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सर जो तेरा चकराए…

नमक की रोज मालिश कर रहे हैं हमारे जख्म वर्जिश कर रहे हैं ये सब पानी की खाली बोतलें हैं जिन्हें हम नज्र-ए-आतिश कर रहे हैं -फहमी बदायूनी।

सर जो तेरा चकराए…
जेल में मालिश करवाते सत्‍येंद्र जैन।

दिल्ली की तिहाड़ जेल। यहां 16 हजार से ज्यादा बंदी हैं। तिहाड़ के इतिहास में पहली बार है कि खुद जेल मंत्री जेल में धनशोधन के आरोप में बंदी हैं। ये जेल मंत्री हैं आम आदमी पार्टी के सत्येंद्र कुमार जैन। हमारे स्तंभ में यह पहले भी उल्लेख किया गया है कि सत्येंद्र जैन दुनिया के ऐसे दुर्लभ मरीज हैं जिन्होंने खुद ही घोषणा कर दी थी कि वे कोरोना के कारण स्मृति लोप के शिकार हो गए हैं, इसलिए धनशोधन के आरोपों के सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे थे।

अब स्वघोषित स्मृति लोप के मरीज मंत्री का वीडियो सामने आया है कि वे जेल में मालिश करवा रहे हैं। खास कंपनी के खनिज जल की बोतलों का ढेर खासा ध्यान आकर्षित कर रहा है। नैतिकता की एकमात्र हमारी दुकान और हमारी कोई शाखा नहीं कहने वाली आम आदमी पार्टी के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भाजपा की नैतिकता पर सवाल उठा रहे हैं। कह रहे हैं कि किसी की बीमारी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। लेकिन, इस वीडियो में मजाक उड़ रहा है तिहाड़ के हजारों बंदियों का। जेल मंत्री उनका साथी बनने के बाद भी मंत्रिपद पर बरकरार हैं। बरकरार क्या, उनके लिए तो पद्मविभूषण की मांग की ही गई थी दिल्ली को मोहल्ला क्लीनिक देने के एवज में।

मनीष सिसोदिया कह रहे हैं कि सत्येंद्र जैन के जेल कक्ष का यह वीडियो लीक कैसे हुआ इसकी जांच की जाए। अदालत के दिशा-निर्देशों के तहत इस तरह के वीडियो कतई लीक नहीं होने चाहिए। लेकिन, सिसोदिया भूल रहे हैं कि मोबाइल कैमरे को क्रांति का हथियार तो आम आदमी पार्टी ने ही बनाया था। अरविंद केजरीवाल ने कैमरे से खुफियागीरी करने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन की तरह ही आह्वान किया था। उस समय तो यही समझ बनी थी कि हर भ्रष्टाचार को मोबाइल से रिकार्ड कर डालो और यह जड़ से खत्म हो जाएगा।

वीडियो सामने आने पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्यप्रणाली को लेकर अदालत की आपत्ति समझ में आ सकती है। लेकिन, खुफिया कैमरे और उसके प्रसार पर आपत्ति उठाने का आम आदमी पार्टी को कोई नैतिक आधार ही नहीं है। वैसे, आम आदमी पार्टी के संदर्भ में नैतिक आधार के बिंदु पर सवाल उठाना शब्द, कागज और जगह की बर्बादी है।

सत्येंद्र जैन का वीडियो सामने आने के बाद इससे जुड़े विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी है। पहली बात, तो किसी भी तरह का इलाज उसके लिए तय खास चिकित्सा कक्ष में किया जाता है, बंदीगृह कक्ष में नहीं। ‘फिजियोथिरेपी संघ’ ने तो अपने बयान में कहा है कि जो वीडियो में दिख रहा है वह कहीं से भी फिजियोथिरेपी नहीं है। आम लोग भी देख कर कह सकते हैं, यह ‘सर जो तेरा चकराए… दिल डूबा जाए… काहे घबराए…’ वाली तेल मालिश ही है।

