West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल में गुरुवार को विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मंच तैयार है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है, लेकिन पार्टी को अपने रास्ते में कुछ अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
टीएमसी को मुख्य विपक्षी दल बीजेपी से कड़ी चुनौती मिल रही है और इस चुनौती की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं, जो पूरे बंगाल में बीजेपी के जोरदार चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं।
2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य में पैठ बनाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने 42 में से 18 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी को 22 सीटें मिली थीं। हालांकि, 2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने निर्णायक रूप से अपना वर्चस्व कायम किया और 294 में से 215 सीटें जीतकर बीजेपी की 77 सीटों को पीछे छोड़ दिया।
टीएमसी ने 2021 से अब तक हुए 21 उपचुनावों में से 20 में जीत हासिल की। 2024 के लोकसभा चुनावों में इसने बीजेपी की 12 सीटों के मुकाबले 29 सीटें जीतीं। पहले चरण में 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर मतदान हो रहा है। मुर्शिदाबाद, मालदा, पुरबा, पश्चिम मेदिनीपुर, पश्चिम बर्धमान और बीरभूम के अलावा, इन जिलों में उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूच बिहार और उत्तर एवं दक्षिण दिनाजपुर औरर राज्य के पश्चिमी भाग के झारग्राम, पुरुलिया और बांकुरा भी शामिल हैं।
टीएमसी के सामने बड़ी चुनौती एंटी-इंकंबेंसी
15 साल तक सत्ता में रहने के बाद टीएमसी के सामने एक बड़ी चुनौती एंटी-इंकंबेंसी की धारणा है। इस धारणा को टीएमसी के कई नेताओं और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से और बल मिला है। ये आरोप स्कूल में नौकरियों, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कोयला और पशुओं की तस्करी से जुड़े तमाम कथित घोटालों से संबंधित हैं।
ममता बनर्जी के 2021 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद टीएमसी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए और सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने उन पर शिकंजा कस दिया। पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिया मल्लिक जैसे वरिष्ठ मंत्रियों को शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन घोटाले के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। पार्टी के दिग्गज नेता अनुब्रता मंडल को पशु तस्करी मामले में हिरासत में लिया गया।
टीएमसी खेमे का मानना है कि भ्रष्टाचार के बादल पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं डालेंगे, उनका तर्क है कि चुनाव आयोग (EC) द्वारा एसआईआर और उसके बाद की प्रक्रिया के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने जैसे अन्य विवादों के सामने आने के बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा अब पीछे छूट गया है।
ईडी और एनआईए ने टीएमसी नेताओं के खिलाफ जांच तेज की
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले ईडी और एनआईए ने टीएमसी नेताओं और उम्मीदवारों से जुड़े तमाम मामलों में अपनी जांच तेज कर दी है। इसमें बिधाननगर से उम्मीदवार सुजीत बोस, खाद्य मंत्री रथिन घोष, राशबिहारी से उम्मीदवार देबासिस कुमार और भगवानपुर से उम्मीदवार मानव कुमार परुआ शामिल हैं।
एजेंसियों द्वारा छापेमारी किए जाने और इनमें से कुछ नेताओं को समन भेजे जाने से टीएमसी मुश्किल में फंस गई है, वहीं, ईडी ने कोयला घोटाले के मामले में पार्टी की पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक पर भी शिकंजा कस दिया है। यह पार्टी के चुनावी कैंपेन का मैनेजमेंट कर रही थी।
19 अप्रैल को ईडी ने कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर (स्पेशल ब्रांच) शांतनु सिन्हा बिस्वास के आवास पर छापेमारी की और बाद में कथित भूमि हड़पने के मामले में कोलकाता के एक कारोबारी जॉय कामदार को गिरफ्तार किया।
मुख्यमंत्री ममता ने तारकेश्वर में एक चुनावी रैली में कहा, “हम हर बात का रिकॉर्ड रख रहे हैं।” ईडी द्वारा बिस्वास के खिलाफ की गई कार्रवाई का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “अब वे उस व्यक्ति के घर पर छापा मार रहे हैं जो मेरी सिक्योरिटी का ख्याल रखता है। क्या इसका मतलब यह है कि वे मुझे मारना चाहते हैं? अगर मुझे मारकर वे पश्चिम बंगाल जीत सकते हैं, तो वे वह भी कर सकते हैं। सीपीआई(एम) के शासनकाल में उन्होंने कई बार मेरी हत्या करने की कोशिश की थी और अब सीपीआई(एम) के सभी लोग बीजेपी से जुड़ गए हैं।”
एसआईआर के खिलाफ टीएमसी ने खोला मोर्चा
तृणमूल कांग्रेस बंगाल में एसआईआर को लागू करने के लिए चुनाव आयोग की तरफ से उठाए गए कदमों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। इन कदमों में माइक्रो ऑब्जर्वर से लेकर तार्किक विसंगतियों और फैसलों तक सब कुछ शामिल है। टीएमसी ने चुनाव आयोग पर बीजेपी के इशारे पर मनमानी करने और एसआईआर के जरिये बड़ी संख्या में वोटर्स को बाहर करने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने टीएमसी के आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि एसआईआर ने फर्जी वोटर्स को हटाया है।
प्रोसेस के दौरान 27 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। 2021 के चुनावों में टीएमसी और बीजेपी को मिले कुल वोटों का अंतर 60.62 लाख था, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में घटकर 42.43 लाख रह गया।
टीएमसी का दावा है कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने का विवाद उसकी संभावनाओं को बढ़ाएगा। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनके रिश्तेदार धर्म या जाति की परवाह किए बिना बीजेपी को वोट नहीं देंगे। एसआईआर का मामला बीजेपी पर ही भारी पड़ेगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह से आम लोगों के लिए एसआईआर मामले की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में की, वह ऐतिहासिक है। क्या आपको लगता है कि लोग इसे भूल जाएंगे?”
