पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में ओवैसी की पार्टी के बेहतर प्रदर्शन ने कांग्रेस के कुछ मुस्लिम नेताओं में बैचेनी पैदा कर दी है। इन नेताओं ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर संयमित चुप्पी साधने का आरोप लगाया है। पिछले हफ्ते एक पूर्व और दो कांग्रेसी नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया। इसके लिए मणिकम टैगोर ने उन्हें जयचंद बताया।

कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने आपस में चिंता जाहिर की है कि अगर कांग्रेस मुस्लिम समुदाय द्वारा सामना किए जा रहे मुद्दों को नहीं उठाती है, तो संभावना है कि पार्टी एआईएमआईएम को अपनी जगह दे देगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद पिछले हफ्ते लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को असुरक्षित और डरा हुआ बताते हुए विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने मुस्लिम नेताओं की उपेक्षा की है।

मुस्लिम मुद्दों पर बोलने से डरना नहीं चाहिए- शकील अहमद

बिहार से ताल्लुक रखने वाले अहमद ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि हालांकि वे ओवैसी की राजनीति से सहमत नहीं हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अपनी पार्टी की झिझक को स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा, “हालांकि मुझे लगता है कि ओवैसी मुस्लिम प्रतिनिधित्व के मामले में मददगार नहीं हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय में उनकी राजनीति के समर्थक भी हैं। मैंने हमेशा यही कहा है कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष रुख अपनाना चाहिए और मुस्लिम मुद्दों पर बोलने से डरना नहीं चाहिए। कुछ नेताओं ने कांग्रेस हाई कमान को यह विश्वास दिला दिया है कि मुस्लिम मुद्दों पर बोलने से हिंदू समुदाय के वोट हासिल करने की पार्टी की संभावना कम हो जाएगी।”

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पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीमाचल क्षेत्र में एनडीए ने 24 में से 14 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी को सात, नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड को पांच और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को दो सीटें मिलीं। विपक्षी महागठबंधन को सिर्फ पांच सीटें मिलीं। इसमें कांग्रेस को चार और राष्ट्रीय जनता दल को एक सीट शामिल है। एआईएमआईएम ने सीमाचल में पांच सीटें जीतीं, जो 2020 के चुनावों में उसकी सीटों के बराबर थीं।

चुनाव परिणामों के बाद से बिहार कांग्रेस नेतृत्व ने अंदरूनी तौर पर चर्चा की और हाई कमान को यह चिंता जताई है कि पार्टी के शीर्ष नेता मुस्लिम समुदाय के मुद्दों से मुंह मोड़ रहे हैं। चुनाव से पहले सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने गठबंधन की एक बैठक में कहा था कि महागठबंधन को शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य को जमानत न मिलने जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए, लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया।

मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एआईसीसी के एक नेता ने कहा, “अगर आप राहुल गांधी के भाषण सुनेंगे, तो आपको पता चलेगा कि वे अपने भाषणों में कभी मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल नहीं करते। वहीं, वे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के बारे में बात करते रहते हैं।” पिछले मंगलवार को महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हुसैन दलवाई ने एआईएमआईएम को बीजेपी की बी टीम करार दिया और नगर निगम चुनावों में उसकी सफलता का कारण कांग्रेस का मुसलमानों के साथ मजबूती से खड़े न होना बताया।

पार्टी मुसलमानों की अनदेखी कर रही- दलवाई

राज्यसभा के पूर्व सांसद दलवाई ने कहा, “यह कांग्रेस की गलती है। पार्टी मुसलमानों की अनदेखी कर रही है और इसीलिए मुसलमान भी कांग्रेस को नजरअंदाज कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि मुंबई में एआईएमआईएम द्वारा जीती गई आठ सीटें कांग्रेस को मिल सकती थीं, जिसे 227 सदस्यीय बीएमसी में केवल 24 सीटें ही मिलीं।

कांग्रेसी नेताओं के पार्टी छोड़ने पर अल्वी ने जताई चिंता

राज्यसभा के पूर्व सांसद राशिद अल्वी ने कई मुस्लिम कांग्रेसी नेताओं के पार्टी छोड़ने पर चिंता जताई और कहा कि अगर उनकी अनदेखी जारी रही तो ओवैसी जैसे नेता और मजबूत होते चले जाएंगे। अल्वी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “मुस्लिम नेता सत्ता के भूखे नहीं हैं। बीजेपी में भी उनके लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए वे वहां नहीं जा सकते। तो फिर वे कांग्रेस क्यों छोड़ रहे हैं? इसका कारण यह है कि पार्टी में मुस्लिम नेताओं के लिए जगह कम होती जा रही है। जहां तक ​​राहुल गांधी की बात है, वे देश के इकलौते नेता हैं जिनकी जन अपील है और वे बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।”

गुलाम नबी जैसे नेता पार्टी छोड़कर क्यों चले गए- अल्वी

अल्वी ने कहा कि कांग्रेस मुस्लिम समुदाय से शीर्ष और दूसरे दर्जे का नेतृत्व तैयार करने में विफल रही है। उन्होंने कहा, “एक समय था जब कांग्रेस में मुस्लिम समुदाय के कई शीर्ष नेता हुआ करते थे। गुलाम नबी आजाद और नसीमउद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता पार्टी छोड़कर क्यों चले गए? मुझे लगता है कि इसका कारण यह है कि कांग्रेस उन्हें जगह देने में विफल रही।”

मुस्लिम समुदाय के एक अन्य एआईसीसी नेता का कहना है कि पार्टी ने मुस्लिम समुदाय को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाए जाने जैसे गंभीर मुद्दों को उठाना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा, “अगर आप हाल के कुछ घटनाक्रमों को देखें, तो आपको यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगी। अगर नोएडा में कोई हिंदू डूब जाता है या वाराणसी में मंदिर तोड़ दिए जाते हैं, तो पूरा कांग्रेस तंत्र एक स्वर में बोलता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, या किसी समूह को निजी संपत्ति पर सामूहिक नमाज अदा करने जैसे मामूली अपराध के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, या दिल्ली में कोई मस्जिद तोड़ दी जाती है, तो कांग्रेस हाई कमान चुप रहती है। मुस्लिम समुदाय इसे देखता है और फिर ओवैसी को संवैधानिक अधिकारों की बात करते हुए देखता है। समुदाय को लगता है कि कांग्रेस वैसे भी केंद्र और अधिकांश राज्यों में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है, तो समुदाय को आंख बंद करके उन्हें वोट क्यों देना चाहिए।”

जहां अल्वी, अहमद, दलवाई और अन्य जैसे नेता पार्टी की आलोचना करते हैं, वहीं पार्टी के भीतर कुछ ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों के लिए काफी काम करती है और पार्टी की आलोचना करने वाले नेता स्वार्थों के कारण बोल रहे हैं। महाराष्ट्र के एक मुस्लिम कांग्रेसी नेता ने कहा, “पार्टी को मुस्लिम पार्टी के रूप में पहचाने जाने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए, जैसा कि बीजेपी करती आ रही है। पार्टी की चुप्पी सोची-समझी रणनीति है और इससे मुस्लिम समुदाय को लंबे समय में लाभ होगा। मुस्लिम समुदाय अकेले किसी भी पार्टी की जीत सुनिश्चित नहीं कर सकता। फिर कांग्रेस मुस्लिम समुदाय पर ध्यान केंद्रित करके हिंदू समुदाय को कैसे नाराज कर सकती है।”

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