भारत-पाकिस्तान सीमा रेखा खींचने का जिम्मा जिस व्यक्ति को सौंपा गया था, सर सिरिल रेडक्लिफ (Sir Cyril Radcliffe) वह भारत में केवल 6 हफ्ते ही रहे थे। फिर भी इतने कम समय में उन्होंने और बाउंड्री कमीशन ने उपमहाद्वीप का भविष्य तय कर दिया। आइए जानते हैं रेडक्लिफ को इस काम के लिए क्यों चुना गया?

आज़ादी की घोषणा हो चुकी थी,लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच भौगोलिक विभाजन की घोषणा नहीं हुई थी। हिंदू और सिख शरणार्थियों से भरी ट्रेनें पूरब की ओर चल पड़ीं जबकि मुसलमान पश्चिम की ओर भाग गए, एक ऐसी सीमा के पार जिसका सटीक स्थान उन्हें अभी तक पता नहीं था। अपनी किताब’बॉर्डर्स एंड कॉन्फ्लिक्ट इन साउथ एशिया: द रेडक्लिफ बाउंड्री कमीशन एंड द पार्टीशन ऑफ पंजाब’ (2009) में शिक्षाविद और लेखिका लूसी पी चेस्टर ने सीमा पर विभाजन की भयावहता का वर्णन करने वाले वृत्तांत को बताया है। कैसे भारतीयों और पाकिस्तानियों को स्वतंत्रता के दो दिन बाद तक नई सीमा का सटीक स्थान पता नहीं चला।

रैडक्लिफ को बनाया गया सीमा आयोग का अध्यक्ष

भारत में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच बढ़ते तनाव तथा राष्ट्रवादी समूहों के बढ़ते दबाव ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अपना शासन कायम रखना लगातार मुश्किल बना दिया था। इस बीच, अमेरिका भी ब्रिटेन पर अपने उपनिवेशों को छोड़ने का दबाव बना रहा था। ब्रिटेन सत्ता का हस्तांतरण जल्द से जल्द करने के लिए दृढ़ था। इसके लिए दो सीमा आयोग गठित किए गए, एक पंजाब के लिए और दूसरा बंगाल के लिए। दोनों आयोगों की अध्यक्षता ब्रिटिश बैरिस्टर रैडक्लिफ को करनी थी। 26 जून को ब्रिटिश अधिकारियों ने औपचारिक रूप से उनकी नियुक्ति की घोषणा की। चेस्टर ने लिखा है, “लॉर्ड माउंटबेटन ने रैडक्लिफ की क्षमताओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह सत्यनिष्ठा, कानूनी प्रतिष्ठा और व्यापक अनुभव वाले व्यक्ति हैं।”

रैडक्लिफ पहले कभी भारत नहीं आए थे

रैडक्लिफ इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। फिर भी, कई मायनों में इसे उनकी सबसे बड़ी खूबी माना गया। यह धारणा थी कि भारत से उनकी अपरिचितता उन्हें निष्पक्ष बनाएगी। भारत के उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी को देखते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रमुख फैसलों में दक्षिण एशियाई राष्ट्रवादी नेताओं को शामिल करने पर सहमति जताई। प्रत्येक सीमा आयोग में दक्षिण एशिया के चार न्यायाधीश शामिल किए गएदो कांग्रेस द्वारा नामित और दो मुस्लिम लीग द्वारा। पंजाब आयोग के लिए यह तय किया गया कि कांग्रेस के नामित सदस्यों में से एक सिख होगा। चारों न्यायाधीश आपराधिक कानून के अच्छे जानकार थे लेकिन उनके लिए भौगोलिक विशेषज्ञता या विभाजन से जुड़े जटिल कानूनी पूर्व उदाहरणों की जानकारी होना अनिवार्य नहीं था।

रैडक्लिफ को क्यों चुना गया?