प्रशासनिक फेरबदल
15 मार्च को चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद चुनाव आयोग ने हर लेवल पर अधिकारियों और पुलिसकर्मियों का बड़े पैमाने पर फेरबदल शुरू कर दिया। इसके तहत अब तक 500 से ज्यादा अधिकारियों का ट्रांसफर किया जा चुका है। 15 मार्च को ही चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीना का ट्रांसफर कर दिया। अगले दिन, उसने अन्य शीर्ष पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ डीजीपी और कोलकाता पुलिस आयुक्त को भी पद से हटा दिया।
26 मार्च को चुनाव आयोग ने नंदीग्राम और भवानीपुर सहित 73 रिटर्निंग अधिकारियों का तबादला कर दिया, ये दोनों सीटें सबसे ज्यादा चर्चित हैं। जहां ममता बनर्जी ने इन तबादलों को बंगाल पर नियंत्रण हासिल करने की सोची-समझी साजिश बताया है, वहीं बीजेपी ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सही ठहराया है।
ध्रुवीकरण का खेल
ममता बनर्जी के सामने एक और बड़ी मुश्किल यह है कि बीजेपी राज्य के मतदाताओं को अपने-अपने पक्ष में ध्रुवीकृत करने की पूरी कोशिश कर रही है। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “2019 में बंगाल में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद, 2021 और 2024 में हमारा वोट शेयर लगभग एक जैसा ही रहा है, जबकि इन सालों में हमारा प्रदर्शन औसत दर्जे का रहा है। हम समझते हैं कि हमें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे। लेकिन अगर हमें हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा मिलता है, तो हम बहुमत के जादुई आंकड़े (153 सीटें) तक पहुंचने का प्रयास कर सकते हैं।”
राज्य की लगभग 30% आबादी वाले मुस्लिम समुदाय ने 2011 से टीएमसी का बड़े पैमाने पर समर्थन किया है, जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा सरकार के 34 साल के शासन को खत्म कर दिया था।
टीएमसी के लिए अपने मुस्लिम समर्थक आधार को बरकरार रखना एक चुनौती है, क्योंकि समुदाय के एक वर्ग में ओबीसी लिस्ट, वक्फ कानून के लागू होने और अन्य मुद्दों को लेकर असंतोष दिखाई देता है। कांग्रेस, आईएसएफ, एजेयूपी और एआईएमआईएम जैसी अन्य विपक्षी पार्टियां भी टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकती हैं।
भवानीपुर सीट पर भी कड़ी चुनौती
ममता को दक्षिण कोलकाता की अपनी ही भवानीपुर सीट पर भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जहां बीजेपी ने विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है। भवानीपुर में लगभग 51000 मतदाताओं यानी कुल मतदाताओं के 21% के नाम हटा दिए गए हैं। इससे टीएमसी प्रमुख पर दबाव बढ़ गया है। अपने चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में ममता बनर्जी भवानीपुर पर ध्यान केंद्रित करने वाली हैं, जहां 29 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान होना है। टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें करने के अलावा, उनके जमीनी स्तर पर प्रचार करने की भी उम्मीद है।
पश्चिम बंगाल पहले चरण की हाई-प्रोफाइल सीटों पर सियासी महासंग्राम
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होना है। यह चरण काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें कई हाई-प्रोफाइल सीटों पर बड़े नेताओं की किस्मत दांव पर है। कुल 16 जिलों की 152 सीटों पर वोटिंग होगी। उत्तर बंगाल, दक्षिण बंगाल और जंगलमहल क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण इलाके इस चरण में शामिल हैं। मतदान सुबह 7 बजे से शुरू होकर शाम 6 बजे तक चलेगा।
इस चरण में मुकाबला मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी के बीच माना जा रहा है। कुछ सीटों पर कांग्रेस और अन्य दल भी मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं। मतदाताओं की नजर खासकर उन सीटों पर है जहां बड़े नेता या चर्चित चेहरे मैदान में हैं और जहां पिछली बार करीबी मुकाबला हुआ था। पढ़ें पूरी खबर…
