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विरोध पाकिस्तान का, निशाना भाजपा पर

भाजपा के साथ गठबंधन सरकार में शामिल होने के बावजूद अपनी लगातार हो रही उपेक्षा से शिवसेना पहले ही दुखी थी। लिहाजा शिवसेना भाजपा के खिलाफ फैसलाकुन लड़ाई का मन बना चुकी है..

शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)

कोल्हापुर और कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिकाओं के चुनाव सिर पर हैं। किसी भी दल के पास कोई मुद्दा नहीं है। लिहाजा ताकत, पैसा, जोड़तोड़ चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। सत्तारूढ़ होने के कारण भारतीय जनता पार्टी के पास तीनों चीजें हैं। उसकी मित्र शिवसेना इसमें कमजोर पड़ रही है। भाजपा पुलिस की ताकत के दम पर शिवसेना के नगरसेवकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है जिससे वह सेना आगबबूला है।

सरकार में शामिल होने के बावजूद अपनी लगातार हो रही उपेक्षा से शिवसेना पहले ही दुखी थी। लिहाजा शिवसेना भाजपा के खिलाफ फैसलाकुन लड़ाई का मन बना चुकी है। इसीलिए शिवसेना पाकिस्तान विरोध की आड़ में अपनी ही सरकार के सामने लगातार मुश्किलें खड़ी करने के लिए तैयार है। गुलाम अली, खुर्शीद महमूद कसूरी के बाद कल कोई और मुद्दे पर शिव सेना सरकार को परेशानी में डाल सकती है।

शिवसेना ने हिंदुत्व के एजंडे को आक्रामक तरीके से लागू करना तय किया है ताकि स्थानीय चुनावों में भी इससे फायदा उठाया जा सके। इसकी झलक गुलाम अली के बाद सोमवार को पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब के लोकार्पण के विरोध में साफ दिखी। दरअसल शिवसेना का विरोध पाकिस्तान के साथ-साथ भाजपा विरोध भी है, जिसे वह सीधे सीधे नहीं कह रही है।

शिवसेना दिखाना चाहती है कि भाजपा को हिंदुत्व के मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। वह मौके के मुताबिक इसका इस्तेमाल करती है और मौका ना होने पर ठंडे बस्ते में पटक देती है। भाजपा विपक्ष में थी तब पाकिस्तान के खिलाफ खूब बोलती थी। अब सत्ता में है तो पाकिस्तानी सैनिक हिंदुस्तानी सैनिकों को मार रहे हैं और भाजपा का खून नहीं खौल रहा है। लिहाजा सच्चे और अच्छे हिंदुत्व की पैरोकार अगर कोई है तो वह है शिवसेना।

दरअसल शिव सेना भाजपा की दबंगई विधानसभा चुनावों के समय से ही देखती आ रही है। भाजपा शिवसेना की नाक के नीचे से दलित नेता रामदास आठवले को निकाल ले गई। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने आठवले को अपने छाते तले लाकर जो शिवशक्ति- भीमशक्ति बनाई थी। उद्धव इसे बरकरार रखने के लिए आठवले को उपमुख्यमंत्री पद तक देने के लिए तैयार हो गए थे। मगर मोदी को लोकसभा चुनावों में मिली लोकप्रियता से आठवले भाजपा की ओर खिंच गए।

कभी शिव सैनिक और भीम सैनिक एक हो गए थे। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि शिवसैनिक और भीमसैनिक आमने सामने आ गए हैं। इंदु मिल में प्रस्तावित बाबा साहेब आंबेडकर स्मारक का पूरा श्रेय भाजपा ने हड़प लिया। शिवसेना मुंह देखती रह गई। भाजपा शिवसेना के रिश्तों में इतना तनाव आ गया था कि उद्धव ठाकरे को तुरत-फुरत मुंबई से बाहर मराठवाड़ा में दौरा घोषित करना पड़ा। भाजपा की इस उपेक्षा से चिढ़ी शिवसेना ने इस घटना के बाद तय कर लिया कि अगर उसने आक्रामक रुख नहीं अपनाया तो वह सत्ता के साथ अपनी साख भी खो देगी। इसी के बाद शिवसेना ने गुलाम अली का मुद्दा उठाया और कसूरी की किताब के विरोध को ऊंचाई दी। अब किसी न किसी बहाने शिव सेना अपनी यह आक्रामता बरकरार रखना चाहती है।

