गठजोड़ में भी महाराष्ट्र पर कब्जे की होड़

अनुराग चतुर्वेदी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा के लिए होने वाले 15 अक्तूबर के चुनाव के वास्ते सीटों के बंटवारे के सवाल पर सुलह की औपचारिक घोषणा के बाद भी भाजपा और शिवसेना की प्रतिस्पर्धा खत्म होती नजर नहीं आ रही। भाजपा का एकसूत्री एजंडा है शिवसेना की लड़ी जाने वाली सीटों […]

अनुराग चतुर्वेदी

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा के लिए होने वाले 15 अक्तूबर के चुनाव के वास्ते सीटों के बंटवारे के सवाल पर सुलह की औपचारिक घोषणा के बाद भी भाजपा और शिवसेना की प्रतिस्पर्धा खत्म होती नजर नहीं आ रही। भाजपा का एकसूत्री एजंडा है शिवसेना की लड़ी जाने वाली सीटों के नजदीक पहुंचना जिससे चुनाव के बाद आने वाले नतीजों में वह अव्वल नंबर पर आ जाए।

उधर, शिवसेना को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी साफ दिखाई दे रही है और वह 151 सीटों पर चुनाव लड़ने के दावे पर अड़ी हुई है। भाजपा-शिवसेना के आपसी विवाद और महाराष्ट्र पर कब्जा करने के अभियान का खमियाजा चार छोटे दलों को उठाना पड़ रहा है जिनकी सीटें 18 से घटकर 12 पर आ सकती हैं। और वे अपना विरोध जताने उद्धव ठाकरे के घर तक पहुंच गए हैं।

शरद पवार के प्रभावक्षेत्र महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकरी संघठना की ताकत बढ़ी है। बारामती तक में शरद पवार को चुनौती मिल रही है। हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में 58 विधानसभा क्षेत्रों में से 43 पर भाजपा-शिवसेना और शेतकरी संघठना जैसे छोटे और सीमित क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले दल 14 सीटों पर विजयी रहे जबकि भाजपा और सेना को क्रमश: 17 और 12 सीटें मिली थीं। सालों तक प्रगतिशील मोर्चा के साथ रहने वाली रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया की भी किसी क्षेत्र विशेष में ताकत नहीं है। लेकिन शिवशक्ति और भीमशक्ति का संदेश प्रदान करने और शिवसेना को दलितों में प्रतिष्ठित करने में इसकी भूमिका है। जिस तरह से राजनीतिक अवसरवादिता दिखाकर बिहार में रामविलास पासवान ने भारतीय जनता पार्टी को दलित समाज में प्रवेश दिलवाया, उसी तरह रामदास अठावले ने शिवसेना को दलित विरोधी और मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के नामांतर के सवाल पर शिवसेना द्वारा विरोध करने को राजनीतिक स्मृति से धोने की कोशिश की। शिवसेना-भाजपा गठबंधन ने रामदास अठावले को महाराष्ट्र से राज्यसभा में भेजकर न केवल रामदास अठावले की शर्त पूरी की, बल्कि प्रकाश जावड़ेकर की सीट उन्हें दी।

रामदास अठावले की राजनीतिक शक्ति और दलित समाज पर असर अब ढलान पर है। शुरू में रामदास अठावले 80 सीटों की मांग कर रहे थे। बाद में वे दस सीटों की मांग करने लगे थे। लेकिन अब उन्हें एक या दो सीटें मिल पाएंगी। कुख्यात तस्कर छोटा राजन का भाई अठावले पार्टी का उपाध्यक्ष है और उसने चेम्बूर से अपना नामांकन भी भर दिया है। राखी सावंत भी इसी पार्टी से जुड़ गई हैं। अठावले बाकी छोटे दलों के साथ भी नहीं हैं। वे खुद के लिए ही सत्ता प्राप्त करने में लगे हैं।

राष्ट्रीय समाज पार्टी ने 14 सीटों की मांग की थी और शिव संग्राम पार्टी ने 12 सीटों की मांग की थी। लेकिन लगता है कि या तो इनके उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी या शिवसेना में चले जाएंगे या इन दलों के सिर्फ नेता ही बचे रहेंगे जो चुनाव लड़ेंगे।

भाजपा, इस बीच शिवसेना से उन सीटों की मांग भी कर रही है जो सेना ने अभी तक कभी नहीं जीती हैं। भाजपा ने रणनीति के तहत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के ताकतवर मराठा नेताओं का दलबदल करवाकर पार्टी में शामिल कर लिया है। इनमें उत्तर महाराष्ट्र के जनता दल के रास्ते राकांपा में गए पार्टी नेता बब्बन राव पाचपुते और विजय कुमार गावित शामिल हैं। इसी तरह सांगली (पश्चिम महाराष्ट्र) में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटील के खिलाफ राष्ट्रवादी पार्टी के ही नेता का दलबदल करवा भाजपा उन्हें चुनौती दे रही है।

मुंबई में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के एकदम सिकुड़ जाने और घाटकोपर में राम कदम के दलबदल कर भाजपा में जाने और शिशिर शिंदे के खिलाफ बगावत होने से राज ठाकरे की पार्टी संकट में है। यह बात अलग है कि ओबामा की तर्ज ‘हो, हे शकम आहे’ (हां, यह संभव है), राज ठाकरे ने पोस्टर पर यह भी लिखा है कि ‘ऐसे महाराष्ट्र का निर्माण हो, जिससे दुनिया ईर्ष्या करे।’ राज ठाकरे महाराष्ट्र के विकास, महिला सशक्तीकरण, उद्योग की बहुतायत और सिंचाई, खेती को अपना चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं, पर मराठी मानुस उनसे दूर हो रहा है। और जैसे-जैसे उद्धव ठाकरे की राजनीतिक हैसियत बढ़ रही है वैसे-वैसे राज ठाकरे कमजोर होते जा रहे हैं। मुंबई और नाशिक में उनके कम होते हुए प्रभाव को आंका जा सकता है।

भाजपा का नारा है, ‘चलो, चलें मोदी के साथ’। मोदी लहर कमजोर हो रही है, पर मोदी के सहारे ही भाजपा अपना दांव खेलना चाहती है। भाजपा-शिवसेना के सीट विवाद के दौरान शिवसेना ने भाजपा को गुजराती भाषियों की पार्टी बताने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। भाजपा के गुजराती नेतृत्व अमित शाह पर निशाना साधा गया और उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गोधरा कांड और बाल ठाकरे के समर्थन की याद दिलाई। भगवा झगड़े में मोदी कोण भी दिखाई देता है और उद्धव ठाकरे, इस बात से नाराज हैं कि नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में शिवसेना को पर्याप्त स्थान नहीं दिया और मंत्रिमंडल में कायदे का विभाग भी नहीं दिया। नरेंद्र मोदी के मुंबई की सभाओं में बाल ठाकरे के नाम न लेने और पुराने समीकरणों को तोड़ने की बात भी कही जा रही है।

शिवसेना-भाजपा एक दूसरे के साथ एक बार फिर आ गई हैं। लेकिन दोनों में अभी भी प्रतिस्पर्धा जारी है और दोनों की कोशिश है कि वे अपनी प्रतिस्पर्धी से आगे निकलें। भाजपा इस मुहिम में फिलहाल आगे दिख रही है।

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