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चैत की आगवानी में चैती की प्रस्तुति

श्रीराम भारतीय कलाकेंद्र ने फागुन के बाद चैत्र आते आते राजधानी के संगीत रसिकों को 69वें श्रीराम शंकरलाल संगीत समारोह-2016 के रूप में नव वर्ष का सुरीला तोहफा दिया।

Author नई दिल्ली | April 8, 2016 4:55 AM

श्रीराम भारतीय कलाकेंद्र ने फागुन के बाद चैत्र आते आते राजधानी के संगीत रसिकों को 69वें श्रीराम शंकरलाल संगीत समारोह-2016 के रूप में नव वर्ष का सुरीला तोहफा दिया। कमानी सभागार में आयोजित इस चतुर्दिवसीय समारोह में सुबह के रागों के लिए विशेष रूप से एक प्रात:कालीन सत्र भी था जिसमें रामपुर सहसवान घराने के सितारा उस्ताद राशिद खां ने अपनी आवाजों-अंदाज और सुबह के रागों की बेहतरीन पेशकश से सुनने वालों का दिल खुश कर दिया।

संगीत समारोह का उद्घाटन पंडित नागराजराव हवलदार के प्रभावशाली गायन से हुआ जिन्होंने शाम के संधिप्रकाश राग पूरियाधनाश्री से शुरुआत करते हुए राग बिहाग में एक स्वरचित छोटा खयाल गाकर राग भठियार में अक्क महादेवी के एक कर्नाटक पद से अपना गायन संपन्न किया।

जयपुर अतरौली घराने की यशस्वी गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े ने खम्भावती जैसे विरल और श्रुतिमधुर राग का चुनाव करके ही आधा किला फतह कर लिया था। उसकी मोहक प्रस्तुति ने तो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया। खमाज ठाट के इस जन्य राग के अवरोह में वर्जित ऋषभ को छोड़ कर वह कभी गांधार से तो कभी माध्यम से षड्ज पर मींड लेते हुए उनका उतरना मोहक था। इस मीठे राग में विलम्बित और मध्य लय की दो रचनाओं के बाद उन्होंने नायकी कान्हड़ा में विस्मयजन्य विपर्यय दिया। चैत की आगवानी करती चैती से सुंदर इस प्रस्तुति का समापन नहीं हो सकता था।

पं अजय चक्रवर्ती की शिष्या और सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती की सूरत और सीरत दोनों ने ही लोगों को धराशायी कर दिया। मुख्य राग मारू बिहाग के बाद हिंडोल बहार और खमाज में बन्दिशी ठुमरी तक तो मामला ठीक था लेकिन अपने बाद गाने वाले वरिष्ठ कलाकार को नजर अंदाज कर, इसके बाद मांझ खमाज में उन्होंने एक और ठुमरी शुरू की जिसमें मियां मल्हार और जैजैवन्ती से लेकर तोड़ी तक अनेक रागों की छाया दिखाते हुए वह मन की तरंग पर इधर से उधर घूमती रही।

पं.वेंकटेश कुमार की बागेश्री ने सुधी श्रोताओं को निहाल कर दिया। इस राग के चिर परिचित बड़े खयाल ‘सखी मन लागे ना…’ में उन्होंने इस रात्रिकालीन राग की परतों को जिस एहतियात से खोला उसने बंदिश में वर्णित विरहिणी नायिका के सारे मनोभाव भी अनावृत कर डाले। तीनताल में छोटे खयाल ‘कौन करत तोरी वपियरवा..’ में आकार की तानों की बौछार विविधता लिए हुए थी। बसंत-बहार में अत्यधिक कुशलता से वह दोनों रागों के बीच सुरीला संतुलन बनाए रहे। इस शाम कौशिकी की शुरुआत से उनकी भैरवी तक संगीत प्रेमियों ने रागों की इहलौकिक लीला से पारलौकिक तृप्ति तक का अनुभव किया।

उस्ताद शाहिद परवेज के सितार पर राग झिंझोटी की मीठी आलाप ने ही माहौल मीठा कर दिया। उनके एक ही सुर पर चार पांच सुरों की मींड में कलेजा चीर देने वाली कसक थी। आलाप-जोड़-झाले के बाद एक खूबसूरत विलम्बित गत झपताल में बजाकर राग गाउती में एक से एक दिलकश बंदिशें उन्होंने मध्य और द्रुत तीनताल में बजाते हुए तैयार झाले से अपना कार्यक्रम संपन्न किया। आजकल झाले के नाम पर जो बेसुरा और कर्णभेदी शोर सुनाई देता है उसके बरक्स उनके झाले की सुरमयता का जवाब नहीं था।

पं. उल्हास कशालकर ने राग केदार से अपने गायन का प्रभावी शुभारंभ किया। इसके बाद बहार में दो बंदिशें, काफी में होरी और एक बंदिशी ठुमरी गाकर भैरवी से अपना ओजस्वी गायन संपन्न किया। सुरेश तलवलकर का तबला उनके गायन का आकर्षक और अपरिहार्य अंग बन चुका है। इस शाम भी सुरेश के तबले ने उनके गायन में अतिरिक्त रंग भरे। पं. जसराज से पहले राकेश चौरसिया की मीठी बांसुरी भी समापन संध्या का आकर्षण बनी।

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