स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा फिर अपनी ताकत के दम पर तोड़फोड़ में जुट गई है, जिसे शिव सेना सहन नहीं कर पा रही है। उसके स्थानीय नेता शिव सेना के नगरसेवकों को तोड़ने में जुटे हैं। शिव सेना आरोप लगा रही है कि भाजपा नेता शिव सेना के नगरसेवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने की धमकी देकर उन्हें अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे कुछ नगरसेवकों का भाजपा में प्रवेश मुख्यमंत्री की उपस्थिति में करने तक की तैयारी हो गई थी, जिसे अंतिम समय में स्थगित कर दिया। जाहिर है इससे शिव सेना और भाजपा के रिश्तों में कड़वाहट आ रही है।

दूसरी ओर भाजपा ने शिव सेना को ठेंगे पर रखते हुए क्षेत्र में साढ़े छह हजार करोड़ रुपए के विकास कामों की घोषणा कर दी और सरकार में शामिल मित्र पक्ष शिव सेना ने पूछा तक नहीं। फिर भाजपा मनपा चुनाव अपने दम पर लड़ना चाह रही है और शिव सेना को साथ लेने का उसका कोई इरादा नहीं है इसलिए उनसे सीट बंटबारे में से 122 सीट में से 79 सीटों की मांग रख कर शिवसेना को ठंडा कर दिया। इन कारणों और अब तक के भाजपा के साथ हुए अनुभवों के दम पर शिव सेना समझ गई है कि ज्यादा समय तक भाजपा के साथ निबाही नहीं जा सकती। सूबे की जनता ने उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया था। इस जनादेश की उपेक्षा करके सरकार में शामिल होकर वह अपनी साख कमजोर कर रही है। सत्ता में रहने के बावजूद शिवसेना सत्ता से दूर है और भाजपा के तौर-तरीकों से आम शिवसैनिक गुस्से में भरा हुआ है।

भाजपा के खिलाफ आम शिवसैनिकों के मन में चिढ़ पैदा हो चुकी है क्योंकि विधानसभा चुनाव के बाद से शिव सैनिकों ने अपने नेताओं को बार-बार भाजपा से समझौता करते देखा। शिवसैनिक देख रहे हैं कि सूबे की सरकार में उनके नेता शामिल हैं, मगर बार बार उनकी उपेक्षा की जा रही है। सरकार के किसी भी नीतिगत निर्णय में शिव सेना के मंत्रियों की राय नहीं ली जाती है। शिवसेना ने चुनाव प्रचार में भाजपा का खुलकर विरोध किया था। इस उपेक्षा की प्रतिक्रिया यह हुई कि शिवसेना सरकार में शामिल होने के पहले ही दिन से सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाती आ रही है। वह सरकार के लगभग हर दूसरे निर्णय की कड़ी आलोचना करती आ रही है। भाजपा की उपेक्षा से शिवसेना में आक्रामता उपज रही है और शिवसेना अपने पुराने रंग में आती नजर आ रही है। इससे कोई और खुश हो या ना हो आम शिव सैनिक जरूर खुश है।

एजंडे में हिंदुत्व:

शिवसेना ने हिंदुत्व के एजंडे को आक्रामक तरीके से लागू करना तय किया है ताकि स्थानीय चुनावों में भी इससे फायदा उठाया जा सके। इसकी झलक गुलाम अली के बाद खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब के लोकार्पण के विरोध में साफ दिखी। दरअसल शिवसेना का विरोध पाकिस्तान के साथ-साथ भाजपा विरोध भी है, जिसे वह सीधे सीधे नहीं कह रही है।

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