यह बात 1950 की है। स्वतंत्र भारत आजादी का जश्न मना रहा था। एक साल बाद देश में पहले आम चुनाव होने थे। हिंदू महासभा छोड़ने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपनी नई राजनीतिक पार्टी खड़ी करनी थी। उनके पास विजन था, उद्देश्य था, लेकिन जरूरत थी मार्गदर्शन और संगठनात्मक मदद की।

इसी मकसद से श्यामा प्रसाद मुखर्जी दिल्ली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर नागपुर पहुंचे। वहां एक पुराने बंगले में उनकी मुलाकात तत्कालीन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख माधव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें ‘गुरुजी’ कहा जाता था, से हुई। यह वही बंगला था, जहां कभी वीर सावरकर भी रह चुके थे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी चाहते थे कि गुरुजी उनकी नई राजनीतिक पार्टी के गठन में सहयोग और मार्गदर्शन करें। गोलवलकर ने शुरुआत में किसी तरह की मदद से साफ इनकार कर दिया।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी हार मानने वालों में नहीं थे। उन्हें अहसास था कि 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रतिबंध के बाद संगठन के कई स्वयंसेवक राजनीतिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व चाहते थे। इसी सोच के साथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष से मुलाकात की और महासभा को भंग कर नई राजनीतिक पार्टी बनाने का प्रस्ताव रखा।

करीब चार महीने बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नई पार्टी के गठन को लेकर एक बड़ी बैठक बुलाई। यह बैठक सरदार वल्लभभाई पटेल के निधन के कुछ समय बाद हुई थी। मुखर्जी चाहते थे कि RSS के बड़े नेता भी इसमें शामिल हों। बैठक में सुझाव दिया गया कि किसी भी तरह गुरुजी को इस नए संगठन का समर्थन देने के लिए तैयार किया जाए। सभी जानते थे कि आरएसएस एक बड़ा स्वयंसेवक संगठन है और उसके पास मजबूत कार्यकर्ता नेटवर्क मौजूद है।

विनय सीतापति ने अपनी किताब ‘जुगलबंदी’ में भी लिखा है कि राजनीति से दूर रहने की गोलवलकर की नीति संगठन के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं आ रही थी। धीरे-धीरे गोलवलकर को भी इसका एहसास हुआ। संगठन की एकता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने पुराने रुख में बदलाव किया और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नई पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया।

इसी दौरान गुरुजी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी से एक ऐतिहासिक वादा किया। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें सोने की पांच मुद्राएं दूंगा।” ये पांच ‘सोने की मुद्राएं’ असली सोना नहीं थीं, बल्कि ऐसे पांच नेताओं का प्रतीक थीं, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। ये पांच नाम थे-दीनदयाल उपाध्याय, सुंदर सिंह भंडारी, नानाजी देशमुख, बापू साहब सोहनी और बलराज मधोक।

इसके कुछ महीने बाद 21 अक्टूबर 1951 को 400 प्रतिनिधियों की बैठक में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। पार्टी के घोषणा-पत्र में ‘एक भूभाग, एक राष्ट्र और एक संस्कृति’ के सिद्धांत को प्रमुखता दी गई। चुनाव चिन्ह जलता हुआ दीपक रखा गया।

एक खास बात यह भी थी कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी का नाम ‘भारतीय जनसंघ’ रहेगा। उसमें ‘हिंदू’ शब्द नहीं जोड़ा जाएगा। मंच पर देवी-देवताओं की तस्वीरें जरूर थीं, लेकिन पार्टी ने खुद को सीधे तौर पर हिंदूवादी छवि तक सीमित रखने से परहेज किया।

बताया जाता है कि शुरुआती दौर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की इस सोच से आरएसएस के कुछ नेता पूरी तरह सहज नहीं थे। लेकिन उस समय आरएसएस भी उग्र राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहता था और गोलवलकर की रणनीति को आगे बढ़ा रहा था। इसी वजह से तमाम मतभेदों के बावजूद दोनों के बीच साझेदारी बनी रही। आगे चलकर इसी भारतीय जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का रूप लिया।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी जवाहरलाल नेहरू के सबसे मुखर विरोधियों में माने जाते थे। वह देश के विभाजन के लिए नेहरू की नीतियों को जिम्मेदार मानते थे। हिंदू महासभा छोड़ते समय उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि उनकी नई पार्टी की सदस्यता सभी धर्मों के लोगों के लिए खुली होगी।

इसी दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दीनदयाल उपाध्याय का साथ मिला। बचपन में ही माता-पिता को खो चुके दीनदयाल उपाध्याय ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद आरएसएस में अपना नया परिवार पाया था। आगे चलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की जोड़ी भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली जोड़ियों में गिनी गई।

दोनों का स्वभाव अलग था, लेकिन विचार एक जैसे थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी संसद में अपने तर्कों से सरकार को घेरते थे, जबकि दीनदयाल उपाध्याय अपने भाषणों से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर देते थे।

दोनों की साझेदारी की पहली बड़ी परीक्षा 1951-52 के पहले आम चुनाव में हुई। भारतीय जनसंघ ने 94 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 3 सीटें जीत सका। श्यामा प्रसाद मुखर्जी कोलकाता दक्षिण-पूर्व सीट से जीते। दुर्गाचरण बनर्जी ने मिदनापुर-झाड़ग्राम सीट जीती, जबकि उमाशंकर त्रिवेदी चित्तौड़ सीट से चुनाव जीतने में सफल रहे।

इसके बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया। उस समय जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहले बड़े नेता थे, जिन्होंने इसका खुलकर विरोध किया। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था, “एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे।”

1952 में जम्मू की एक विशाल रैली में उन्होंने कहा था, “मैं आपको भारतीय संविधान दिलाकर रहूंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।” बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर 11 मई 1953 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद, 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई।