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साफ हवा और पानी की तरह सर्वसुलभ हो स्कूली शिक्षा

क्या देश भर में परीक्षाओं के लिए एक बोर्ड होना चाहिए? शिक्षा के अधिकार के तहत कमजोर तबके के बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में दाखिला मिल तो जाता है, लेकिन क्या यह शिक्षा में सामाजिक विभेद की समस्या का समाधान है।

विराट शाह का फुटपाथ स्कूल (Photo Source: Facebook/Sarvodaya Footpath School)

हर साल दसवीं-बारहवीं में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थी साल की शुरुआत में ‘विद्यार्थी’ से ‘परीक्षार्थी’ में तब्दील हो जाते हैं और फिर अलग-अलग बोर्ड की छन्नी से उनको छाना जाता है। क्या देश भर में परीक्षाओं के लिए एक बोर्ड होना चाहिए? शिक्षा के अधिकार के तहत कमजोर तबके के बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में दाखिला मिल तो जाता है, लेकिन क्या यह शिक्षा में सामाजिक विभेद की समस्या का समाधान है। इन्हीं सवालों पर पिछले दस वर्षों से अलग-अलग संस्थानों के साथ स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय मनोज कुमार से जनसत्ता की बातचीत..

लोकतांत्रिक देश में स्कूली शिक्षा को प्रतिभा को छानने वाली छन्नी की तरह नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे साफ हवा और पानी की तरह सवर्सुलभ होना चाहिए जिसमें प्रतिभाओं का विकास हो सके। फिर ऐसा हो क्यों नहीं पा रहा है? दरअसल आधुनिक मध्यवर्ग जीवन में प्राप्त विशेष सुविधाओं को अपनी वैयक्तिक प्रतिभा के आधार पर ही वैध ठहरा सकता है। जन्म आधारित सामंती विशेषाधिकारों को चुनौती देने के बाद वह यह तो कह नहीं सकता कि उसे विशेष सुविधाएं इसलिए मिलनी चाहिए कि उसने एक जाति या खानदान विशेष में जन्म लिया है। यह कहना ज्यादा स्वीकार्य होगा कि उसने ये सुविधाएं कठिन परीक्षा पास कर के अर्जित की हैं। इस तरह शिक्षा के छन्नी सिद्धांत और प्रतिभावाद की विचारधारा पनपती है। आधुनिक समाज में मध्यवर्ग का सेंस ही व्यापक समाज के लिए कॉमन सेंस बनाता है। इसलिए छन्नीवाद और प्रतिभावाद व्यापक समाज की विचारधारा बनकर उभरती है।

हर वर्ष दसवीं-बारहवी में पढ़ने वाले देश के लाखों विद्यार्थी साल की शुरुआत में ‘विद्यार्थी’ से ‘परीक्षार्थी’ में तब्दील हो जाते हैं और फिर अलग-अलग बोर्ड परीक्षाओं की छन्नी में उनको छाना जाता है। इस सिलसिले में ही यह सवाल लगभग हर साल उठता है कि क्यों नहीं देश भर में एक ही बोर्ड सभी विद्याथिर्यों की परीक्षा संचालित करे, क्यों नहीं एक ही छन्नी से सबको छाना जाए।भारत में जिस तरह की जटिल सांस्कृतिक विविधता है, उसे ध्यान में रखते हुए शिक्षा में एकरूपता और विविधता के मुद्दे को धैर्य के साथ समझना होगा। भारत में शिक्षा 1976 के पहले तक राज्य का विषय माना गया था। 1976 में संविधान संशोधन करके शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला गया। अपेक्षा यह की गई कि राज्य और केंद्र के बीच शिक्षा के मुद्दे पर नई सहभागिता कायम होगी। इस सहभागिता का एक पहलू यह है कि शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों, शिक्षण-विधि और आकलन के व्यापक मानकों को लेकर पाठ्यचर्या के स्तर पर तो राष्टÑीय स्तर पर सहमति होगी, लेकिन पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और परीक्षा-संचालनों के ठोस ब्योरों और विधियों के मामले में राज्यों की विविधता का सम्मान किया जाएगा। इसी समझ के साथ राष्टÑीय पाठ्यचर्या की रूपरेखाएं 1988, 2000 और फिर 2005 में तय की गर्इं। प्राय: पाठ्यचर्या (करिकुलम), पाठ्यक्रम (सिलेबस) और पाठ्यपुस्तक (टेक्स्टबुक) के अंतर को समझने में लोग चूक जाते हैं। पाठ्यचर्या में शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों पर विचार होता है। उपयुक्त ज्ञान-निर्माण, कौशल-प्रशिक्षण और जीवन-मूल्यों के प्रति विद्यार्थी को संवेदनशील बनाकर उन उद्देश्यों की प्राप्ति के रास्तों और उन उद्देश्यों की प्राप्ति के अनुरूप शिक्षण-विधियों पर विचार प्रस्तुत किए जाते हैं। पाठ्यक्रम में ज्यादा ठोस ब्योरे होते हैं, मसलन तमिल भाषा में व्याकरण के कौन से अंश किस कक्षा में पढ़ाए जाएंगे पाठ्यपुस्तकों में पाठों की सूची होती है।

संविधान की भावना को समझते हुए पाठ्यचर्या के स्तर पर तो व्यापक राष्टÑीय सहमति की ओर बढ़ना चाहिए, लेकिन पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक और परीक्षा संचालित करने के मामले में यथासंभव विविधता का ध्यान रखा जाना चाहिए। पूरे देश में अगर एक परीक्षा-बोर्ड के तहत भी परीक्षा हो तब भी कुछ गिने-चुने बेहतर संस्थानों में नामाकंन की मुश्किलें कम नहीं होंगी। इसका टिकाऊ समाधान यह है कि राज्य और जिला स्तर पर अच्छे शिक्षण-संस्थान संचालित किए जाएं। शिक्षा के जिस छन्नी सिद्धांत को मध्यवर्ग अपने सीने से लगाकर घूमता है, महंगे निजी स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं में नामाकंन के समय महीन बुनावट वाले उस छन्नी के तार उघड़ने लगते हैं। इन निजी स्कूलों में नामांकन माता-पिता द्वारा संचित आर्थिक और सांस्कृतिक पूंजी के बलबूते होता है यानी बच्चे का भविष्य उसके जन्म के संयोग पर निर्भर करता है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने प्राइवेट स्कूलों में गरीब तबके के बच्चों के लिए जो 25 फीसद सीट आरक्षित की है वह शिक्षा के छन्नी सिद्धांत को निर्णायक चुनौती दिए बिना समान शिक्षा के सिद्धांत को टोटके के रूप में लागू करने की कोशिश है।
कोशिश होनी चाहिए कि पड़ोस के सरकारी स्कूलों में मध्यवर्गीय अभिभावक भी अपने बच्चों को भेजना शुरू करें। शहरी निम्न मध्यवर्ग में स्कूल की बढ़ती फीसों को लेकर असंतोष भी है। एक बार मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में आने लगेंगे तो शायद ज्यादातर निजी स्कूल भी गरीब तबके के 25 फीसद बच्चों को ज्यादा आसानी से स्वीकार करने लगेंगे।

 

 

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