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सियाचिन: दुश्मन से नहीं, प्रकृति से जंग की मजबूरी

यह लड़ाई इस इलाके में अब तक की पहली और आखिरी लड़ाई थी।

Author Published on: December 3, 2019 3:32 AM
दुनिया के इस सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

सियाचिन ग्लेशियर में दो बार आए बर्फीले तूफान (हिमस्खलन) में अब तक छह सैनिकों और सेना के दो कुलियों की मौत हो चुकी है। दोनों तूफानों की चपेट में आए सेना के कई अन्य जवानों अस्पताल में भर्ती हैं। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। हिमस्खलन की खबरें आने के बाद से दुनिया के इस सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र को लेकर चर्चा तेज हो गई है। यहां मौसम की मार के कारण जवानों की मौत को लेकर बहस होने लगी है कि इन मौतों को रोकने का क्या कोई उपाय नहीं? सियाचिन में हिमस्खलन या प्रतिकूल मौसम की वजह से हर महीने औसतन दो जवानों की मौत हो जाती है। 1984 से लेकर अब तक 1400 से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं।

सियाचिन में भारत और पाकिस्तान के सैनिक 13 साल से एक-दूसरे के सामने डटे हुए हैं। यह दुनिया का सबसे खर्चीला युद्ध क्षेत्र भी है, जहां लड़ने वाले दोनों पक्ष जानते हैं कि इस युद्ध का विजेता कोई नहीं हो सकता। भारत सरकार के मुताबिक, इस हालात के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है, क्योंकि उसने अपने मानचित्रों में पाक अधिकृत कश्मीर की सीमा को नियंत्रण रेखा (एलओसी) के अंतिम छोर एनजे-9842 से सीधी रेखा खींच कर कराकोरम दर्रे तक दिखाना आरंभ किया था। चिंतित भारत सरकार ने तब 13 अप्रैल 1984 को ‘आॅपरेशन मेघदूत’ आरंभ कर उस पाक सेना को इस हिमखंड से पीछे धकेलने का अभियान आरंभ किया। पाकिस्तान का इरादा सियाचिन के बाद नुब्रा घाटी के साथ ही लद्दाख पर कब्जा करना था।

1984 में भारतीय सशस्त्र बलों का अभियान अनोखा था, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़े युद्धक्षेत्र में पहली बार कार्रवाई की गई। ये अभियान 1984 से 2002 तक चला था, यानी पूरे 18 साल तक। भारत और पाकिस्तान की सेनाएं सियाचिन के लिए एक दूसरे के सामने डटी रहीं। जीत भारत की हुई। आज भारतीय सेना 70 किलोमीटर लंबे सियाचिन ग्लेशियर, उससे जुड़े छोटे ग्लेशियर, तीन प्रमुख दर्रों (सिया ला, बिलाफोंद ला और म्योंग ला) पर कब्जा जमाए हुए है। इस अभियान में भारत के करीब एक हजार जवान शहीद हो गए थे। हर रोज सरकार सियाचिन की हिफाजत पर करोड़ों खर्च करती है।

सियाचिन में आज तक सिर्फ एक ही लड़ाई हुई है। यह लड़ाई इस इलाके में अब तक की पहली और आखिरी लड़ाई थी। यहां के एक बंकर पर कब्जा जमाने के लिए जम्मू के आॅनरेरी कैप्टन बाना सिंह को परमवीर चक्र दिया गया था और उस पोस्ट का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है। सियाचिन ग्लेशियर पर 1987 में पाकिस्तानी सेना ने 21 हजार फुट की ऊंचाई पर कब्जा कर एक बंकर का निर्माण कर लिया था। यह पोस्ट भारतीय सेना के लिए खतरा बन गई थी, क्योंकि वे वहां से गोलियां बरसा कर नुकसान पहुंचाने लगे थे।

पाकिस्तान की पोस्ट पर कब्जे के लिए 1987 के मई महीने में बाना सिंह समेत 60 सैनिकों की टीम तैयार की गई। इस पोस्ट पर भारत ने कब्जा कर इसका नाम बाना सिंह पोस्ट रख दिया। हालांकि, 22 जून को शुरू हुए इस अभियान में उसके कई अफसर और जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस लड़ाई का एक कड़वा सच यह था कि 21000 फुट की ऊंचाई पर शून्य से 60 डिग्री नीचे के तापमान में भारतीय जवानों ने तीन दिन भूखे पेट रह कर यह जीत हासिल की थी।

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