और अगर, सत्येंद्र जैन के कमरे में मौजूद लोग फिजियोथिरेपी से जुड़े हैं तो आम आदमी पार्टी या जेल प्रशासन उन लोगों का ब्योरा क्यों नहीं जारी करते? आखिर होंगे तो वे किसी सरकारी अस्पताल या जेल से जुड़े कर्मचारी ही। फिर उनका विवरण सामने लाने में क्या परेशानी है। मालिश विवाद उठने के पहले ही सत्येंद्र जैन को खास सुविधाएं देने के आरोप में तिहाड़ के जेल अधीक्षक निलंबित हो चुके हैं।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के विधायक राजेंद्र पाल गौतम के बौद्ध दीक्षा समारोह पर हंगामा हुआ और गुजरात में चुनाव प्रचार कर रहे अरविंद केजरीवाल पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगने लगा। गुजरात में धर्म के मामले में भाजपा डाल-डाल तो मैं पात-पात कर रहे केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल से राजेंद्र पाल गौतम की छुट्टी करने में कोई देर नहीं लगाई। गौतम के मामले में खुद को कट्टर हिंदू साबित किया लेकिन, धनशोधन से लेकर सुकेश चंद्रशेखर तक आरोपों की बरसात के बाद सत्येंद्र जैन के मंत्रिपद को स्वघोषित ईमानदारी की धूप में सुखा दिया जाता है। यह बताता है कि हर दल की तरह आम आदमी पार्टी के लिए भ्रष्टाचार का आरोप नया सामान्य है।

दुखद यह है कि आम आदमी पार्टी पर भी भ्रष्टाचार के सभी आरोप चुनावों के समय ही लगते हैं। हिमाचल-गुजरात से लेकर दिल्ली निगम चुनावों की तारीखों का एलान होते ही सारे वीडियो और सबूत सामने आने लगे। इससे एकबारगी तो नैतिक जगह से सवाल खड़े करने का संदर्भ कमजोर पड़ता ही है। एक सवाल यह भी कि भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आज तक कौन हारा? क्या यह अभी या कभी जनता का मुद्दा रहा है? ऐतिहासिक रूप से दो बार कांग्रेस ही खारिज हुई है भ्रष्टाचार के मुद्दे पर। यह भी अहम है कि उसके बाद किसी और पर चाहे बड़े से बड़ा भ्रष्टाचार का मुद्दा आया हो वह चिपक नहीं पा रहा है। वह चाहे आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर लगाने की कोशिश की या भाजपा की आम आदमी पार्टी पर लगाने की कोशिश हो।

इसके इतर विभिन्न एजंसियों के तहत भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने आए जिनका दुनिया भर में असर पड़ा, लेकिन भारत का राज-समाज अछूता रहा।भारतीय संदर्भ में सामान्यीकरण करें तो यहां की राजनीति ने हम सबको अपनी सीमा के अंदर भ्रष्टाचारी बना दिया है। आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस के खिलाफ ‘मत चूको चौहान’ सरीखा भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। सत्ता से कांग्रेस की विदाई के बाद हमाम में सब नंगे हैं वाला भाव है। नवउदारीकरण के दौर में बोफर्स और स्पेक्ट्रम तथा कोयला आबंटन के मुद्दों पर कांग्रेस के खिलाफ पूरा विपक्ष एकजुट हुआ। लेकिन, कांग्रेस के खारिज होते ही लगा जैसे भ्रष्टाचार का मुद्दा भी खारिज हो गया।

राजनीति में विकल्प की बात करते हुए भ्रष्टाचार के लिए ही विकल्पहीनता की स्थिति ला दी गई। सबसे बड़ा सच यही है कि जनता के बीच भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रह गया। आज के दौर में भाजपा के लिए भी जरूरी है कि वह जब भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है तो क्या उसकी एक ऊंगली दूसरे की ओर और चार ऊंगली खुद पर है? भाजपा पर आरोप लगते ही कांग्रेस के समय में यह-वह, का राग छिड़ जाता है। जनता के बीच भ्रष्टाचार का मुद्दा नैतिक रूप से जा ही नहीं पा रहा है। भ्रष्टाचार को महज चुनावी मौसम में तू-तू, मैं-मैं का मुद्दा बना देना हर पार्टी के लिए फायदेमंद सिद्ध हो चुका है। अगंभीर बना दिए गए भ्रष्टाचार को जनता कब गंभीरता से मुद्दा मानेगी, भारतीय लोकतंत्र इसका इंतजार करेगा।

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First published on: 22-11-2022 at 11:10:24 pm
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