता है, तो शायद भूल गए थे कि चीन और भारत में अंतर कितना है। हमारा हाल यह है कि एक भी मजदूर को हटाने के लिए सरकार से इजाजत लेनी होती है, अगर आपके कारखाने में पचास से ज्यादा मजदूर काम करते हों। नतीजा यह कि भारत के तकरीबन नब्बे फीसद मजदूर छोटे-मोटे कारखानों में नौकरी करते हैं या फिर बड़े कारखानों में ऐसी नौकरियों पर लगे हुए हैं, जो पक्की नहीं हो सकती हैं।

कैसे शुरू होगा ‘मेक इन इंडिया’, जब बड़े कारखाने ही लगाना इतना मुश्किल हो? चीन के कारखानों में हजारों की तादाद में मजदूर काम करते हैं, इसलिए निर्यात करता है चीन आइफोन और बड़ी-बड़ी गाड़ियों से लेकर रेडीमेड कपड़े और खिलौने। अमेरिका के खिलौनों की दुकानों में तकरीबन सारे खिलौने चीन के बने हुए होते हैं। और हम हैं कि बड़े कारोबारियों पर प्रतिबंध लगाए बैठे हैं दशकों से। नतीजा यह कि भारतीय खिलौने इतने घटिया हैं कि आजकल हमारे बच्चे भी खेलते हैं चीन के बने खिलौनों से।

साफ जाहिर है कि भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्याएं आर्थिक हैं। कुछ गलत नियम-नीतियों के कारण जो हमको विरासत में मिली हैं लाइसेंस राज के जमाने से और कुछ सरकारी अधिकारियों की जहनियत के कारण जिसकी जड़ें पहुंची हैं नेहरूवादी समाजवाद के जमाने तक। इस मानसिकता के तहत सरकारी अधिकारियों की सोच बिजनेस के खिलाफ है। इस मानसिकता का सबसे बड़ा नुकसान होता है छोटे दुकानदारों, छोटे कारोबारियों को, जिनके पास गुंजाइश नहीं होती है सरकारी अफसरों को रिश्वत देने की। प्रधानमंत्री अगर अपना मेक इन इंडिया वाला सपना साकार करना चाहते हैं, तो उनको इस मानसिकता को बदलने की कोशिश करनी होगी।

इसके बाद कोशिश यह भी करनी होगी कि देश की टूटी पुरानी सड़कें, यातायात के साधन और बेहाल बंदरगाह आधुनिक बनाए जाएं। इसका लाभ सिर्फ बिजनेस करने वालों को नहीं होगा, हमारे किसानों को भी होगा, जिनकी सब्जियां और फल खेतों में ही सड़ जाते हैं, क्योंकि उनके गांव तक आधुनिक सड़कें नहीं पहुंचती हैं, और कोल्ड स्टोरेज इतने कम हैं अपने देश में कि न होने के बराबर। ये चीजें होतीं तो संभव है कि हमारे किसान भी बिजनेस करके अमीर हो जाते। अगर ऐसा अब तक नहीं हुआ है तो इसलिए कि कांग्रेस पार्टी की सोच वामपंथी है, सो बाजार, बिजनेस और मुनाफे के खिलाफ। इस सोच के मुताबिक गरीबों के लिए सिर्फ इतना किया जा सकता है कि उनको मनरेगा किस्म की योजनाओं द्वारा राहत पहुंचाई जा सकती है।

मोदी की सोच ऐसी नहीं है। प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने कई बार कहा कि गरीबी हटाओ से आगे निकलना चाहिए भारत को और संपन्नता, समृद्धि के सपने देखने चाहिए। समस्या यह है कि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद उनसे ऐसी बातें बहुत कम सुनने को मिली हैं। माना कि विरासत में उनको ऐसी अर्थव्यवस्था मिली थी जिस पर मंदी की मोटी चादर बिछी हुई थी, लेकिन अब विरासत की बातें करना बेकार हो गया है। अब हम जानना चाहते हैं कि पिछले सालों में क्यों नहीं हम तेज गति से बढ़ पाए हैं परिवर्तन और विकास की ओर। चिंता करनी है प्रधानमंत्री को तो इसकी कीजिए बेकार तानों की नहीं।

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