अमृतसर में 13 अप्रैल, 1978 को बैसाखी के दिन निरंकारियों और सिखों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में सिख समुदाय के 13 लोगों की मौत हुई थी। ऐसा माना जाता है कि इस घटना के बाद पंजाब में आतंकवाद का काला दौर शुरू हुआ। इस हिंसक घटना के बाद ही खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरांवाले का नाम बड़े स्तर पर चर्चा में आया था।
सवाल यह है कि सिख समुदाय और निरंकारियों के बीच यह टकराव आखिर क्यों हुआ था?
जरनैल सिंह भिंडरांवाले और फौजा सिंह उस दौरान सिख समुदाय के ऐसे लोगों का नेतृत्व कर रहे थे जो निरंकारी पंथ के प्रमुख गुरबचन सिंह से बेहद नाराज थे। सिख समुदाय का निरंकारी संप्रदाय से कई मुद्दों को लेकर टकराव था। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि निरंकारी संप्रदाय अपने पंथ के प्रमुख को सतगुरु मानता था जबकि सिख समुदाय के लोग गुरु ग्रंथ साहिब को ही सिखों का अंतिम और जीवित गुरु मानते हैं।
दूसरी ओर, निरंकारी पंथ के प्रमुख गुरबचन सिंह का कहना था कि उनका संप्रदाय कुछ भी गलत नहीं कर रहा और लोगों को उनकी विचारधारा को समझना चाहिए।
1978 में क्या हुआ था?
अप्रैल, 1978 में अमृतसर में निरंकारी संप्रदाय ने बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। इस मौके पर संप्रदाय की ओर से जुलूस निकाला गया और जब निरंकारी संप्रदाय के अनुयायी अपने आश्रम में पहुंचे तो फौजा सिंह और जरनैल सिंह भिंडरांवाले के नेतृत्व में लगभग 200 सिख उनका विरोध करने के लिए सड़क पर आ गए। इस दौरान भयंकर खूनी झड़प हुई और फौजा सिंह समेत सिख समुदाय के 13 लोग मारे गए।
इस मामले की सुनवाई को हरियाणा की अदालतों में ट्रांसफर कर दिया गया। जहां अदालत ने निरंकारी संप्रदाय के लोगों को इस तर्क के आधार पर बरी कर दिया कि उन्होंने अपनी आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की थी। इस खूनी हिंसक घटना के बाद जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने आंदोलन तेज करने का ऐलान किया।
निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख गुरबचन सिंह की हत्या
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के तत्कालीन प्रमुख गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई। इसके बाद निरंकारी संप्रदाय का समर्थन करने वाले कई लोगों की हत्याएं हुई और हमले की कोशिश भी की गई।
अखंड कीर्तनी जत्थे से जुड़े रणजीत सिंह ने कबूल किया कि उन्होंने ही गुरबचन सिंह की हत्या की है। रणजीत सिंह को इसके लिए 10 साल से ज्यादा वक्त की जेल की सजा सुनाई गई। रणजीत सिंह जब जेल में था, उसी दौरान उसे अकाल तख्त का जत्थेदार नियुक्त किया गया था।
निरंकारियों और सिखों के बीच हुए इस टकराव को लेकर सिख संगठन दल खालसा के प्रवक्ता कंवरपाल सिंह कहते हैं कि निरंकारी संप्रदाय गुरु ग्रंथ साहिब की बात तो करता था लेकिन साथ ही वह जीवित गुरु की परंपरा में भी विश्वास रखता था। इसके अलावा निरंकारी संप्रदाय ने ‘सात सितारे’ भी बनाए थे जिसे सिख समुदाय के ‘पंज प्यारे’ के जैसा ही मानते थे।
2018 में फिर हुआ निरंकारी संप्रदाय पर हमला
निरंकारी संप्रदाय पर हमले की ऐसी ही एक घटना अमृतसर के बाहरी इलाके में स्थित अदलीवाला गांव में नवंबर 2018 में भी हुई थी। तब निरंकारी संप्रदाय की एक सभा में उग्रवादियों ने ग्रेनेड से हमला किया था। पुलिस ने कहा था कि यह आतंकवादी कार्रवाई है। इस घटना में तीन लोग मारे गए थे और 21 लोग घायल हुए थे।
यह भी पढ़ें- क्या था आनंदपुर साहिब प्रस्ताव?
अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के तहत 42 मांगों को सामने रखा था लेकिन जब इंदिरा गांधी ने अक्टूबर, 1981 में अकाली दल के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया तो उन्होंने इन्हें घटाकर 14 कर दिया। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
