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सावन विशेष: शिव उस तत्व का नाम, जो शून्य भी है और सर्वस्व भी

शिवलिंग पर तीन रेखाओं का यही महत्व है कि पूरी सृष्टि शून्य से उत्पन्न होती है और शून्य में ही विलीन हो जाती है। वैज्ञानिक रूप से भी यह बात समझ में आती है क्योंकि शून्य ही उस अनंत असीमित को समा सकता है। कोई भी आकार वाली चीज, असीमित को नहीं समा पाएगी। इसलिए शिव यानी शून्य, शिव यानी आदि, शिव यानी वह परम तत्त्व जिससे सब कुछ है पर वह स्वयं में कुछ भी नहीं, यह निराकार है, संसार में ऊर्जा का स्रोत है, जो कुछ भी जड़ और चेतन हमें दृष्टिगोचर होता है वह इसी शिव की अभिव्यक्ति है।

शिव की महिमा अपार है। उन्हें जानने के लिए शिवसागर में डूबना होगा।

राधिका नागरथ
शिव उस तत्व का नाम है जो शून्य भी है और सर्वस्व भी। जिसमें से यह सब कुछ निकला है और उसी में समा जाता है जो उत्पत्ति का कारक भी है और संहार का भी, क्योंकि वह आदि है, जन्म मरण से परे है जो हमेशा था, हमेशा है और हमेशा रहेगा। इसलिए शिव को ब्रह्माण्ड का आदि योगी या फिर प्रथम गुरु कहा जाता है जो सब ज्ञान का मूल्य है और इस योगिक ज्ञान को सबसे पहले कांति सरोवर के निकट हिमालय में केदारनाथ धाम के समीप में उन सात ऋषियों को दिया गया ऐसा कहा जाता है।

उस अनंत को सिर्फ एक लंबे गोलाकार के रूप में ध्यान में लाया जाता है और शिवलिंग पर तीन रेखाओं का यही महत्व है कि पूरी सृष्टि शून्य से उत्पन्न होती है और शून्य में ही विलीन हो जाती है। वैज्ञानिक रूप से भी यह बात समझ में आती है क्योंकि शून्य ही उस अनंत असीमित को समा सकता है। कोई भी आकार वाली चीज, असीमित को नहीं समा पाएगी। इसलिए शिव यानी शून्य, शिव यानी आदि, शिव यानी वह परम तत्त्व जिससे सब कुछ है पर वह स्वयं में कुछ भी नहीं, यह निराकार है, संसार में ऊर्जा का स्रोत है, जो कुछ भी जड़ और चेतन हमें दृष्टिगोचर होता है वह इसी शिव की अभिव्यक्ति है। एक स्थायी तत्व है जिसके होने से सब कुछ है और जिसके ना होने से प्रलय है। योगिक परंपरा में शिव को एक भगवान के स्वरूप में न देख कर उस सत्ता के समकक्ष माना जाता है जिससे पंचभूत निकले हैं और उन्हीं पंच भूतों का एक रूप मानव है।

दूसरी शताब्दी में महर्षि पतंजलि द्वारा विभिन्न ध्यान परायण अभ्यास को सुव्यवस्थित कर कुछ योग सूत्र दिए गए। यह सूत्र योग के आठ अंगों में को दर्शाते हैं, जिनमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि सम्मिलित है। योग शब्द संस्कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जुड़ना। शिव की आराधना तभी सफल है अगर हम उस शिव तत्व से जुड़ते हैं और वह जुड़ने के मार्ग चार हो सकते हैं… कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग एवं राजयोग।

भगवद गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी योद्धा अर्जुन को रणभूमि में इन चारों योग के महत्व को बताया जिससे कि अर्जुन का मोहभंग होकर वह अपने कर्म के प्रति सजग हो सका और योग का यही सार शिवत्व है। इस तरह योग साधक आदि योगी शिव की परंपरा को विभिन्न रूपों में आगे बढ़ा रहे हैं। सावन का यह पवित्र मास शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। योग साधकों के लिए यह श्रावणमास साधना का एक सुअवसर प्रदान करता है।

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