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पाकिस्तान : यूं ही नहीं है चीन से नजदीकी, अमेरिका से दूरी

चीन को पाकिस्तान के रूप में सामरिक-रणनीतिक महत्व का सहयोगी मिल गया। चीन अब पाकिस्तान के ग्वादर में अलग शहर ही बसाने जा रहा है। इस शहर में पांच लाख लोग रहेंगे। सभी चीनी नागरिक होंगे।

Author March 5, 2019 4:35 AM
Pulwama Terror Attack: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Source: REUTERS/Jim Young)

पाकिस्तान और चीन की बढ़ती नजदीकियां अमेरिका को नागवार गुजर रही हैं। एक समय था, जब पाकिस्तान-अमेरिका के संबंध बेहद दोस्ताना थे और अमेरिका से पाकिस्तान को अच्छी-खासी आर्थिक मदद मिला करती थी। अब हालात बदल चुके हैं। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरिका ने पाकिस्तान को मदद देना कम करने के बाद अब पूरी तरह से बंद कर दिया है। पेंटागन के मुताबिक, अमेरिका ने पाकिस्तान को मिलने वाली 1.66 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता राशि पर रोक लगा दी है।

अमेरिका के प्रभाव में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) से भी पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर झटका लगने की खबरें हैं। आइएमएफ ने पाकिस्तान को राहत पैकेज देने के लिए शर्तें कड़ी कर दी हैं। दरअसल, हाल ही में चीन से लौटे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने वहां से बड़ी आर्थिक मदद मिलने का दावा किया, जिसके बाद आइएमएफ ने इस राशि की जानकारी मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान और चीन दोनों ने इसका खुलासा करने से मना कर दिया था।
हाल के दिनों में अमेरिकी प्रशासन, खासकर राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने में दुनिया की मदद नहीं कर रहा। अब अमेरिका पीछे हट रहा है और यहां तक कि एफ-16 लड़ाकू विमानों के निर्यात की समीक्षा तक कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी दोस्ती छोड़ कड़े तेवर दिखाते हुए कह दिया कि अमेरिका के लिए पाकिस्तान जितना बलिदान करने वाला कोई सहयोगी नहीं हो सकता।

ऐसे में चीन को पाकिस्तान के रूप में सामरिक-रणनीतिक महत्व का सहयोगी मिल गया। चीन अब पाकिस्तान के ग्वादर में अलग शहर ही बसाने जा रहा है। इस शहर में पांच लाख लोग रहेंगे। सभी चीनी नागरिक होंगे। करीब 15 करोड़ डॉलर की लागत से यह शहर बनाए जाने की खबरें हैं। दोनों देश इसीलिए संयुक्त रूप से जेएफ-17 थंडर नाम का हल्का लड़ाकू विमान बना रहे हैं जबकि चीन के नए पांचवीं पीढ़ी वाले स्टील्थ फाइटर के निर्यात संस्करण पर बातचीत जारी है। पिछले साल अगस्त में दोनों देशों ने सबसे बड़ा सैन्य समझौता पूरा किया-पांच अरब डॉलर में आठ हमलावर पनडुब्बियों की पाकिस्तान को बिक्री का, जिन्हें अरब सागर में तैनात किया जाएगा।

चीन की महत्त्वाकांक्षी परियोजना सीपीईसी का भी एक स्पष्ट सैन्य आयाम है। चीन के कई अधिकारी निजी रूप से पाकिस्तानी सेना को सीपीईसी का काम आगे बढ़ाने के लिहाज से ज्यादा अनुकूल मानते हैं। सीपीईसी की एक अन्य अहम परियोजना पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में संरचना की तरक्की करना है, जिसकी शुरुआत काराकोरम हाइवे से होगी। भारत और पाकिस्तान के बीच किसी टकराव की सूरत में इस लिंक से चीन काफी तेजी से सहयोग और सामग्री पाकिस्तान को भेज सकेगा। इस परियोजना के बदले में पाकिस्तान के लिए चीन एक स्थिर पश्चिमी परिधि बनाएगा। साथ ही चीन की पहुंच अरब सागर तक बनेगी, जिसके चलते मलक्का जलडमरूमध्य से उसकी जान छूटेगी। अरसे से चीन को यह डर सताता रहा है कि कोई प्रतिद्वंद्वी ताकत मलक्का के संकरे मार्ग को बाधित करके चीन की अर्थव्यवस्था को कहीं बंधक न बना ले।

रूस ने 2014 में पाकिस्तान को हथियारों की बिक्री पर लगी रोक हटा दी थी। पिछले साल उसने पाकिस्तान को चार एमआइ-35 हेलिकॉप्टर गनशिप की बिक्री की। रूस में राजदूत रहे अजय मल्होत्रा कहते हैं, ‘रूस को पाक संग अपने रक्षा संबंध से पीछे हटना चाहिए, क्योंकि यह देश आतंक को बढ़ावा देने, वित्तपोषित करने, प्रायोजित करने और निर्यात करने में लगा हुआ है।’  पाकिस्तान को हथियार देने के मामले में हमारी संवेदनशीलता को लेकर रूस हमेशा से सावधान रहा है और हमें राष्ट्रपति पुतिन के समक्ष अपनी चिंताएं रखनी होंगी।’ चीन में भारत के पूर्व राजदूत तथा फिलहाल विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में प्रतिष्ठित फेलो अशोक कंठ कहते हैं कि चीन का कूटनीतिक संरक्षण पाकिस्तान को ज्यादा गैर-जिम्मेदार रवैया अपनाने को प्रोत्साहित कर रहा है, जिसमें हमारे सीधे मतलब के मुद्दे हैं जैसे आतंकवाद।

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