इंडियन एक्सप्रेस को को दिए एक इंटरव्यू में चेस्टर ने बताया कि रैडक्लिफ को चुने जाने की वजह का यह थी कि वह बेहद सम्मानित वकील थे। उन्होंने कहा, “उस समय बड़ी संख्या में प्रमुख राष्ट्रवादी नेता वकील थे, ऐसे लोग जिन्होंने कानून की शिक्षा ली थी, कानून के प्रति गहरा सम्मान रखते थे और बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए कानूनी ढांचे पर भरोसा करते थे। इसलिए, जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं को सीमा से जुड़े सवालों के समाधान के लिए कानूनी तरीका अपनाना स्वाभाविक लगा।”

रैडक्लिफ के भारत रवाना होने की तैयारी के बीच ब्रिटिश सरकार ने सत्ता से हटने की प्रक्रिया तेज कर दी। 4 जुलाई को उसने भारतीय स्वतंत्रता विधेयक पेश किया, जिसके तहत रैडक्लिफ के फैसले को भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए बाध्यकारी बना दिया गया।

रैडक्लिफ 8 जुलाई को भारत पहुंचे, इस दौरान ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की समय सीमा में 6 हफ्ते से भी कम समय बचा था। भारत पहुंचते ही उन्होंने काम शुरू कर दिया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने बंगाल और पंजाब, दोनों जगह अपने-अपने पक्ष आयोग के सामने रखे जबकि छोटे और कम प्रभावशाली समूहों को केवल लिखित रूप में अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति दी गई।

रैडक्लिफ आयोग की किसी भी बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हुए

प्रोफेसर जोया चटर्जी ने 1999 में प्रकाशित अपने शोध-पत्र ‘द फैशनिंग ऑफ अ फ्रंटियर: द रैडक्लिफ लाइन एंड बंगाल्स बॉर्डर लैंडस्केप, 1947-52’ में लिखा है, “रैडक्लिफ आयोग की किसी भी सार्वजनिक बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हुए। उन्होंने केवल सभी पक्षों की ओर से आयोग के सामने पेश किए गए दस्तावेजों का अध्ययन किया। जिन इलाकों का विभाजन करने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी, उनका खुद जाकर सर्वे करने का भी उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया।”

सीमा निर्धारण की प्रक्रिया के अंतिम चरण में रैडक्लिफ दिल्ली चले गए और अकेले ही सीमा रेखा तैयार करने में जुट गए। चेस्टर के मुताबिक, उन्होंने अपने निजी विचार-विमर्श से जुड़े लगभग सभी दस्तावेज नष्ट कर दिए। वह कहती हैं, “बचे हुए कुछ दस्तावेजों में सीमा रेखा का एक स्केच मैप भी शामिल है।”

पंजाब के दो प्रमुख शहरी केंद्रों लाहौर और अमृतसर का विभाजन

जैसे-जैसे रैडक्लिफ अपने अंतिम फैसले के करीब पहुंचे, उनके सामने मुख्य विचार बहुसंख्यक आबादी वाले क्षेत्रों को अलग करना था। इसी आधार पर उन्होंने पंजाब के दो प्रमुख शहरी केंद्रों लाहौर और अमृतसर को विभाजित कर दिया। रैडक्लिफ ने फिरोजपुर और गुरदासपुर जिलों के दो ऐसे इलाकों को भारत के हिस्से में दे दिया जहां मुस्लिम आबादी मामूली बहुमत में थी। इसका एक कारण यह था कि अमृतसर की सिंचाई करने वाली नहर प्रणाली को एक ही प्रशासन के अधीन रखा जा सके क्योंकि इस नहर प्रणाली के जलस्रोत गुरदासपुर में थे।

रैडक्लिफ के निजी सचिव क्रिस्टोफर ब्यूमोंट के साथ हुए साक्षात्कारों से भी पुष्टि होती है कि जनसांख्यिकी संबंधी पहलू उनके लिए प्राथमिकता में थे। हालांकि, राजनीतिक नेताओं की ओर से सभी पक्षों की ओर से की गई मांगों के बावजूद उन्होंने भौगोलिक या प्राकृतिक सीमाओं को ज्यादा महत्व नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने पहले से मौजूद प्रशासनिक सीमाओं को आधार बनाया। धार्मिक स्थलों को भी उन्होंने अपेक्षाकृत कम महत्व दिया।

औपनिवेशिक शासन की छाप को बरकरार रखना

चेस्टर बताती हैं कि मौजूदा प्रशासनिक सीमाओं को बनाए रखने की एक वजह औपनिवेशिक शासन की छाप को बरकरार रखना भी थी। वह कहती हैं, “हालांकि रैडक्लिफ ने इस फैसले के पीछे अपने कारणों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया लेकिन पूरी तरह से नई सीमा तय करना जो मौजूदा औपनिवेशिक प्रशासनिक सीमाओं के अनुरूप न हो ब्रिटिश शासन को खारिज करने के रूप में देखा जा सकता था।”

रैडक्लिफ रेखा की सबसे अहम विशेषता यह थी कि उसने अमृतसर को लाहौर से अलग कर दिया। अमृतसर भारत के हिस्से में गया जबकि लाहौर पाकिस्तान में चला गया। इसके अलावा, सबसे ज्यादा विवाद गुरदासपुर और फिरोजपुर जिलों के कुछ हिस्सों को लेकर हुआ। चेस्टर ने इंटरव्यू में बताया, “ऐसी अफवाहें रही हैं कि रैडक्लिफ ने आखिरी चरण में कुछ बदलाव करके भारत को कश्मीर तक पहुंचने के लिए एक भू-मार्ग दे दिया था लेकिन इस आरोप के समर्थन में कोई सबूत नहीं है।”

सीमा रेखा ने लोगों के घरों तक को दो हिस्सों में बांट दिया

रैडक्लिफ रेखा ने पंजाब की सुव्यवस्थित सिंचाई व्यवस्था को बीच से काट दिया। इसका असर स्थानीय स्तर पर भी बेहद विघटनकारी रहा। कुछ मामलों में तो इस सीमा रेखा ने लोगों के घरों तक को दो हिस्सों में बांट दिया। रैडक्लिफ अपने फैसले के परिणामों से पूरी तरह वाकिफ थे। अपना सीमा निर्धारण संबंधी फैसला सौंपने के बाद वह दक्षिण एशिया छोड़कर जाना चाहते थे।

चेस्टर उनके हवाले से लिखती हैं, “अगली सुबह की अपनी योजना के बारे में रैडक्लिफ ने लिखा था कि मैं दिल्ली हवाई अड्डे पर मजबूती से डेरा डाल दूंगा और इंग्लैंड से आने वाले किसी विमान का इंतजार करूंगा। पंजाब और बंगाल के बारे में मेरे फैसले के लिए भारत में कोई मुझसे प्यार नहीं करेगा और लगभग 8 करोड़ लोग ऐसे होंगे जिनके पास शिकायत होगी और जो मुझे तलाशना शुरू कर देंगे। मैं नहीं चाहता कि वे मुझे ढूंढ पाएं।”

रैडक्लिफ ने भारत में अपने अनुभवों के बारे में बहुत कम बात की

इंग्लैंड लौटने के बाद रैडक्लिफ ने भारत में अपने अनुभवों के बारे में बहुत कम बात की। हालांकि, कई लोगों को विश्वास नहीं था कि रैडक्लिफ ने यह काम पूरी तरह अकेले किया था। चेस्टर कहती हैं, “इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच ने अपनी 1997 की किताब लिबर्टी ऑर डेथ में एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है कि रैडक्लिफ एक बैरिस्टर थे जो उन्हें दिए गए निर्देशों के मुताबिक काम कर रहे थे और माउंटबेटन उनके क्लाइंट थे। व्यापक अर्थों में देखा जाए तो ब्रिटिश सरकार उनकी क्लाइंट थी।”

हालांकि, माउंटबेटन इस बात पर जोर देते रहे कि रैडक्लिफ वायसराय से पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम कर रहे थे लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि रैडक्लिफ और उनके सचिव की एक ओर तथा माउंटबेटन और भारत सरकार के अन्य अधिकारियों की दूसरी ओर बातचीत होती रही थी।”

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